पहला पन्ना: कोविड काल में एम्बुलेंस के ड्राइवर नदारद और अख़बार से ख़बर!

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
काॅलम Published On :


 

आज जो खबरें पहले पन्ने पर नहीं हैं, होनी चाहिए थी 

  1. राहुल गांधी ने देश की मौजूदा स्थिति को मोविडमोदी निर्मित आपदा कहा है। ( हिन्दू, पेज सात)  
  2. अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल लैनसेट का संपादकीय, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्रवाइयांअक्षम्यहैं, सरकार को अपनी गलतियों की जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। ( टेलीग्राफ में है
  3. महाकुंभ के बाद नौवें संत (पंच दशम जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर) महंत विमल गिरि का कोविड से निधन। (टाइम्स ऑफ इंडिया, पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम)   
  4. बंगाल में चुनाव के बाद की हिंसा जारी। केंद्रीय गृह मंत्रालय की टीम बंगाल पहुंची। 
  5. रुड़ी के एम्बुलेंस के लिए ड्राइवर नहीं, पप्पू यादव ने उपलब्ध कराए लेकिन जवाब नहीं। (द हिन्दू में पहले पन्ने पर है) 
  6. प्रधानमंत्री ने टीके का पेंटेट खत्म करने की मांग की, ईयू ने कहा आयात पर पाबंदिया कम हों।  
  7. कनसेनट्रेटर आयात मामले में फर्म ने हाईकोर्ट की शरण ली, कहा जांच संदिग्ध है।

आज सुप्रीम कोर्ट ने टास्क फोर्स बनायापांच में से चार अखबारों में लीड है। हिन्दू में एक और बड़ी खबर है, डीआरडीओ ने कोविड-19 रोधी दवा का विकास कियापर यह दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। कुल मिलाकर, आज चारों अखबारों में बंगाल में हिंसा, असम में सरकार के गठन, भाजपा सांसद रुड़ी के एम्बुलेंस को लेकर विवाद आदि जैसी कई खबरें पहले पन्ने पर नहीं हैं। 

हिन्दू में, पप्पू (यादव) ने राजीव प्रताप रुड़ी के एम्बुलेंस बेड़े पर छापा मारा, तैनाती की मांग की शीर्षक से एक खबर है। कल सोशल मीडिया पर इस खबर की खूब चर्चा थी लेकिन आज यह मेरे पांच अखबारों में सिर्फ हिन्दू में पहले पन्ने पर है। इस खबर के अनुसार सांसदों को स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के तहत मिलने वाले धन से छपरा के भाजपा सांसद (और पूर्व मंत्री) राजीव प्रताप रुड़ी ने कुछ (30) एम्बुलेंस खरीद रखी हैं जो उनके गांव अमनौर के घर पर निजी गाड़ियों की तरह ढंक कर रखे हुए हैं और इस आपदा में उपयोग किए जाने की बजाय घर के पार्किंग की शोभा बढ़ा रहे हैं। जब इसका खुलासा हुआ तो रुड़ी ने दलील दी कि ड्राइवर नहीं हैं इसलिए गाड़ियां खड़ी हैं या चल नहीं पा रही हैं। इस मामले में उनके अपने तर्क और स्पष्टीकरण है। पप्पू यादव ने खुलेआम 70 ड्राइवर देने की पेशकश की पर इसका क्या हुआ इस बारे में कोई खबर नहीं है। मेरा मतलब सिर्फ इससे है कि जवाब तो नहीं ही है, यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। मेरे ख्याल से आज के माहौल में यह खबर पहले पन्ने पर होनी चाहिए थी। एमपी लैड स्कीम के पैसों की बर्बादी और उससे संबंधित भ्रष्टाचार का मामला अपनी जगह है। एक समय कौशल विकास मंत्री रहे रुड़ी अपनी ही योजना के लिए 70 ड्राइवर नहीं बना पाए और लंबे समय से मंत्री नहीं हैंइस लिहाज से भी यह बड़ी खबर थी लेकिन वैसे ही गायब है जैसे गधे के सिर से सींग।  

