आज के हिंदी अख़बारों के संपादकीय: 20 मार्च, 2018

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नवभारत टाइम्स

कांग्रेस की तैयारी

कांग्रेस ने तमाम राजनीतिक ताकतों को जता दिया है कि वह 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कमर कस चुकी है। दिल्ली में आयोजित पार्टी के महाधिवेशन में अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक ओर पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को कड़ा सन्देश दिया, तो दूसरी ओर बीजेपी को भी इशारा कर दिया कि वह पूरे दमखम के साथ मैदान में उतरने वाले हैं। अध्यक्ष का पद संभालने के बाद राहुल की में यह पार्टी का पहला अधिवेशन था जिसमें उन्होने साफ कर दिया कि अब पार्टी की यंग बिग्रेड ही पूरी तरह मोर्चा संभालेगी। उन्होंने युवाओं और पार्टी कार्यकर्ताओं को 2019 के चुनाव में ज्यादा से ज्यादा टिकट देने का वादा किया। राहुल ने कहा कि कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच की दीवार को तोड़ना उनका पहला लक्ष्य है। वह बीजेपी के खिलाफ बेहद आक्रामक नजर आए। उन्होंने केन्द्र सरकार की नीतियों की जबर्दस्त खिंचाई की और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को हत्या का आरोपी बताया वहीं संघ के बारे में कहा कि वह न्यापलिका, संसद, पुलिस सहित तमाम संस्थानों पर नियंत्रण करने की कोशिश में जुटा है। इस अवसर पर राजनीतिक प्रस्ताव पास किया गया जिसमें कांग्रेस ने साफ कर दिया कि वह समान विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन करेगीं राहुल गांधी के भाषण में जो आत्मविश्वास दिखा, उसकी वजह है। हाल के कई उपचुनावों में बीजेपी की लगातार हार से उसके खिलाफ हवा बनने लगी है। बैंक घोटालेपर हुए और किसानों के आन्दोलन से केंद्र सरकार दवाब में हैं है। बीजेपी के सहयोगी दल उसपर सवाल उठा रहे हैं। पहली बार जनता का एक बड़ा हिस्सा केंद्र की नीतियों को आलोचनात्मक नजरिए से देखने लगा है। कांग्रेस इसे अपने लिए अवसर मान रही है। वह मुखर होकर बीजेपी का विरोध कर रही है ताकि 2019 का चुनाव आते-आते उसके खिलाफ एक मजबूत माहौल तैयार हो सके। लेकिन पार्टी को इस बात का एहसास है कि वह बीजेपी को अकेले दम चुनौती नहीं दे सकती इसलिए वह सेक्यूलर दलों के साथ गठबंधन के पक्ष में है। राहुल गांधी की असली परीक्षा इसी में होगी की वह बीजेपी विरोधी ताकतों को कांग्रेस की अगुवाई में कितना एकजुट कर पाते हैं। क्षेत्रीय दल अपने तरीके से आगे बढ़ना चाहते हैं। उनमें से कुछ को कांग्रेस से परहेज है। उन्हें डर है कि कांग्रेस के साथ खड़ा होने से उनके वोटर उनसे छिटक सकते हैं वे थर्ड फ्रंट बनाकर बाहर से कांग्रेस का समर्थन चाहते हैं। सारे विपक्षी दल एक साथ कैसे आएं, यह एक फॉर्मूला ढूंढना वाकई एक चुनौती है। राहुल बार-बार संगठन को मजबूत करने की बात करते हैं, पर अब भी कांग्रेस का जमीनी स्तर पर कोई सांगठनिक ढांचा नहीं है। अगर राहुल इस दिशा में कोई ठोस काम कर पाए तो यह पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होगा।


