घाट घाट का पानी : मेरी पेटि-बुर्जुआ फ़िसलन

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अरुणादी (अरुणा आसफ़ अली) बर्लिन आई हुई थीं. पार्टी परिवारों से आये छात्रों और पूर्वी जर्मनी में लंबे समय से रह रहे भारतीय कामरेडों से एक मुलाक़ात में उन्होंने अचानक सवाल किया: क्या वजह है कि हमारे बच्चे समाजवादी देशों में पढ़कर कम्युनिस्ट विरोधी हो जाते हैं. वरिष्ठ कामरेडों की परेशानी देखने लायक थी. उनमें से एक ने समझाने की कोशिश की कि समाजवादी निर्माण में अनुशासन और कभी-कभी कठोर होने की ज़रूरत होती है. भारत के पूंजीवादी उदारवाद के माहौल से आए हुए ये बच्चे इसे समझ नहीं पाते हैं.

मैं खामोश था. समाजवादी अनुशासन के पहले क़दम से सदमे में था. विभाग के बाहर किसी से बात नहीं कर सकता था. पार्टी के नेता जब बर्लिन आते थे, वे चाहते थे कि हम समाजवाद की तारीफ़ करें और कुछ अपनी आस्था के साथ व कुछ मजबूरी में मैं भी यही करता था. विभाग के साथी और ख़ासकर फ़्रीडमान्न समझाने की कोशिश कर रहे थे कि यह सब मामूली बात है. कुछ महीनों में सब ठीक हो जाएगा. क्रिस्टा के रुख़ से लग रहा था कि उसे पहले से ही पता था कि ऐसा कुछ होने वाला है, लेकिन उसका सिगरेट पीना बेहद बढ़ गया था.

मेरी निजी ज़िंदगी भी एक नये मोड़ पर थी. मेरी भारत यात्रा के दौरान अपनी दोहरी ज़िंदगी से परेशान होकर मारिता अपने जीवनसाथी से अलग हो चुकी थी और एक दोस्त के फ़्लैट में चार साल की बच्ची के साथ रह रही थी. उसके साथ मेरे रिश्ते में कोई वादा न था, और मैं समझ रहा था कि इस वजह से मेरी कोई ज़िम्मेदारी भी नहीं है. इस बीच भारत से मुझे कोमल हाथों का धक्का मिल चुका था. शायद वह एक हल्का सा धक्का था, लेकिन मैंने उसे तुरंत स्वीकार कर लिया. शायद मैं जान गया था कि अब मुझे एक दूसरी ज़िंदगी जीनी पड़ेगी. एक सुहानी रात को, जब मारिता मेरी बांहों में थी, मैंने उससे कहा: तुम्हें सबसे पहला जानना पड़ेगा कि तुम चाहती क्या हो. और फिर पूरे फ़ैसले के साथ उसे कहना पड़ेगा, उस पर अमल करना पड़ेगा.

मेरी ओर एकटक देखते हुए मारिता ने कहा था: मैं तुम्हारे साथ जीना चाहती हूं.

यह एक फ़ैसला था.

मैं रेडियो से मिले 20 वर्ग मीटर के एक छोटे से आधुनिक दड़बे में रहता था. वहां एक बच्चे के साथ रहना संभव नहीं था. फ़्रीडमान्न ने मदद की और रेडियो से मुझे एक डेढ़ कमरे का फ़्लैट मिला. हम वहां रहने लगे. बिना किसी कोशिश के मैं सातवें आसमान पर पहुंच चुका था. मेरा निठल्लापन और आवारापन अब ख़त्म हो चुका था. उसकी जगह अब मैं पारिवारिक ज़िम्मेदारी महसूस कर रहा था, सीख रहा था. जर्मन मापदंड के अनुसार हमारे पास कुछ नहीं था, लेकिन हम सुखी थे. मारिता खिल रही थी और विभाग में इसे भी मेरी ख़ूबी माना जा रहा था. उसकी हिंदी भी काफ़ी बेहतर हो गई थी. मेरी जर्मन भी. वह मुझसे एक बच्चा चाहती थी, मैं भी चाहता था. 1982 के आरंभ में वह गर्भवती हुई. मई में हमने शादी की अनुमति के लिये आवेदन किया. पूर्वी जर्मनी में विदेशियों से शादी करने के लिये एक विशेष विभाग से अनुमति लेनी पड़ती थी और हेलसिंकी समापन दस्तावेज़ के बावजूद गैर समाजवादी देशों के नागरिकों के साथ शादी की अनुमति बहुत मुश्किल से मिलती थी.

