सीपी कमेंट्री: संकट में रहेगा बिहार में चोर दरवाज़े से मिली सत्ता का भविष्य!

चन्‍द्रप्रकाश झा चन्‍द्रप्रकाश झा
काॅलम Published On :


हिंदू वर्चस्व और मुस्लिम पहचान की सियासत  नहीं चलेगी

 

भारत में हिंदू वर्चस्व और मुस्लिम पहचान की सियासत नई नही है. भारत के 1857 के सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम और 1947 में समाप्त हुए स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने में अंग्रेज शासकों के फूट डालो राज करो की रणनीति के तहत इस सियासत को खूब हवा दी गई. उसकी त्रासद परिणति अविभाजित भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता प्रदान करने की ब्रिटिश हुक्मरानी की शर्तों के तहत इस विशाल देश का हिंदू और मुस्लिम बहुल दो भौगोलिक भागों में बंटवारा है. इस निष्कर्ष को इतिहास झुठ्ला नहीं सकता. फिर भी इस बंटवारे की वजह से सामने आये रक्तपात भरे सबसे बडे विस्थापन से कोई खास सबक नहीं लिया गया. 

 

स्वतंत्रता आंदोलन

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बनी हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग जैसी सियासी पार्टियाँ आजादी के पहले दोनो भागों के कुछेक सूबों की सत्ता में आईं और एक दूसरे ही नहीं कांग्रेस जैसे अन्य के साथ भी साझीदार रहीं. इन सियासतदानों में मुस्लिम लीग के शिखर नेता मोहम्मद अली जिन्ना ही नहीं बल्कि  सावरकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और उत्तर प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गोरखनाथ पीठ के महंत रहे दिग्विजयनाथ जैसे नेता भी थे।

अंग्रेज शासकों के बोरिया बिस्तर समेट कर सात समुंदर पार चले जाने के बाद आज भी उनकी तरह की कई सियासी पार्टियाँ और उनकी सियासत, नये बने दोनो ही मुल्कों में कमोबेश कायम है. सोचने की बात है कि बिहार इससे कैसे अछूता रहता और कब तक उसे इस सियासत से निज़ात मिल सकेगी? बिहार क्या कोई भी ऐसा अलग-थलग सूबा नही हो सकता है जिस पर साम्प्दायिक हिंदू वर्चस्व और मुस्लिम पहचान की सियासत का अल्पकालिक या दीर्घकालिक असर न पड़े। 

सन 1947 में ब्रिटिश हुक्मरानी से मिली राजनीतिक आजादी के पहले हैदराबाद अलग सूबा था जिसके ब्रिटिश राजसत्ता के अधीन शासक मुस्लिम निज़ाम थे. अंग्रेज राज ने भारत से जाते जाते भी कुटिल चाल लकर हैदराबाद, कश्मीर , आदि सभी देसी रियासतों को छूट दे दी थी कि वे चाहे तो हिंदू या मुस्लिम बहुल किसी भी भू-भाग में शामिल हो जायें या फिर बिल्कुल अलग मुल्क के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान कायम करें. 

सैकड़ों मील की दूरी और सांस्कृतिक–भाषाई भिन्नता के बावजूद और सिर्फ धर्म के नाम पर पाकिस्तान के पश्चिमी और पूर्वी हिस्से का एक ही देश के रूप में अस्तित्व में आना राष्ट्र , राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद की राजनीतिक तर्किकता  से परे था. इसका अंत 1971 मे पूर्वी पाकिस्तान में शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में अवामी पार्टी के लोकप्रिय आंदोलन के दौरान भारत–पाकिस्तान युद्ध के बाद पाकिस्तान ही नहीं उसके सैन्य सरपरस्त अमेरिका की भी चाहत के खिलाफ बांग्लादेश के रूप में स्वतंत्र सम्प्रभुता-सम्पन्न नये गणराज्य के रूप में अभ्युदय से हुआ.