जनसत्ता

जोखिम में बच्चे

उम्मीद की जाती है कि कोई भी समाज सभ्य होने के साथ-साथ अपने बीच के उन तबकों के जीवन की स्थितियां सहज और सुरक्षित बनाने के लिए तमाम इंतजाम करेगा, जो कई वजहों से जोखिम या असुरक्षा के बीच जीते हैं। लेकिन इक्कीसवीं सदी का सफर करते हमारे बच्चे अगर कई तरह के खतरों से जूझ रहे हैं तो निश्चित रूप से यह चिंताजनक है और हमारी विकास-नीतियों पर सवाल उठाता है। यों बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध लंबे समय से सामाजिक चिंता का विषय रहे हैं। लेकिन तमाम अध्ययनों में इन अपराधों का ग्राफ बढ़ने के बावजूद इस दिशा में शायद कुछ ऐसा नहीं किया जा सका है, जिससे हालात में सुधार हो। हालांकि सामाजिक संगठनों से लेकर सरकार की ओर से इस मुद्दे पर अनेक बार चिंता जताई गई, समस्या के समाधान के लिए ठोस कदम उठाने के दावे किए गए। मगर इस दौरान आपराधिक घटनाओं के शिकार होने वाले मासूमों की संख्या में कमी आने के बजाय और बढ़ोतरी ही होती गई। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2015 के मुकाबले 2016 में बच्चों के प्रति अपराध के मामलों में ग्यारह फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इनमें भी कुल अपराधों के आधे से ज्यादा सिर्फ पांच बड़े राज्यों- उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में हुए। सबसे ज्यादा मामले अपहरण और उसके बाद बलात्कार के पाए गए।

जाहिर है, कमजोर स्थिति में होने की वजह से बच्चे पहले ही आपराधिक मानसिकता के लोगों के निशाने पर ज्यादा होते हैं। फिर व्यवस्थागत कमियों का फायदा भी अपराधी उठाते हैं। विडंबना यह है कि चार से पंद्रह साल उम्र के जो मासूम बच्चे अभी तक समाज और दुनिया को ठीक से नहीं समझ पाते, वे आमतौर पर मानव तस्करों के जाल में फंस जाते हैं। इनमें भी लड़कियां ज्यादा जोखिम में होती हैं। एक आंकड़े के मुताबिक गायब होने वाले बच्चों में सत्तर फीसद से ज्यादा लड़कियां होती हैं। अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि बच्चों को मानव तस्करी का शिकार बनाने वाले गिरोह छोटी बच्चियों को देह व्यापार की आग में धकेल देते हैं। घरेलू नौकरों से लेकर बाल मजदूरी के ठिकानों पर बेच दिए जाने के अलावा यह लड़कियों के लिए दोहरी त्रासदी का जाल होता है। इन अपराधों की दुनिया और उसके संचालकों की गतिविधियां कोई दबी-ढकी नहीं रही हैं। लेकिन सवाल है कि हमारे देश में नागरिकों की सुरक्षा में लगा व्यापक तंत्र अबोध बच्चों को अपराधियों के जाल से क्यों नहीं बचा पाता! आपराधिक मानसिकता वालों के चंगुल में फंसने से इतर मासूम बच्चों के लिए आसपास के इलाकों के साथ उनका अपना घर भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं होता।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में पेश आंकड़ों के मुताबिक 2016 में ही देश भर में करीब एक लाख बच्चे यौन अपराधों के शिकार हुए। बच्चों के खिलाफ अपराधों में यौन शोषण एक ऐसा जटिल पहलू है, जिसमें ज्यादातर अपराधी पीड़ित बच्चे के संबंधी या परिचित ही होते हैं। लोकलाज की वजह से ऐसे बहुत सारे मामले सामने नहीं आ पाते। फिर आमतौर पर ऐसे आरोपी बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क का फायदा उठाते हैं और उन्हें डरा-धमका कर चुप रहने पर मजबूर कर देते हैं। जाहिर है, बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों के कई पहलू हैं, जिनसे निपटने के लिए कानूनी सख्ती के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता के लिए भी अभियान चलाने की जरूरत है। अक्सर हम देश के विकास को आंकड़ों की चकाचौंध से आंकते हैं। लेकिन अगर चमकती तस्वीर के पर्दे के पीछे अंधेरे में अपराध के शिकार बच्चे कराह रहे हों, तो उस विकास की बुनियाद मजबूत नहीं हो सकती!


