पहला पन्ना: गंगा में 71 शव मिले, ख़बर आज भी गोल!


हुआ यह है कि कोरोना से निपटने में विदेशी मीडिया ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूमिका की आलोचना की थी। जवाब में या अतिरिक्त प्रचार के लिए एक देसी, “डेली गार्जियन” में छपी प्रधानमंत्री की प्रशंसा, “प्रधानमंत्री मोदी कठिन परिश्रम करते रहे हैं विपक्ष के झांसे में न आएं।”  इसके बाद भाजपा के बड़े-बड़े नेता ढिंढोरा पीटने वगे कि गार्जियन ने मोदी की तारीफ की है। बाद में पता चला कि डेली गार्जियन ब्रिटेन का गार्जियन नहीं है। वैसे तो ऐसा पहली बार नहीं हुआ है लेकिन द टेलीग्राफ ने पहली बार इसे इस अंदाज में छापा है। एक खबर यह भी है कि ‘अंबानी सेवा’ के लिए सुप्रीम कोर्ट की नौकरी से निकाले गए दो अधिकारियों को पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने ‘माफी’ दे दी थी।  


संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
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आज सरकार की प्रशासनिक कुशलता का नमूना द हिन्दू में है। इसके अनुसार गंगा में मिलने वाले शवों की संख्या 71 हुई और दूसरी खबर प्रचार कुशलता की है जो द टेलीग्राफ में छपी है। इसमें बताया गया कि देसी ‘गार्जियन’ की खबर को बड़े-बड़े भक्त चौकीदार असली गार्जियन की खबर समझकर या समझाने के लिए ट्वीट करते रहे। 

आज एक बड़ी खबर है, गंगा में मिलने वाले शवों की संख्या 71 हुई। बक्सर जिला प्रशासन ने इनका पोस्टमॉर्टम करके, डीएनए नमूने रखकर बाकायदा निपटान कर दिया। कल यह खबर हिन्दू में थी और आज भी यह खबर हिन्दू में ही लीड है। यह एक महत्वपूर्ण खबर थी और इसका कायदे से फॉलोअप होना ही चाहिए था पर टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर सिंगल कॉलम में है। शीर्षक है, गंगा में बह रहे शवों को लेकर बिहार, यूपी में आरोपप्रत्यारोप। आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में सब ठीक होने का दावा है और किसी कमी की रिपोर्ट करने वालों के खिलाफ एफआईआर की खबरें हैं। ऐसे में डर स्वाभाविक है और सीमा पार करने तक उत्तर प्रदेश में लोगों को शव नहीं दिखेयह कोई बड़ी बात नहीं है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के अधिकारी भी कैसे मान लें कि शव उत्तर प्रदेश से बहकर आए हैं। आखिर उन्हें भी नौकरी करनी है। इसलिए आरोपप्रत्यारोप की खबर का कोई मतलब नहीं है। वैसे भी, 71 शव मिलना ज्यादा बड़ी बात है। लेकिन संपादकीय विवेक भी कुछ होता है। हालांकि इसका उपयोग तस्वीरों पर ज्यादा करना चाहिए। यही नहीं, 25 शव उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में भी मिले हैं। हिन्दू में दो कॉलम की खबर है और टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे सिंगल कॉलम की खबर के साथ ही चलताऊ अंदाज में निपटा दिया है। इंडियन एक्सप्रेस और हिन्दुस्तान टाइम्स में दोनों खबरें पहले पन्ने पर नहीं है। और इस तरह उत्तर प्रदेश में सब ठीक है। 

वैसे, इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर है जो दूसरे अखबारों में नहीं दिखी। है तो यह सिंगल कॉलम की ही खबर है लेकिन दिलचस्प है। भ्रष्टाचार दूर करने की सरकारी की कोशिशों का पता इससे चलता है। इस खबर के अनुसार, भाजपा सांसद और पूर्व मंत्री राजीव प्रताप रुडी के यहांछापामारने के कुछ ही दिन बाद पूर्व सासंद पप्पू यादव को 1989 के एक मामले में गिरफ्तार कर लिया गया। निश्चित रूप से यह डबल इंजन सरकार की कार्यशैली है और आपने पढ़ा होगा कि पप्पू यादव ने सांसद के स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के धन से खरीदे गए कई एम्बुलेंस को उनके घर ढंक कर रखे होने का खुलासा किया था। कार्रवाई भाजपा सांसद रुड़ी के खिलाफ होनी चाहिए थी पर हुई पप्पू यादव के खिलाफ। खबर पहले पन्ने पर सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में है। यह खबर इसलिए भी दिलचस्प है और इसका फॉलोअप होना ही चाहिए क्योंकि सांसद ने एमपीलैड स्कीम से 70 के करीब एम्बुलेंस खरीदे हैं। पप्पू यादव के छापे में 30 खड़े मिले और बचाव में रुड़ी ने कहा कि ड्राइवर नहीं हैं जबकि वे खुद कौशल विकास मंत्री रह चुके हैं और अपने संसदीय क्षेत्र छपरा में चालक प्रशिक्षण केंद्र खोलने का भी प्रचार कर चुके हैं। एक पाठक के रूप में मैं जानना चाहता हूं कि सरकारी धन से 70 एम्बुलेंस खरीदना और उनमें से (करीब) 35 पर नियंत्रण बना होना और 35 के जनसेवा में लगे होने का दावा बताता है कि (पूर्व) मंत्री एम्बुलेंस कंपनी चला रहे थे। पप्पू यादव गिरफ्तार नहीं होते तो इसकी पुष्टि होती पर अब क्या किया जाए। अखबारों से खबर की उम्मीद कर सकते हैं