भारत के राष्ट्रगान , जन गण मन गण के रचियता गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर की ही एक और कविता – ‘आमार सोनार बांग्ला आमी तुमाय भालो बासी’- बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना. ये सत्य, सिर्फ धर्म के नाम पर सियासत करने वालों के मुंह पर करारा तमाचा था. पर इस सत्य को सियासत में पचने के लिये शायद अभी और समय की दरकार है. 

बहरहाल, हैदराबाद के पूर्ववर्ती निज़ाम ने अंग्रेजो की उस कुटिल चाल का फायदा उठाकर स्वतंत्र भारत के घोषित सेक्युलर संविधान के खिलाफ उसके बीचो-बीच मुस्लिम मुल्क कायम करने की कोशिश की. वो चाल हैदराबाद के लोकतंत्र प्रेमी अवाम की चाहत के अनुरूप भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु और गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की सूझबूझ से विफल हो गई. उसकी कहानी इतिहास में वर्णित है. 

 

असदुद्दीन ओवैसी – ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तहादुल मुसलमीन 

मुस्लिम पहचान के  साथ हैदराबाद से लोकसभा सदस्य असदुद्दीन ओवैसी और उनकी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तहादुल मुसलमीन ( एआईएमआईएम) की सियासत नई नहीं है. हैदराबाद आंध्र प्रदेश से पृथक बनाये नये राज्य तेलंगाना की और आंध्र की भी तब तक के लिये राजधानी है जब तक आंध्र की नई राजधानी विकसित नहीं हो जाती है. ओवैसी को तेलंगाना के मुख्यमंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रमुख चंद्रशेखर का करीबी माना जाता है. 

ओवेसी की पार्टी ने इस बार बिहार चुनाव में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से मिल कर डेमोक्रेटिक ग्रैंड सेकुलर फ्रंट ( डीजीएसएफ ) बनाया था. बिहार विधानसभा की पहले भी एक सीट जीत चुकी ओवैसी की पार्टी को इस बार पाँच सीट मिली है. लेकिन ये सभी सीट उस सीमांचल क्षेत्र में सीमित है जहाँ बरसों से काँग्रेस, भाजपा, राजद भी मुस्लिम पहचान की सियासत को हवा देते रहे हैं.

 

किशनगंज

भाजपा मे आकर मोदी सरकार में मंत्री बने और फिर मी टू की चपेट में मंत्री पद से हाथ धो बैठे पूर्व पत्रकार और अभूतपूर्व सियासतदाँ एम.जे अकबर इसी क्षेत्र की किशनगंज लोकसभा सीट से दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के जमाने में कांग्रेस की टिकट पर जीते थे. बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी से जुडे रहे सैय्यद शाहबुद्दीन भी किशनगंज से ही चुनाव लड़े थे जहाँ के वोटरो में मुस्लिम करीब 70 प्रतिशत माने जाते हैं. 

 

देवेन्द्र प्रसाद यादवयूनाइटेड डेमोक्रेटिक सेक्युलर अलायंस

केंद्र में एच.डी देवेगौड़ा एवम मरहूम इंद्र कुमार गुजराल सरकार में मंत्री रहे और झंझारपुर से सात बार सांसद देवेन्द्र प्रसाद यादव का समाजवादी जनता दल (डेमोक्रेटिक) की यादव–मुस्लिम पहचान की भी सियासत बिहार के लिए नई नहीं है. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एवम् राष्ट्रीय जनता दल के संस्थापक अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव, आंग्ल प्रथम अक्षरों के युग्म शब्द ‘ माई ‘ (मुस्लिम–यादव) के इस राजनीतिक रसायन शास्त्र के जनक माने जाते हैं. 