हिन्दुस्तान

आतिशी पारी

यह ख्यालों में पल रही किसी फंतासी के जमीन पर उतरने जैसा था। हकीकत में ऐसा खेल बहुत कम ही दिखाई देता है, जैसा रविवार की रात दिनेश कार्तिक ने कोलंबो के मैदान में दिखाया। सिर्फ आठ गेंद खेलकर 29 रन बनाने का जो करिश्मा उन्होंने दिखाया, उसका उदाहरण आने वाले न जाने कितने समय तक दिया जाएगा। जब हर कोई यह मान बैठा था कि भारत सिर्फ मैच ही नहीं, पूरी त्रिपक्षीय शृंखला हारने जा रहा है, तब दिनेश कार्तिक ने न सिर्फ आतिशी पारी खेली, बल्कि टीम को हार के जबड़े से भी बाहर निकाला। मैच की आखिरी गेंद पर जब जीत के लिए पांच रनों की जरूरत हो, उस समय छक्का लगाकर टीम को जिताने के हमारे पास बहुत ज्यादा उदाहरण नहीं हैं। दिनेश कार्तिक उस रात मैदान पर शायद करिश्मे के लिए ही उतरे थे। मैदान पर उतरते ही पहली गेंद पर छक्का जड़ देने की हिम्मत बड़े-बड़े खिलाड़ी उस समय नहीं दिखा पाते, जब टीम पर संकट के बादल मंडरा रहे हों। दिनेश कार्तिक जानते थे कि यह समय ऐसा नहीं, जब मैदान पर जमने की कोशिश की जाए। इसीलिए पहली गेंद से ही वह पूरा दम लगाकर शुरू हो गए, वह भी तब, जब टीम इंडिया की हार लगभग तय मानी जाने लगी थी। पहली छह गेंदों में 22 रन बनाकर उन्होंने वह बाजी पलट दी, जो बांग्लादेश की झोली में लगभग जा ही चुकी थी। इसके पहले कब ऐसा हुआ है कि कोई खिलाड़ी महज 29 रन बनाए और ‘मैन ऑफ द मैच’ का खिताब ले जाए? वह भी उस मैच में, जहां कप्तान 56 रनों की जोरदार पारी खेल चुके हों।

यह ऐसा मैच था, जो भारत को हारना नहीं था। जब भारत ने बल्लेबाजी शुरू की, तो दो विकेट जल्द ही गिर गए, लेकिन शुरू से ही यह लग रहा था कि मैच को भारत आसानी से जीत जाएगा। लेकिन खिलाड़ियों की थोड़ी सी ढील और कप्तानी की एकाध गलती की वजह से अचानक ही यह भारत के हाथ से खिसकता दिखने लगा। बेशक इसका कुछ श्रेय आप बांग्लादेश की टीम को भी दे सकते हैं। लेकिन भारत अगर हारता, तो यह मैच टी-20 के उसके सबसे खराब प्रदर्शनों के लिए गिना जाता। हालांकि श्रीलंका और बांग्लादेश के साथ होने वाले इस टूर्नामेंट के लिए भारत ने अपने कई खिलाड़ियों को आराम दिया था, मगर शुरू से ही माना जा रहा था कि भारत की टीम सब पर भारी रहेगी और इस लिहाज से भी यह हार काफी शर्मनाक मानी जा सकती थी।

दिनेश कार्तिक की गिनती शुरू से ही भारत के अच्छे खिलाड़ियों में होती रही है, लेकिन लंबे समय तक भारतीय टीम में वह अपनी जगह सिर्फ इस वजह से नहीं बना सके, क्योंकि टीम में महेंद्र सिंह धौनी जैसे विकेटकीपर और बल्लेबाज मौजूद हों, तो ठीक उसी जगह पर दूसरे खिलाड़ी के लिए जगह भला कैसे निकल सकती थी? उनके खेल की तारीफ हमेशा ही होती रही, लेकिन भारतीय टीम में उनकी स्थाई जगह कभी नहीं बन सकी। लेकिन पेशेवर और निजी जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव के बीच उनका जज्बा कभी कमजोर नहीं हुआ। शायद अपनी चमक दिखाने के लिए उन्हें कोलंबो जैसे किसी अवसर का इंतजार था। दिनेश कार्तिक की उम्र इस समय 32 साल है, यह वह उम्र है, जहां पहुंचते-पहुंचते खिलाड़ी अपना रिटायरमेंट प्लान बनाने लगते हैं। कुछ तो रिटायर भी हो जाते हैं। मगर कार्तिक ने दिखा दिया कि अगर जज्बा हो, तो उम्र कोई मायने नहीं रखती।


