चुनाव चर्चा: बायीं करवट लेता जर्मनी!

चन्‍द्रप्रकाश झा चन्‍द्रप्रकाश झा
काॅलम Published On :


डॉयच्लान्ट् यानि फेडरल रिपब्लिक ऑफ जर्मनी( संघीय जर्मनी गणराज्य ) के रविवार के चुनाव के घोषित परिणामों ने नई सहस्त्राब्दी में नए वामपंथ के नए द्वार खोल दिए हैं। लेकिन ये वो वामपंथ नहीं है , जिसका सपना जर्मनी के ही दार्शनिक, अर्थशास्त्री, इतिहासकार, राजनीतिक सिद्धांतकार और पत्रकार , कार्ल मार्क्स (1818 -1883)  ने देखा था. 

फिर भी यूरोप की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के इस देश का ये चुनावी परिणाम कुल मिलाकर वाम की जीत और दक्षिणपंथ की वैचारिक हार है. वैसे इस चुनाव में एक तरह से सभी सियासी दल हारे हैं। किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। 

आधुनिक जर्मनी के गठन के 72 बरस बाद पहली बार इस चुनाव से उभरे अत्यंत ही जटिल सियासी समीकरण में टिकाऊ सरकार कायम करने के लिए कोई गठबंधन बनाना आसान नहीं होगा। चुनाव में सबसे बड़ी सियासी ताकत के बतौर सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसडीपी) उभरी है। सवाल है चांसलर (प्रधानमंत्री) पद के लिए उसके चुनाव–पूर्व ही घोषित दावेदार, ओलाफ़ शॉलज़ नई सरकार बनाने नया गठबंधन तैयार नहीं कर पाते है तो क्या होगा? 

जवाब है फिर निवर्तमान चांसलर ( प्रधानमंत्री ) आंगेला मैर्केल की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) की तरफ से चांसलर पद के घोषित दावेदार आर्मीन लाशेट  कोई जुगत भिड़ाएंगे। जों जटिल समीकरण उभरे है उसमें किसी भी टिकाऊ गठबंधन में कम से कम तीन सियासी दलों को शामिल होना पड़ेगा।

 

आंगेला मैर्केल

जर्मनी के राष्ट्रपति फ्रैंक वाल्टर स्टिनमिअर के करीबी एक सूत्र के मुताबिक देश में नई सरकार बनने तक आंगेला मैर्केल चांसलर बनी रहेंगी। 

17 जुलाई को पैदा हुईं और 1998 में विवाह कर चुकी आंगेला मैर्केल अभी 67 बरस की हैं। उन्हें भारत सरकार की तरफ से इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार मिल चुका है। उन्होंने 2018 में घोषणा की थी कि वे पांचवीं बार इस पद के लिए आगे नहीं आएंगी । मार्कल जर्मनी की सिर्फ चांसलर ही नहीं थी। वह पिछले 15 बरस के अपने राज से पूरे यूरोप की प्रभावशाली नेता बन गई थीं। दूसरे विश्व युद्द में भारी तबाही झेलने के बाद पहली बार जर्मनी यूरोप के नेतृत्वकारी भूमिका में आ गया और उसका घरेलू नवनिर्माण आगे बढ़ा।

वोट शेयर 

जर्मनी की संसद के भारत की लोक सभा की तरह के निचले सदन के नए गठन के लिए चुनाव के तहत रविवार कराये मतदान के परिणामों में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरी है। मतदान प्रतिशत पिछली बार से कम ही बताया जाता है जिसका कारण कोरोना कोविड महामारी की नई लहर का खौफ बताया जाता है। 

देश की सत्ता में 2005 के बाद से पिछले 15 बरस से काबिज इस पार्टी की निवर्तमान चांसलर एंजेला मार्केल नई सरकार का नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं हैं। उनके रूढ़ीवादी नेतृत्व का अंत हो गया है। एसपीडी के साथ आंगेला मैर्केल सरकार में शामिल हर दल को 30 फीसद से कम ही वोट मिले है। सन 1945 में गठित एसपीडी को इतने कम वोट पहले कभी नहीं मिले थे।