देवेन्द्र यादव ने कुछेक छोटे दलों से मिल कर इस चुनाव में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक सेक्युलर अलायंस ( यूडीएसए ) नामक मोर्चाबंदी की थी.  इस मोर्चा को खुद खास चुनावी सफलता नहीं मिली. लेकिन ये नई मोर्चाबंदी, राजद के महागठबंधन के लिये नुकसानदेह और भाजपा के एनडीए के लिए मददगार साबित हुई. 

राज्य में यादव और मुस्लिम वोट ज्यादा से ज्यादा बंट जायें, ये भाजपा की चाहत और चुनावी रणनीति थी. देवेन्द्र यादव खुद इस मोर्चा के संयोजक और अख्तरुल ईमान सह-संयोजक हैं. दोनों राजद की ही सियासी कोख से निकले हैं. 

भाजपा की उसी फूट डालो राज करो की चुनावी चाल के अनुरूप दिवंगत केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के पुत्र एवम बिहार के ही जमुई से लोकसभा सदस्य चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी ( एलजेपी ) मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विरोध में जनता दल यूनाइटेड और भाजपा के एनडीए से बाहर निकल गई. 

 

अस्सी नब्बे पूरे सौ , सौ में लगा धागा, चोर निकल के भागा

मीडिया विजिल पर चुनाव चर्चा कॉलम के 6 अक्टूबर 2020 के अंक की हेडिंग थी : ‘बिहार चुनाव, अस्सी नब्बे पूरे सौ, सौ में लगा धागा, चोर निकल के भागा’. बिहारी बच्चों के इस पुराने ‘सूई–धागा खेल’ में धावक को सूई की नोंक में धागा डालने के साथ दौड़ लगानी पडती है. इसमें बाल मनोविग्यान निहित है कि बच्चों को सूई की नोंक में धागा डाल लेने की कामयाबी के साथ दौड़ कर मंजिल पर पहुंचना है. 

हमने लिखा था, ‘ये न हो कि मंजिल तक पहुंचने से पहले धागा सूई की नोंक के पार चला जाये.’ जीत लेने के पूर्व अनुमान से उत्साह में मंजिल तक पहुँचते-पहुँचते धावक के हाथ में थामी सूई की नोंक से पार निकल चुका धागा अंततः एक तरफ और सूई दूसरी तरफ रह जाये. इस खेल में बच्चो को नसीहत मिलती है कि वे जीवन की प्रतिस्पर्धा में हर कार्य को पूरा करने में प्रयोगशाला में वैग्यानिको के परीक्षण में अनिवार्य ‘क्लिनिकल एक्युरेसी’ बरतने पर ध्यान दें. 

बहरहाल लगता नहीं है कि बिहार में हिंदू वर्चस्व और मुस्लिम पहचान की सियासत करने वाली पार्टियों ने इस बाल खेल से कोई खास सबक लिया है।वे चुनाव जीत लेने की खुशफहमी में सराबोर लगते हैं. सत्ता में चोर दरवाजा से दाखिल होने की उनकी जुगत देर सबेर टाँय-टाँय फिस्स हो जाये तो अचरज नहीं होनी चाहिये. 

 

*सीपी नाम से चर्चित लेखक चंद्रप्रकाश झा ,युनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया के मुम्बई ब्यूरो के विशेष संवाददाता पद से रिटायर होने के बाद तीन बरस से अपने गांव में खेतीबाड़ी करने और स्कूल चलाने के साथ ही स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन भी कर रहे हैं. उन्होने भारत की आज़ादी, चुनाव, अर्थनीति, यूएनआई का इतिहास आदि विषय पर कई ई-किताबे लिखी हैं. वह मीडिया विजिल के चुनाव चर्चा के स्तम्भकार हैं. वह क्रांतिकारी कामरेड शिव वर्मा मीडिया पुरस्कार की संस्थापक कम्पनी पीपुल्स मिशन के अवैतनिक प्रबंध निदेशक भी हैं, जिसकी कोरोना- कोविड 19 पर अंग्रेजी–हिंदी में पांच किताबो का सेट शीघ्र प्रकाश्य है.

 


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