अमर उजाला

अपराजेय पुतिन

व्लादिमीर पुतिन का चौथी बार रूस के राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतना अप्रत्याशित नहीं है, क्योंकि इस चुनाव में प्रमुख विपक्षी नेता एलेक्सी नावल्नी को धोखाधड़ी के आरोप में अयोग्य करार दिया गया था और उनके मुकाबले जो आधा दर्जन अन्य उम्मीदवार मैदान में थे, वे काफी कमजोर थे। 1999 में वह पहली बार राष्ट्रपति बने थे और दो दशक बाद 77 फीसदी मत हासिल कर मिली भारी विजय बताती है रूस की राजनीति में उनकी पकड़ कितनी मजबूत है। हालांकि उनके आलोचक उनके निर्वाचन की निष्पक्षता पर भी सवाल करते हैं। दरअसल सोवियत संघ के पतन के बाद के पहले दशक काफी उथल-पुथल भरे रहे थे और उसके बाद पुतिन रूस के एकमात्र ताकतवर नेता बनकर उभरे और अपने देश को बदहाली के दौर से काफी हद तक उबारा। यही नहीं, उन्होंने आतंकवाद के मोर्चे पर और अपने देश की सीमा पर पश्चिमी नाटो की सैन्यीकरण की कोशिशों का भी करारा जवाब दिया है। वास्तव में चुनाव से ऐन पहले उन्होंने देश के भीतर पश्चिम वे युद्ध का एक हौआ भी खड़ा किया और यह जताने में सफल रहे कि वही रूस को उससे बचा सकते हैं। 2014 में क्रीमिया के विलय के जरिये उन्होंने पश्चिम से लोहा लिया ही था और उसके बाद लगे आर्थिक प्रतिबंध को उन्होंने देश के मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को मजबूत करने के अवसर में बदल दिया। उनकी जीत का वैश्विक राजनीति पर असर पड़ना तय है। खासतौर से इसलिए भी, क्योंकि पश्चिमी देशों के साथ रूस के रिश्ते शीतयुद्ध के खात्मे के बाद सबसे निचले स्तर पर हैं। वहीं रूस के रणनीतिक साझेदारी चीन में भी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने खुद के आजीवन पद पर बने रहने का रास्ता साफ कर असीमित अधिकार हासिल कर लिए हैं। यों अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से पुतिन की अदावत नहीं है, लेकिन पुतिन और जिनपिंग की जोड़ी न सिर्फ उनके लिए, बल्कि उनके सहयोगी देशों के लिए नई चुनौती पेश कर सकती है। सीरिया में आईएस को कमजोर करने के बाद दूसरे विवादित क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ा सकते हैं। जहां तक भारत से रिश्तों की बात है, तो उसके मजबूत होने के ही आसार हैं, अलबत्ता यह देखना होगा कि पुतिन सैन्य और रणनीतिक रिश्ते को मजबूती देते हुए द्विपक्षीय व्यापार को किस ऊंचाई तक ले जाते हैं।


राजस्थान पत्रिका

आखिर कब तक

पाकिस्तान की नापाक हरकतों की खबरें सुनते-सुनते देश के कान पक गए लेकिन हमारी सरकारों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही। भारतीय नववर्ष के मौके पर जम्मूकश्मीर के बालाकोट में पाकिस्तान ने घरों पर गोले दाग कर पांच लोगों को मौत की नींद सुला दिया। आए दिन संघर्ष विराम का उल्लंघन करके जम्मू-कश्मीर में अंशाति फैलाना पाकिस्तान कीआदत में शुमार हो चुका है। रोजाना निर्दोष लोगों का खून बहता है लेकिन हमारी सरकारें है कि पाकिस्तान को धमकी देकर शांत बैठ जाती हैं। केन्द्र में जो सरकार है वह भी पहले वाली सरकारों की तरह सिर्फ गरज रही है। हो यह रहा है कि चुनाव से पहले पाकिस्तान पर बरसने वाली सरकार आज बयान देकर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करती नजर आ रही है। राष्ट्रवाद की पुरजोर वकालत करने वाली सरकार से यह उम्मीद किसी को नहीं थी।
भाजपा जब विपक्ष में थी तो पाकिस्तान की ऐसी करतूतों पर सबक सिखाने को बड़ी-बड़ी बातें करते नहीं थकती थी। लेकिन आज सत्ता में है तो एक सर्जिकल स्ट्राइक को अपनी उपलब्धि मानकर फूले नहीं समाती। क्षेत्रफल में हमसे चौथाई और आबादी में हमारा छठा हिस्सा पाकिस्तान 70 सालों से हमारी पीठ पर छुरा घोप रहा है। अगर पाकिस्तान हमसे पांच-छह गुना बड़ा होता तो क्या करता। सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। दुनिया पाकिस्तान की नापाक हरकतों को सालों से देख रही है और निंदा भी कर रही है। लेकिन क्या हमें भी सिर्फ निंदा करके चुप बैठ जाना चाहिए। भारत अपने आपको अहिंसा का पुजारी मानता है। अच्छी बात है। लेकिन पाकिस्तान की अमानवीय वारदातों पर अहिंसा का राग अलापने का समर्थन शायद ही कोई करेगा? पडोसी देशों के साथ दोस्ती से रहने के सपने देखना अच्छी बात है। लेकिन ताली दोनों हाथ से बजनी चाहिए। हम संबंध सुधारने पर जोर देते रहें और पाकिस्तान हिंसा फैलाता रहे। इसे सहन नहीं किया जा सकता। राष्ट्रहित को प्राथमिकता देते हुए सरकार को कड़े कदम उठाने से नहीं हिचकना चाहिए। सत्ता में आने का मतलब सिर्फ राज करना नहीं होना चाहिए। बल्कि जिम्मेदारी का ढंग से निर्वहन करना होना चाहिए। देश की जनता सरकारों से यही अपेक्षा करती है।