नई सरकार बनाने वास्ते नए गठबंधन के लिए विभिन्न सियासी पार्टियों के बीच बातचीत जारी है। इनमें पर्यावरणवादी ग्रीन्स पार्टी और पूँजीपतियों की पसंदीदा लिबरल फ्री डेमोक्रेटिक (एफडीपी) भी शामिल हैँ.

चुनाव परिणामों के मुताबिक मध्यमार्गी-वामपंथी रूझान की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) 25.5 फीसदी वोट हासिल कर सबसे रही। मार्केल के सीडीयू और सीएसयू गठबंधन को 24.5 फीसदी वोट मिले हैं। किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने से नई सरकार बनाने के लिए नए सिरे से गठबंधन कायम करने के प्रयास जारी है। इसमें ग्रीन्स और एफडीपी के शामिल होने की संभावना है। 

दक्षिणपंथी पार्टियों ने 2017 के पिछले चुनाव के बाद अपना जन-समर्थन कुछ खोया है। लेकिन साफ है कि वे अपना मूल आधार काफी हद तक बचाये रख सकते हैं।  

चांसलर पद के लिए सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसडीपी) के दावेदार ओलाफ़ शॉलज़् रविवार को बर्लिन में एक सार्वजनिक मंच पर पहुंचे तो वहाँ इस पार्टी के बड़ी संख्या में एकत्रित समर्थकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया। जाहिर है जर्मन नागरिकों ने सत्ता में बदलाव के लिए वोट दिए। 

लेकिन तथ्य यह है कि मौजूदा चांसलर एंजेला मार्कल की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी (सीडीपी) को एसडीपी से केवल 1.6 प्रतिशत ही कम वोट हासिल हुए है। सीडीपी को उसके चुनावी इतिहास में अबतक का सबसे कम 24.1 प्रतिशत ही वोट शेयर मिल सका है।

एसडीपी को कुल मतदान का  25.7 फीसद हिस्सा मिला है। साफ बात है कि सीडीपी को नई सरकार का गठन करने के लिए समविचारी दलों के साथ गठबंधन करना होगा ।

चांसलर पद के लिए सीडीपी के दावेदार आर्मीन लाशेट चुनाव प्रचार के शुरुआती दौर में आगे लग रहे थे लेकिन वह भारी गलतियों से बाद में पिछड़ते चले गए। उन्होंने जर्मनी मे बड़ी संख्या में बेरोजगार युवाओ को आकर्षित करने की कोई ठोस योजना सामने नहीं रखी। 

लेकिन लाशेट ने चुनाव परिणाम निकलने के घंटे भर के भीतर ही सीडीपी मुख्यालय पहुँच ऐलान किया कि हालांकि उनकी पार्टी दूसरे स्थान पर है लेकिन वह सरकार बनाने की पूरी कोशिश करेगी।

सीडीपी को धुर दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एएफडी) और फ्री डेमोक्रेट का भी समर्थन मिल सकता है। 

कम्युनिस्ट- वामपंथी दलों का वोट शेयर संसद में सीट हासिल करने के लिए आवश्यक न्यूनतम पाँच प्रतिशत से कुछ कम बताया जाता है। उनका वोट शेयर पिछले चुनाव से बढ़ नहीं सका तो कम भी नहीं हुआ है। 

 