इस बीच मेरा आयरिश दोस्त नायल अपनी जीवनसंगिनी के साथ ‘पीस, फ़्रीडम ऐंड सोशलिज़्म‘ पत्रिका के संपादकीय विभाग में आयरिश कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में चला गया था. उसने हमें प्राग आने का न्योता दिया था और गर्भवती मारिता के साथ में तीन-चार दिनों के लिये प्राग गया. मेरे राजनीतिक अभिभावक सारदा मित्र वहां भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि थे. हम दोनों उनसे मिले. अच्छी बातचीत हुई. मैंने उन्हें बताया कि हम शादी करना चाहते हैं. दो महीने बाद वह बर्लिन आये. फिर मुलाक़ात हुई. इस बार वे कुछ नाराज़ दिखे. शांत स्वर में उन्होंने पूछा: तुमने शादी के लिये ऐप्लाई की है. मेरे हामी भरने पर उन्होंने कहा: तुम्हें तो पता है, ये लोग शादी के नाम पर कितना चिढ़ते हैं. वापस भेज देंगे तो क्या करोगे? मुझसे कोई जवाब देते नहीं बन पड़ा.

बाद में मुझे पता चला कि पूर्वी जर्मन पार्टी की केंद्रीय समिति में भारत के लिये ज़िम्मेदार विभाग के प्रधान बीडरमान्न से उनकी तीखी बातचीत हो चुकी थी. बीडरमान्न ने कहा था कि शादी की अनुमति नहीं दी जाएगी और इस लड़के को वापस भेज दिया जाएगा. कामरेड मित्र ने उन्हें चेताया था कि अगर मैं हेलसिंकी समिति में शिकायत कर दूं तो उनके लिये परेशानी हो जाएगी. साथ ही उन्होंने कहा था कि अगर सिर्फ़ शादी की वजह से मुझे वापस भेजा जाता है, तो भारतीय पार्टी इससे ख़ुश नहीं होगी.

बहरहाल, इसके बाद हमें बिना किसी परेशानी के शादी की अनुमति मिल गई. जुलाई, 1983 में हमने शादी की. शादी से पहले फ़्रीडमान्न भारत गये हुए थे. मेरे भाई से उनकी मुलाक़ात हुई. उन्होंने कहा कि हम शादी करने वाले हैं. मेरे भाई की संक्षिप्त टिप्पणी थी: किसने सोचा था कि दादा शादी करके घर बसाएगा.

इस बीच समाजवादी जीवन की तस्वीर पेश करने का तरीका एक छोटा-मोटा सूपर हिट हो चुका था. मेरा ग्राफ़ फिर ऊपर जाने लगा था. मैं आम ज़िंदगी की अक्सर बेमतलब चीज़ों और घटनाओं में उभरते समाजवाद के मूल्यों को दिखाने की कोशिश करता था. मुझसे कहा गया कि रेडियो के कर्मचारियों की सभा में मैं अपने इस कार्यक्रम के अनुभवों के बारे में बताऊं. मेरा भाषण कुछ सबवर्सिव था. मसलन, मैंने कहा था: आप तुच्छ घटनाओं में महत्वपूर्ण तथ्य ढूंढ़िये, कभी-कभी अपनी राय भी दे सकते हैं, लेकिन निष्कर्ष कतई नहीं. निष्कर्ष लेने का अधिकार श्रोता का है. साथ ही मैंने कहा था: हमें समस्यायें दिखानी पड़ेंगी. हर समस्या स्पष्ट करती है कि विकास के किस चरण तक हम पहुंच चुके हैं. सदारत करते हुए महानिदेशक ने मुझे टोकते हुए टिप्पणी की थी: बहुत सारगर्भित बात है. मैं जानना चाहूंगा कि आप कैसे समस्यायें दिखाते हैं.

एक हफ़्ते बाद आदेश आया कि मुझे लिखने के बदले अनुवाद और दूसरों के आलेखों के संपादन पर ज़ोर देना पड़ेगा. विभाग को मेरे भाषाज्ञान का बेहतर इस्तेमाल करना है.

इसके दो हफ़्ते बाद मुझे लाइव समाचार पढ़ना था. लाल बत्ती का सिगनल मिला. मेरी आवाज़ अटकी हुई थी. काफ़ी कोशिश के बाद भी आवाज़ नहीं निकली. टेप चला दिया गया. कार्यक्रम के अंत में एक दूसरे साथी ने समाचार पढ़ा.

अगले हफ़्ते फिर यही हालत. मुझे लाइव प्रोग्राम से हटा लिया गया. निर्णय लिया गया कि मुझे मनोचिकित्सक के पास जाना पड़ेगा. रेडियो में ही एक मनोचिकित्सिका थी. हफ़्ते में एकबार मेरी एक घंटे की सीटिंग होने लगी, जो छह महीनों तक चली.


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