दैनिक भास्कर  

राहुल गांधी की ललकार और कांग्रेस की राजनीतिक शक्ति 

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी के पूर्णाधिवेशन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर जो करारा हमला किया है उसका प्रभाव 2019 के आम चुनावों में तभी पड़ेगा जब जमीनी स्तर पर पार्टी के पास कार्यकर्ताओं की मजबूत फौज या कारगर गठबंधन हो। उसके बिना उनकी यह ललकार भाजपा के शब्दों में हारे हुए नेता की पुकार बनकर रह जाएगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि पूर्वोत्तर और विशेष कर त्रिपुरा के चुनाव में जीत के बाद भाजपा के भीतर जो आत्मविश्वास कुलाचें भर रहा था उस पर उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों के बाद लगाम लगी है। किंतु उसमें कांग्रेस से ज्यादा क्षेत्रीय और मंडलवादी दलों का योगदान है। उस माहौल को भाजपा विरोधी मानते हुए कांग्रेस ने यूपीए के घटक दलों को एकजुट करने और राष्ट्रीय स्तर पर सरकार विरोधी माहौल बनाने की कवायद शुरू की है। उसी को धार देते हुए राहुल ने सत्य बनाम असत्य और कौरव बनाम पांडव के उन्हीं पौराणिक रूपकों का प्रयोग शुरू किया है, जिसका सर्वाधिक चुटीला और प्रभावशाली इस्तेमाल संघ परिवार करता रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने चुनाव दर चुनाव जीत हासिल करने के लिए तमाम वादों और जुमलों का इस्तेमाल किया है और पूरे न हो पाने के कारण आज वे तंज के हथियार बन गए हैं। इसी कड़ी में कांग्रेस ने जहां अपनी भूलें स्वीकार की हैं वहीं ललित मोदी और नीरव मोदी के उपनामों से प्रधानमंत्री को घेरना चाहा है। वह भूल रही है कि जनमानस में अभी भी यूपीए और कांग्रेस के शासन का भ्रष्टाचार ज्यादा गहराई से अंकित है और एनडीए नेताओं के भ्रष्टाचार लोगों की निगाहों से ओझल ही रहे हैं। ज्यादा तार्किक कांग्रेस का दूसरा आह्वान है जो उसने अर्थव्यवस्था के बहाने किया है। वह प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री अरुण जेटली को अर्थव्यवस्था के लिए नीम हकीम खतरा-ए-जान बताकर उनके हाथों से 2004 की तरह देश की कमान छीनना चाहती है। कांग्रेस नोटबंदी, जीएसटी जैसे उन आर्थिक फैसलों को मुद्‌दा बनाने में लगी है। राहुल गांधी और उनकी यह ललकार तभी जनमत को सत्ता परिवर्तन तक ले जा सकती है जब वह जमीनी राजनीति से व्यावहारिक रिश्ता बनाए। वह रिश्ता उन मंडलवादी दलों से गठबंधन के माध्यम से ही बनेगा जो भाजपा की लहर में ध्वस्त होने के बावजूद खड़े होने की उम्मीद जगाते हैं।