 

जाहि विधि रखे राम 

आज की खबरों से लगता है कि आम जनता के पास जाहि विधि रखे राम … (मोदी सरकार) ताहि विधि रहियों का भी कोई विकल्प नहीं है। पहले प्रचारक कहते थे कि नरेन्द्र मोदी का विकल्प नहीं है पर अब जनता के पास अस्पताल से लेकर, ऑक्सीजन, दवाई और श्मशान तक का विकल्प नहीं है। भोजनरोजगार का तो जो हाल है सो है ही। कल मैंने टीके से जुड़ी खबरों की चर्चा की थी और बताया था कि टीके से संबंधित क्या जानकारी नहीं है जो दी जानी चाहिए। ऐसी खबरें होनी चाहिए आदि। आज टाइम्स ऑफ इंडिया में टीके पर एक खबर प्रमुखता से छपी है, “दूसरी खुराक में देरी हो तो परेशान मत होइए, विशेषज्ञों ने कहा, टीके का कार्यक्रम फिर से शुरू करने की जरूरत नहीं है।”  विशेषज्ञों ने समय पर कह दिया और टाइम्स ऑफ इंडिया ने समय पर बता दियासबका धन्यवाद। निश्चित रूप से टीके की कमी और टीका लगाने वाले केंद्र बंद होने तथा लाइन लगने की खबरों के बीच यह राहत देने वाली खबर है। अब टीका लगे नहीं लगे, परेशान होने की जरूरत नहीं है। आप जानते हैं कि टीका एक निश्चित अंतराल पर लगता है। भारत में दो कंपनियों के टीके लग रहे हैं। दोनों को एक जैसा या बराबर बताया जा रहा है पर अचानक दोनों में से एक टीके की दो खुराक के बीच का अंतराल बढ़ा दिया गया। यह जानकारी स्वास्थ्य मंत्री ने नहीं दी। अगर बढ़ाना ठीक था तो पहले गलत हुआ और पहले ठीक था तो अब गलत हो रहा है लेकिन एक ही के मामले में क्यों। यह सब स्वास्थ्य मंत्री (मंत्रालय) को बताना चाहिए। लेकिन वे डार्क चॉकलेट के विज्ञापन में व्यस्त हैं।  

 

टीके का कोटा तय है 

हिन्दुस्तान टाइम्स में खबर है कि 18-44 आयुवर्ग के लोगों के लिए देश भर में सभी राज्य सरकारों को कुल मिलाकर 20 मिलियन (दो करोड़) टीके दिए जायेंगे। मोटेतौर पर इस महीने 85 मिलियन (8.5 करोड़) टीकों का उत्पादन होगा। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने यह कोटा तय कर रखा है और यह जानकारी सुप्रीम कोर्ट में दी है। इस तरह, राज्यों को अपने पैसे से (मोलभाव करके) जो टीके (अपने नागरिकों के लिए) सीधे खरीदने हैं उसका कोटा केंद्र ने तय कर रखा है। केंद्र का कहना है कि यह आबादी के अनुपात में मिलेगा लेकिन राज्यों का कहना है कि कोटा अपर्याप्त है। वैसे भी, जब 8.5 करोड़ टीके बन रहे हैं तो लगाने की व्यवस्था की जाएगी या निर्यात करने की? सरकार क्या कर रही है आप समझ सकते हैं। इसीलिए अखबारों में खबरें गोलमोल रहती हैं। हालांकि, हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया की दोनों खबरें अपना मकसद तो पूरा कर ही रही हैं। दोनों खबरें दोनों अखबारों में नहीं हैं वह अलग बात है। दिल्ली के मुख्यमंत्री चाहते हैं कि उत्पादन बढ़ाया जाए और वैश्विक निविदा जारी कर टीके खरीदे जाएं। पर सभी सरकारें (डबल इंजन वाली भी) भिन्न कारणों से यह सब कर नहीं सकती हैं और दिल्ली सरकार क्या कुछ कर पाएगी यह समय बताएगा।      