यह स्थिति तब है जब कोविड-19 महामारी चरम पर है। जन अधिकार पार्टी के प्रमुख ने कहा, ‘‘लोगों को कोविड मरीज को एक किलोमीटर तक ले जाने के लिए भी 12,000 रुपये तक देने पड़ रहे हैं। एंबुलेंस की घोर किल्लत है और सारण के सांसद ने 100 एंबुलेंस को बिना इस्तेमाल के खड़ा कर रखा है। इसके जवाब और बचाव में सांसद ने जो किया और कहा वह मेरा विषय नहीं है पर यह सब खबर नहीं है तो आप समझ सकते हैं कि मीडिया आपको कैसी खबरें देता है। इस क्रम में इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर एक खबर है, “प्रत्येक परिवार में डर है : सरकार बचाव की मुद्रा में, भाजपा और आरएसएस के कार्यकर्ताओं में चिन्ता बढ़ी।शायद इसीलिए पप्पू यादव पर एफआईआर करवाई गई है कि वे जबरन सांसद के घर में घुस गए। ऐसे में मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि प्रचारकों को इंडियन एक्सप्रेस की यह खबर पसंद आएगी कि नहीं और पसंद आई होगी तो इसकी विज्ञप्ति भी बनी होगी और रीट्वीट भी किए गए होंगे। पर यह सब मुझे दिखा नहीं।

पप्पू यादव ने एक ट्वीट करके एंबुलेंस से बालू ढोने का वीडियो सार्वजनिक किया है।

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हेडलाइन मैनजेंमेंट 

इंडियन एक्सप्रेस में आज एक खबरवैक्सीन मैत्री’ पर है। इसका शीर्षक है, “जब मामले बढ़े और स्टॉक घटे, तो टीकों का ज्यादातर निर्यात वहां हुआ है जहां कोविड भारत के मुकाबले बहुत कम है।” इसी तरह हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दू में खबर है, “दिल्ली के मुख्यमंत्री ने कहा कि दिल्ली के पास 5-6 दिन के लिए टीकों का स्टॉक है। यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर नहीं है। प्रचार पाने और काम करने का भारत सरकार का अपना अंदाज है तो प्रचारकों का भी है ही। टाइम्स ऑफ इंडिया में आज खबर है कि नवनीत कालरा ने 7500 कंसनट्रेटर का आयात किया है। मीडिया ट्रायल और पुलिस लीक पर आधारित खबरों की तरह इसमें बताया गया है कि 13 करोड़ में 7500 कनसेनट्रेटर आयात किए गए थे और इनमें 1858 शुरू के तीन चार दिन में बेच दिए गए थे। ये 14 से 18 हजार रुपए में खरीदे गए थे कुछ 23-24 हजार में भी खरीदे गए थे और संभवतः 70,000 में बेचे गए। मुझे लगता है कि ये सारी सूचना मेरे जैसे पाठकों के लिए बेमतलब हैं। इससे नहीं पता चलता है कि इसमें कोई अपराध हुआ है और जैसा कि मैंने कल लिखा था, यह बतानेदिखाने की कोशिश है कि सरकार या सिस्टम काम कर रहा है। यहां उल्लेखनीय है कि इंडियन एक्सप्रेस ने आज पेज सात पर खबर छापी है कि फर्म ने हाईकोर्ट की शरण ली है और आरोप लगाया है कि यह जांच संदिग्ध है। कल की खबर के बाद कायदे से आज यह खबर भी पहले पन्ने पर होनी चाहिए थी। इसी तरह, टाइम्स ऑफ इंडिया में पेज आठ पर एक खबर है, प्रधानमंत्री ने टीके का पेंटेट खत्म करने की मांग की, ईयू ने कहा आयात पर पाबंदिया कम हों।”  इससे साफ है कि वास्तविक स्थिति की जानकारी विदेशों में भी है लेकिन भारत में हेडलाइन मैनजमेंट जो करवाए। इससे कारोबारियों में जो डर फैलेगा और कारोबार के साथ आवश्यक वस्तुओं (अभी कनसेनट्रेटर) की कमी होगी उसपर किसी का ध्यान नहीं है। मुझे नहीं पता किसी कारोबारी संगठन ने इस मामले में आवाज उठाई है कि नहीं। और अखबार क्यों सरकार की हर कार्रवाई को सही मान लेते हैं और हाईकोर्ट में अपील की खबर को अंदर कर देते हैं। 