दैनिक जागरण

हंगामा करने के बहाने

हंगामे के कारण संसद जिस तरह लगातार 11वें दिन भी नहीं चल सकी उससे यही लगता है कि राजनीतिक दलों की दिलचस्पी शोर-शराबा करने में ही अधिक है। बीते कुछ दिनों से संसदीय कार्यवाही बाधित करने का नया बहाना अविश्वास प्रस्ताव बन गया है। हैरानी यह है कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह की ओर से यह कहने के बाद भी विपक्ष हंगामा करने में ही व्यस्त है कि सरकार अविश्वास प्रस्ताव समेत अन्य मसलों पर चर्चा के लिए तैयार है। आम जनता के लिए यह समझना कठिन है कि क्या कारण है कि विपक्ष एक ओर नित-नए विषय उठा रहा और दूसरी ओर उन पर बहस करने की नौबत भी नहीं आने दे रहा। क्या सभी मसलों पर गतिरोध का एकमात्र कारण इस पर सहमति न होना ही है कि बहस किस नियम के तहत हो? विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव पर भी किस तरह संकीर्ण राजनीति कर रहा है, इसका पता इससे चलता है कि आंध्र प्रदेश में एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी दल तेलुगु देसम पार्टी और वाईएसआर कांग्रेस, दोनों ही इस प्रस्ताव को लेकर आगे दिखना चाह रहे हैं। इस पर हैरानी नहीं कि अन्य विपक्षी दल अविश्वास प्रस्ताव को समर्थन देने के लिए तैयार हैं। ऐसा करना उनका अधिकार है, लेकिन आखिर क्या कारण है कि वे किसी भी मसले और यहां तक कि अविश्वास प्रस्ताव को लेकर भी गंभीर नहीं दिख रहे हैं। यदि विपक्षी दल अविश्वास प्रस्ताव नोटिस को लेकर गंभीर हैं तो वे उसे पेश होने की नौबत क्यों नहीं आने दे रहे हैं? ध्यान रहे कि लोकसभा अध्यक्ष यह कह चुकी हैं कि अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा कराना उनकी जिम्मेदारी है, लेकिन विपक्ष नारेबाजी का तो परित्याग करे। आखिर इस अपेक्षा की अनदेखी क्यों?1आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ तेलुगु देसम पार्टी और वहां के विपक्षी दल वाईएसआर कांग्रेस अविश्वास प्रस्ताव इसलिए लाना चाहते हैं, क्योंकि केंद्र सरकार विशेष राज्य के दर्जे की उनकी मांग मानने के लिए तैयार नहीं। सरकार को घेरने के इरादे से कांग्रेस के साथ-साथ कई अन्य क्षेत्रीय दल भी इस मांग को अपना समर्थन दे रहे हैं। वे ऐसा यह जानने के बावजूद कर रहे हैं कि कई राज्यों की आर्थिक स्थिति आंध्र प्रदेश से भी कमजोर है। अच्छा हो कि विपक्ष यह स्पष्ट करे कि अगर आंध्र विशेष राज्य के दर्जे का अधिकारी है तो बिहार क्यों नहीं है? क्या बिहार आंध्र से अधिक संपन्न है? विपक्षी दल एक ओर केंद्र सरकार से गरीबी और पिछड़ेपन को दूर करने के लिए ज्यादा से ज्यादा धन की मांग कर रहे हैं और दूसरी ओर केंद्रीय सहायता के सही-सही उपयोग में दिलचस्पी दिखाने से भी इन्कार कर रहे हैं। अच्छा हो कि राजनीतिक दल यह समङों कि गरीबी और पिछड़ापन दूर करने के लिए धन की कमी से ज्यादा बड़ी समस्या उसका समुचित इस्तेमाल न होना है। राजनीतिक दलों का यह रवैया पहले से ही एक बड़ी समस्या बना हुआ है कि वे हर संकट का समाधान सब्सिडी और रियायत के जरिये करना चाहते हैं। निर्धन-वंचित लोगों को आर्थिक रूप से सबल बनाने के ठोस उपाय करने के बजाय गरीबी के महिमामंडन को राजनीति के रोग के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता।