केदार भवे 

नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ( जेएनयू) में जर्मन भाषा एवं साहित्य में एमए और आगे की भी शिक्षा हासिल करने के बाद अभी महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र के अपने पैट्रिक गाँव , रोहा में ही एक मल्टीनेशनल कंपनी के आला अधिकारी केदार भवे ने जर्मनी के चुनाव परिणाम आने के तुरंत बाद इस स्तंभकार से फोन पर लंबी बातचीत में कहा कि कोरोना कोविड-19 महामारी से पूरी दुनिया आर्थिक संकट में है और बेरोजगारी बढ़ी है। यूरोप और खासकर जर्मनी में युवाओं के बीच बेरोजगारी बहुत ज्यादा बढ़ी है। 

यूरोपीय संघ के सभी 28 सदस्य देशों में बेरोजगारी पर यूरोस्टेट द्वारा प्रकाशित सूची के अनुसार यह दर जर्मनी में 2015 में 7.1 प्रतिशत थी जिसके अभी दहाई संख्या में पहुँच जाने का अनुमान है।

मार्केल के उत्तराधिकारी को कोरोना से उबरने के लिए हासिल कर्ज को निपटाने की समस्या भी होगी। इसके लिए कर बढ़ाने की आशंका है। आर्मिन लाशेत चुनाव प्रचार में कहते रहे कि महामारी से उबर रहे जर्मनी में कर बढ़ाना सही नहीं होगा । लेकिन शोल्ज अमीरों पर कर बढ़ाने की हिमायत करते रहे है। 

 

ग्रीन्स

पर्यावरणवादी ग्रीन्स पार्टी भी चुनाव प्रचार के शुरुआती दौर में आगे लग रही थी। पर बाद में वह बहुत आगे नहीं बढ़ सकी। फिर भी उसे अपने चुनावी इतिहास में सर्वाधिक सफलता मिली है। ग्रीन्स और व्यापारियों की समर्थक ‘ फ्री डेमोक्रेट पार्टी ‘ की नई सरकार के गठन में बड़ी भूमिका हो सकती है। ग्रीन्स पार्टी और एसडीपी के साथ 1997 से 2005 तक सांझा सरकार चलाई थी। इसे जर्मनी के मीडिया हल्कों में ‘ रेड–ग्रीन गवर्नमेंट ‘ भी कहा गया था। 

जर्मनी की उत्तरी सीमा पर उत्तरी समुद्र,  डेनमार्क और बाल्टिक समुद्र, पूरब में पोलैंड और चेक गणराज्य, दक्षिण में आस्ट्रिया और स्विट्ज़रलैंड और पश्चिम में फ्रांस, लक्सेम्बर्ग, बेल्जियम और नीदरलैंड है। इसकी राजधानी बर्लिन है। मध्य यूरोप में स्थित जर्मनी का कुल क्षेत्रफल 357021 वर्ग किलोमीटर और आबादी 2018 के आंकड़ों के मुताबिक 8.28 करोड़ है| 

 

कार्ल मार्क्स 

कार्ल मार्क्स के आकलन के हिसाब से सर्वहारा क्रांति सबसे पहले ब्रिटेन या जर्मनी में होनी चाहिए थी. लेकिन पहली सर्वहारा क्रांति रूस में जारशाही के विरुद्ध व्लादिमीर लेनिन के बोलशेविक नेतृत्व में हो गई. ये सब तो ठीक था पर बीच में कुछ गड़बड़ हो गया, जो जर्मनी के ही समाजशास्त्री कार्ल मैक्स वेबर ( 1864 – 1920) के ‘ द प्रोटेस्टेंट एथिक्स एंड द स्पिरिट ऑफ कैपिटेलिजम ‘ क्लासिक थ्योरी में वर्णित है। इस थ्योरी के तक़ाज़े ने पूंजीवाद की नाक में दम कर दिया. इसके फलस्वरूप जर्मनी में ‘ ब्लू नन ‘ ब्रांड तक के जिन बनने लगे जिनकी बिक्री से होने वाले मुनाफा का एक निश्चित हिस्सा इसाइयों के प्रोटेस्टेंट समुदाय की धार्मिक संस्था, चर्च को दिया जाता है। 