 

ऑक्सीजन की कमी से गोवा में 26 मरे 

आज एक और बड़ी खबर है, गोवा के प्रमुख, गोवा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 26 कोविड मरीजों की मौत हो गई। गोवा भी डबल इंजन वाला राज्य है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे लीड बनाया है और अपनी पुरानी खबर भी लगाई है जिसमें ऑक्सीजन का दबाव कम होने की सूचना दी गई थी और सिस्टम को सतर्क हो जाना चाहिए था। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा है कि ऑक्सीजन की आपूर्ति से संबंधित समस्याओं के कारण रोज मौतें हो रही हैं और मंगलवार को 26 मरीजों की मौत हो गई। यह सब 4 मई से चल रहा बताया गया है। अखबार ने लिखा है कि एक घंटे में अस्पताल ने 20 फोन किए पर किसी का जवाब नहीं मिला।  यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में भी है। 

 

खबर छपी नहीं, बता रहे हैं, गलत है 

हिन्दुस्तान टाइम्स में आज पहले पन्ने पर खबर है, “नड्डा ने सोनिया को चिट्ठी लिखी : कांग्रेस झूठा डर फैला रही है।” पहले पन्ने पर दो कॉलम में तीन लाइन का यह शीर्षक क्या आपको सही लगता है? मुझे पता नहीं था कि कांग्रेस ने ऐसा क्या किया कि नड्डा को ऐसा कहना पड़ा। आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री को कोई चिट्ठी लिखे तो प्रधानमंत्री उसका संज्ञान लें या नहीं कोई मंत्री उसका जवाब देता है। इससे पहले मनमोहन सिंह की चिट्ठी का जवाब स्वास्थ्य मंत्री ने दिया था। यह नरेन्द्र मोदी सरकार की खासियतों में है। हाल में ममता बनर्जी ने चिट्ठी लिखी तो वित्त मंत्री ने जवाब दिया। वह भी गलत और झूठ। इस खबर से पता चला कि कांग्रेस कार्यसमिति ने एक प्रस्ताव पासकर कहा था कि कोविड-19 की दूसरी लहर बहुत गंभीर है और मोदी सरकार के लापरवाह रवैये का सीधा नतीजा है। मुझे लगता है कि इसमें कुछ गलत नहीं है और यह बार-बार कहा जाने वाला सच है। वैसे भी, नड्डा की चिट्ठी पहले पन्ने पर तब छपती जब मूल खबर छपी होती। अखबार ने मूल खबर का तो जो किया सो किया खंडन इतना महत्व पा गया कि मूल खबर ढूंढ़नी पड़ी। यह भी संपादकीय विवेक का मामला है और प्रचारकों की पत्रकारिता। 

 

जो खबरें इन अखबारों में नहीं हैं 

आज भी द टेलीग्राफ में पहले पन्ने की लगभग सारी खबरें ऐसी हैं जो दिल्ली के चार अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं हैं। अखबार ने दो खबरें खास शैली में छापी हैं। पहली खबर के शीर्षक के ऊपर पूछा गया है, “क्या कोई और चीज इससे ज्यादा बदबूदार हो सकती है?” इसके साथ की खबर का शीर्षक है, चिकित्सकों ने कोविड से बचाव के लिए गोबर स्नान के खिलाफ चेतावनी दी। इसके नीचे उसी फौन्ट में उतना ही बड़ा शीर्षक है, “हां हो सकता है, जब हम इस तरह कठिन परिश्रम करें।”  इसके नीचे शीर्षक है,  “एक गार्जियन एंजल ने मोदीशील्ड बनाया, जिसका भारी प्रभाव हुआ।”  हुआ यह है कि कोरोना से निपटने में विदेशी मीडिया ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूमिका की आलोचना की थी। जवाब में या अतिरिक्त प्रचार के लिए एक देसी, “डेली गार्जियन” में छपी प्रधानमंत्री की प्रशंसा, “प्रधानमंत्री मोदी कठिन परिश्रम करते रहे हैं विपक्ष के झांसे में न आएं।”  इसके बाद भाजपा के बड़े-बड़े नेता ढिंढोरा पीटने वगे कि गार्जियन ने मोदी की तारीफ की है। बाद में पता चला कि डेली गार्जियन ब्रिटेन का गार्जियन नहीं है। वैसे तो ऐसा पहली बार नहीं हुआ है लेकिन द टेलीग्राफ ने पहली बार इसे इस अंदाज में छापा है। एक खबर यह भी है कि अंबानी सेवा के लिए सुप्रीम कोर्ट की नौकरी से निकाले गए दो अधिकारियों को पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने माफीदे दी थी।  

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।


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