प्रभात खबर

उद्यमशीलता की कमी

मौजूदा भारत में रोजगार की धारणा बदली है. हालिया दिनों में विचार-विमर्श के दौरान अक्सर कहा और सुना जा रहा है कि नौकरी करनेवाला नहीं, बल्कि नौकरी देनेवाला बनिए, तेज बढ़वार के सहारे वैश्वीकरण की धारा में अहम होती भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ऐसा आश्चर्यजनक भी नहीं है. हमारे देश में विनिर्माण क्षेत्र अपेक्षाकृत स्थायी तथा सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से आकर्षक रोजगार का परंपरागत क्षेत्र रहा है, लेकिन इस क्षेत्र का प्रसार कई कारणों से अपेक्षानुरूप नहीं रहा और वैश्वीकरण के दौर में भारत की धाक सेवा क्षेत्र के जरिये जमी. इसे स्थायित्व और विस्तार देने के लिए स्वरोजगार या निजी कारोबार अनिवार्य है, परंतु चिंता की बात है कि कारोबार शुरू करने के मामले में भारत की वयस्क आबादी दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत पीछे है. जीइएम इंडिया के ताजा रिपोर्ट के तथ्य बताते हैं कि भारत में 2016-17 में केवल पांच फीसदी वयस्क लोग ही अपना कारोबार कायम करने में सफल हो पाये और मात्र 11 फीसदी लोग उद्यमिता की शुरुआती गतिविधियों में लगे हैं. ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन चिंता की एक बात यह तथा दक्षिण अफ्रीका) देशों के लिहाज से भारत में कारोबार खड़े करने तथा उसके स्वामित्व वाले लोगों की संख्या कम है, ब्रिक्स देशों को तेज बढ़ोतरी की अर्थव्यवस्थाओं में शुमार किया जाता है, इनमें ब्राजील कारोबारी स्वामित्व की दर (17 फीसदी) के लिहाज से सबसे आगे और दक्षिण अफ्रीका सबसे पीछे (तीन फीसदी) है, जबकि भारत और रूस में ऐसी आबादी की तादाद पांच फीसदी है तथा चीन में यह आंकड़ा आठ फीसदी है, ध्यान रहे, भारत से पांच गुना बड़ी अर्थव्यवस्था चीन में विनिर्माण क्षेत्र अपने विस्तार के लिहाज से विकसित मुल्कों के स्तर तक तकरीबन पहुंच चुका है. चिंता की एक बात यह भी है कि कारोबार शुरू कर कुछ समय बाद उसे अलाभकर पाकर छोड़ देने के रुझान भी भारत में अन्य विकासशील देशों के मुकाबले ज्यादा प्रबल हैं, रिपोर्ट के मुताबिक, 18 से 64 साल के 100 लोगों में कम-से-कम 26 लोग कारोबार को शुरुआती दौर में ही अलग-अलग कारणों से बंद करने को विवश होते हैं. ऐसे कारणों में लाल फीताशाही का भी नाम लिया सकता है और धन की कमी तथा पारिवारिक सहयोग के अभाव को भी, लेकिन एक बड़ा कारण (100 में 17 मामलों में) कारोबार को कालक्रम में अलाभकर साबित होना है. कुछ समय पहले एक अन्य अध्ययन में बताया गया था कि धन की कमी के अलावा कारोबार के लिए जरूरी नये विचार, कौशल तथा व्यावसायिक नैतिक आचार का अभाव 90 फीसदी मामलों में स्टार्टअप्स के बंद होने के लिए जिम्मेदार है. नये कारोबार की शुरुआत एक विशेष कार्य-संस्कृति की मांग करती है. एक बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में हमारी लिए ऐसी उत्पादक कार्य-संस्कृति बड़ी जरूरत है. उम्मीद है कि इन अध्ययनों के आलोक में सरकार व्यवस्थागत दोषों के निवारण के लिए प्रयासरत होगी.


देशबन्धु

ठीक नहीं है राजनयिक विवाद

जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान की ओर से की गई गोलाबारी में एक परिवार के तीन बच्चों समेत पांच लोगों की मौत हो गई, जबकि इसी परिवार की दो बच्चियां घायल हुई हैं और उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया है। मोहम्मद रमजान, उनकी पत्नी और तीन बच्चे तो दो देशों की दुश्मनी का शिकार बन गए, अब दो बच्चियां बची हैं, उनका जीवन कैसा होगा, इसकी कल्पना डराने वाली है।

रमजान भारतीय सेना के लिए एक बोझ उठाने का काम करते थे। पत्थर और लकड़ी से बने घर में जब उनका परिवार सुबह का नाश्ता बनाने की तैयारी कर रहा था तब पाकिस्तान की ओर से दागा गया मोर्टार शैल उन पर कहर बन कर टूट पड़ा। 26 नवंबर 2003 को हुए संघर्ष विराम समझौते के बावजूद पाकिस्तान लगातार इसका उल्लंघन करता रहा है और सरकार का यह आरोप है कि पाकिस्तानी सेना सीमा से सटे क्षेत्रों में नागरिकों को निशाना बना रही है। अभी 27 फरवरी को भी पाक ने राजौरी और पुंछ जिलों में जमकर गोलाबारी की और मोर्टार दागे थे। जिसके कारण बच्चों को स्कूल में ही रोक लिया गया था। जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाकर्मियों, सेना के जवानों की मौत की खबरें तो परेशान करने वाली हैं ही, आम आदमी भी दिन ब दिन असुरक्षित होते जा रहा है।