ईसाईयों के कैथोलिक समुदाय के लिए इस तरह का पूंजीवादी व्यवसाय वर्जित है। लेकिन पूंजीवाद तो पूंजीवाद है। इसलिए उसने जर्मनी में पहले तो अडोल्फ़ हिटलर को खड़ा किया। फिर उसने तरह -तरह के सियासी प्रयोग करने के बाद पिछले 15 बरस के तीन चुनाव में एक रूढ़ीवादी महिला, आंगेला मैर्केल के नेतृत्व में सीडीयू को ही सत्ता सौंपी। 

मार्क्स जिस वक़्त में सर्वहारा क्रांति के अधिनायकत्व पर लिख रहे थे वह ब्रिटिश हुक्मरानी के साम्राज्य में पूंजीवाद के दुनिया में पसरने दौर था। भारत समेत बहुत सारे देश उसके उपनिवेश बन गए थे। पर क्रान्ति के बीज जर्मनी में मार्क्स के जीवनकाल में ही अंकुरित हो गए थे. 

कार्ल मार्क्स की छोटी बेटी, एलोनोर मार्क्स इवलिंग ने न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून में फ्रेडरिक एंगेलस और कार्ल मार्क्स के 1851 से प्रकाशित डिसपैचों के आधार पर “रिवोल्यूशन  एंड काउंटर-रिवोल्यूशन इन जर्मनी” नाम की जो किताब कम्पाइल की है उसमें जर्मनी में क्रांति के बीजारोपण के संकेत हैं।

 

आगे क्या होगा ? 

नई सरकार के गठन में खासा वक़्त लग सकता है। इस कारण यूरोप के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में सियासी संकट बढ़ने का असर पूरे क्षेत्र पर पड़ने की आशंका उत्पन्न हो जाएगी। पूरा यूरोप कोरोना कोविड-19 महामारी के नए दौर की चपेट में है। यूरोप के एक और बड़े देश फ्रांस में अगले बरस वसंत ऋतु में निर्णायक चुनाव होने हैं।  

 

ग्युंटर ग्रास की कविता : घोंघा 

महान जर्मन साहित्यकार ग्युंटर ग्रास (16 अक्टूबर 1927-13 अप्रैल 2015) ने जर्मनी में हिटलर के नाजीवाद और विश्वयुद्ध में हार के अपराध बोध को 1959 में प्रकाशित उपन्यास द टिन ड्रम ’ में दर्शाया है जिसके लिए उन्हें 1999 का नोबेल साहित्य पुरस्कार मिला था. बाद में इस पर बनी फ़िल्म को ऑस्कर पुरस्कार मिला. संदर्भ है इसलिए उनकी एक चर्चित कविता ‘ स्नेल ‘ पेश कर रहे जिसका ‘ घोंघा ‘ शीर्षक से भावानुवाद हमने जेएनयू में पढ़ाई के दौरान किया था। वह कविता दिल्ली के दौलत राम कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे दिवंगत डीआर चौधरी के सम्पादन में रोहतक (हरियाणा) के पाक्षिक अखबार ‘ पींग ‘ के मई 1885 अंक में छपी थी। इसमें जीवन अस्तित्व की सुरक्षा के लिए सहज कवच की जरुरत के जों भाव उभरते है उनका कोविड महामारी से उत्पन्न वैश्विक हालात और खास कर जर्मनी की मौजूदा राजनीतिक–सामाजिक स्थिति से कुछ साम्य नज़र आ सकता है. 

 

सात वर्षों से घाघा की बाट जोह रहा हूँ मैं 

और अब तक भूल चुका हूँ 

उस जल जीव को 

कैसा होता है घोंघा देखने में

जब वह सामने आया

नग्न संवेदनशील 

मैंने यही नाम ढूँढने की कोशिश की 

मैंने कहा अनुभव, धैर्य, भाग्य 

घोंघा बगल से निकल गया 

बिल्कुल चुपचाप

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।


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