देश में जब कनसनट्रेटर की जरूरत है, सरकार का काम कारोबार करना है नहीं तो यह सब कोई आयातक ही करेगा और अपनी सुविधा से बेचेगा। इसमें कुछ गैर कानूनी नहीं है। पहले से कुछ भी प्रतिबंधित नहीं था। कनसेनट्रेटर घोषित आवश्यक वस्तु नहीं है और अगर कनसेनट्रेटर को कनसेनट्रेटर ही बता कर नियमानुसार आयात किया गया है तो 70 हजार में बेचना आपदा में अवसर के बावजूद क्यों गैर कानूनी है? खासकर तब जब सरकार ने खुद टीकों की तीन कीमत स्वीकार की है। इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबर से लगता है कि सरकार ने टीकों के निर्यात में सहयोग किया है और निर्माता को बाजार उपलब्ध करवाये हैं और भारतीय नागरिकों के बाजार का उपयोग करने वाले नागरिकों या कारोबारियों को परेशान किया जा रहा है। टीके की ज्यादा कीमत (बच्चों के लिए) देना मुझे तो पसंद नहीं है पर कनसेनट्रेटर मुझे जरूरत होती तो 70,000 हजार में भी बुरा नहीं था। ऐसे में भारत सरकार कैसे काम कर रही है यह समझना मुश्किल है और अखबार इसे समझने में कोई सहायता नही कर रहे हैं। सरकार से जवाब पाना वैसे मुश्किल है। 

 

 

मोदी निर्मित आपदा 

द टेलीग्राफ सबसे अलग है। आज शीर्षक है, “चुनाव पूरे हुए, पीछे मुड़िये, देश का सामना कीजिए।  इसके तहत पहली खबर अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल द लैनसेट के संपादकीय के आधार पर है, गलतियों की जिम्मेदारी लीजिए, नेतृत्व कीजिए। इसमें लिखा है, लैन्सेट की अपील के तुरंत बाद आईएमए ने मोदी सरकार पर अनुपयुक्त कार्रवाई के आरोप लगाए। दूसरी खबर है, नेहरू की बनाई व्यवस्था को धन्यवाद। इसमें बताया गया है कि प्रधानमंत्री के लिए सबसे कटु टिप्पणी अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नहीं, उनके पुराने सहयोगी शिवसेना की है। सेना ने कहा है कि भारत सब कुछ झेल पाया क्योंकि पिछले प्रधानमंत्रियों – जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और मनमोहन सिंह ने ऐसी संरचना बनाई है। 

आज बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, नेपाल जैसे छोटे देश भारत की सहायता कर रहे हैं क्योंकि कोविड-19 के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। शिव सेना के मुख पत्र सामना ने अपने संपादकीय में कहा है भारत कोविड-19 को झेल पाया क्योंकि यहां नेहरू गांधी की बनाई व्यवस्था है वरना 125 करोड़ लोगों का जीवन नष्ट हो जाता है। तीसरी खबर का शीर्षक है, खून से सने हाथ और मिट्टी के पैर। यह दिल्ली की लेखिका विनीता मोक्की के पत्र पर आधारित खबर है जो उन्होंने अमेरिका स्थित मोदी भक्तों को लिखा है। इसका शीर्षक है, अमेरिकी मोदी भक्तों के नाम खुला पत्र। इसमें कहा गया है, “आपके भगवान के पैर मिट्टी के हैं और हाथ खून से सने हैं।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और मशहूर अनुवादक हैं।


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