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जानकारी दी गई है कि 2016 में आतंकी हमलों और सीमा पार गोलीबारी में 20 नागरिकों की मौत हुई थी, जबकि 2017 में हिंसा की घटनाओं में 51 नागरिक मारे गए थे। केंद्र सरकार ने हाल में अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी से आम लोगों के बचने के लिए 14,460 बंकर बनाने की अनुमति दी थी। लेकिन इस काम में देर हो रही है और इसका खामियाजा रमजान के परिवार को भी उठाना पड़ा।

भारत पाकिस्तान पर संघर्ष विराम के उल्लंघन का आरोप लगा रहा है और उधर पाकिस्तान ने भी यही आरोप भारत पर लगाया है। उसका कहना है कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के नाक्याल सेक्टर में भारत की ओर से कथित गोलीबारी में दो किशोरियों समेत नौ लोग घायल हुए हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्तों की ऐसी कड़वाहट कोई पहली बार नहीं है। 1947 से लेकर अब तक तनाव के न जाने कितने मौके दोनों देशों के बीच बने। बावजूद इसके संबंध सुधारने की पहल भी होती रही। राजनैतिक, कूटनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तमाम स्तरों पर संबंध निभते रहे। लेकिन अब इन पर भी तनाव की काली छाया मंडरा रही है। सरकारें एक-दूसरे को आंखें दिखा रही हैं। खिलाड़ियों, कलाकारों, लेखकों पर बंदिशे लगाई जा रही हैं और अब राजनयिक स्तर पर भी एक-दूसरे पर आरोप लग रहे हैं।

भारत ने फरवरी में आरोप लगाया कि इस्लामाबाद में स्थित भारतीय उच्चायोग में निर्माणकार्य में बाधाा डालने के लिए आईएसआई के एजेंटों ने पाकिस्तानी मजदूरों को वहां काम करने से रोक दिया। इसके कुछ दिन पाकिस्तानी उच्चायोग की तरफ से दावा किया गया कि भारतीय सुरक्षाकर्मियों ने इलेक्ट्रीशियनों को उसके परिसर में घुसने के खिलाफ चेतावनी दी है। दोनों ही देश एक दूसरे के राजनयिकों को परेशान किए जाने, उच्चायोगों के कामकाज में दखलंदाजी, जासूसी के आरोप एक-दूसरे पर लगा रहे हैं। हाल ही में भारत ने इस्लामाबाद में अपने उच्चायोग के जरिये पाकिस्तान को एक ‘नोट वर्बेल’ (राजनयिक संवाद) जारी किया। गौरतलब है कि उच्चायोग के कर्मचारियों को वहां डराने- धमकाने और परेशान करने पर अपना विरोध जताने के लिए भारत ने यह राजनयिक नोट जारी किया है। तीन महीने से भी कम समय में यह 12वीं बार है, जब भारत ने इस तरह का राजनयिक नोट जारी किया है। इधर पाकिस्तान ने अपने 16 मार्च को उच्चायुक्त सुहैल महमूद को वापस बुला लिया है।

हालांकि विदेश मंत्रालय का कहना है कि यह सामान्य बात है कि चर्चा के लिए राजनयिकों को उनके देश बुलाया जाता है। कारण जो भी हो, भारत-पाकिस्तान के बीच का यह तनाव किसी भी सूरत में सही नहींहै। यह 1961 और उसके बाद 1963 में राजनयिक संबंधों से जुड़े वियना समझौतों का उल्लंघन भी है, जिसमें साफ-साफ कहा गया है कि राजनयिक और उनसे जुड़े किसी व्यक्ति, उनके आवास और संपत्ति की रक्षा करना उस देश की प्राथमिक जिम्मेदारी है जिसमें वह तैनात है। अभी सात मार्च को ही भारत और पाकिस्तान के बीच महिलाओं, मानसिक रूप से बीमार और बुजुर्ग कैदियों की रिहाई पर सहमति बनी है और इस सद्भावनापूर्ण पहल का व्यापक स्तर पर स्वागत हुआ है, पर ताजा राजनयिक विवाद ऐसी अच्छी बातों में बाधा बन रहे हैं, जिसका खामियाजा अंतत: जनता को ही उठाना पड़ेगा।

 

 


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