पहला पन्ना: नदी में लाशें, भोजन के लिए बच्चों की लाइन- फिर भी मोदी महान!

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
काॅलम Published On :


वैसे तो आज की सबसे बड़ी खबर है, बिहार के चौसा गांव में गंगा नदी के महादेव घाट पर 30-40 शवों का मिलना। अपने आप में यह बहुत बड़ी खबर है लेकिन मेरे पांच अखबारों में सिर्फ द हिन्दू में लीड है। सोशल मीडिया पर इसकी एक से एक भयानक तस्वीर है पर अखबारों में ऐसा कुछ नहीं है। इसके साथ ही सरकार की तमाम कोशिशों, प्रचार और बचाव के बावजूद आंध्र प्रदेश के एक अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से (टैंकर देर से पहुंचा) 11 कोविड मरीजों की मौत हो गई। ये मौतें तिरुपति के सरकारी अस्पताल में हुई हैं। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि ‘अतिउत्साहित न्यायिक हस्तक्षेप’ ठीक नहीं है। शव मिलने की खबर हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर नहीं है, टाइम्स ऑफ इंडिया में सेकेंड लीड है और द टेलीग्राफ में ऊपर से नीचे तक सिंगल कॉलम में है।

यही नहीं, टीके का उत्पादन धीरे-धीरे बढ़ाया जा रहा है और सरकार को उम्मीद है कि अगले कुछ महीनों में उत्पादन बढ़ जाएगा। एक तरफ रोज 4,000 के आस-पास मौतें हो रही हैं, जो मर रहे हैं उनके परिवार के पास अंतिम संस्कार करने के पैसे नहीं हैं और सरकार कह रही है कि टीकाकरण की रणनीति ठीक है। राज्यों से जब खबर आ रही है कि टीका नहीं है, कम है खत्म है और टीकाकरण बंद है तब केंद्र सरकार दावा कर रही है कि राज्यों के पास एक करोड़ से ज्यादा खुराक हैं (द हिन्दू)। यह सब तब जब केंद्र सरकार ने अभी तक सबको मुफ्त टीका लगवाने की घोषणा नहीं की है। पीएम केयर्स के बावजूद। राज्य सरकारों की अपनी शर्तें हैं फिर भी केंद्र ने अदालत में कहा है कि टीका सबके लिए फ्री है क्योंकि राज्यों में टीके फ्री हैं। इसपर द टेलीग्राफ ने बाइबल के एक ‘कोट’ का उल्लेख किया जो मोटे तौर पर यह कहता है कि पौनटियस पिलेट ने हाथ धोए और हत्या की जिम्मेदारी लेने से साफ मना कर दिया। यह विवरण बाइबिल के विषयवस्तु पर 1830 के कई पेंटिंग में से एक का है। टीकाकरण पर सरकार का पक्ष और वास्तविक स्थिति पर टेलीग्राफ की दो रिपोर्ट बेहतरीन है। द टेलीग्राफ की दो खबरों के शीर्षक हैं, “मुफ्त टीके के मामले में केंद्र सरकार राज्यों के भरोसे”। दूसरी खबर है, “टीकाकरण में तेजी लाने के विकल्पों को लेकर कोई जल्दबाजी नहीं: केंद्र।”

इंडियन एक्सप्रेस में टीकाकरण से संबंधित तीन खबरें हैं। पर लगता है कि सीधे सरकार को जिम्मेदार ठहराने से डर लग रहा हो। पहली लीड है, देश के सबसे प्रभावित जिलों में प्रतिबंध सख्त हुए पर टीकाकरण में ढिलाई है। दूसरी खबर का शीर्षक है, टीके की गैर बराबरी और खराब हुई : ग्रामीण भारत, छोटे अस्पताल प्रभावित। तीसरी खबर में बताया गया है कि स्पष्टता नहीं होने के कारण निजी अस्पताल टीके के लिए सात सौ रुपए से लेकर डेढ़ हजार रुपए तक ले रहे हैं। ऐसी हालत में टाइम्स ऑफ इंडिया में टीके से संबंधित सरकारी प्रचार खबर के रूप में है। इसका शीर्षक है, केंद्र ने कोवीशील्ड की 50 लाख खुराक का निर्यात ब्रिटेन को करने की एसआईआई की अपील खारिज की। इस खबर में बताया गया है कि अब इन दवाइयों के लेबल बदलने होंगे क्योंकि इन्हें स्थानीय बाजार में सप्लाई किया जाएगा तो लेबल स्थानीय होना चाहिए।

आप समझ सकते हैं कि इस मामले में मुद्दा यह है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने दो टीकों के चिकित्सीय परीक्षण के लिए 46 करोड़ रुपए खर्च किए हैं और सरकार ने मई, जून और जुलाई की खुराक के लिए 2520 करोड़ रुपए एडवांस दिए हुए हैं। फिर ये खुराक अगर समय पर मिल रही है तो एसआईआई को निर्यात से रोका क्यों जा रहा है और नहीं मिल रही है तो एडवांस की शर्त क्या थी उसपर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है, कौन बताएगा? ऐसी हालत में सरकार ने किस आधार पर सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि उत्पादन बढ़ाया जा रहा है। क्या यह नहीं बताया जाना चाहिए कि अभी उत्पादन कम है या ठीक जा रहा है। खबरों से ऐसा लग रहा है कि केंद्र सरकार ने वाकई टीके से हाथ झाड़ लिए हैं और इसे राज्य सरकारों के सिर मढ़ दिया है। राज्य सरकार डबल इंजन वाली हो या सिंगल – दिल्ली के अखबार केंद्र सरकार का प्रचार और बचाव करते रहेंगे।

अखबारों ने यह नहीं बताया है राज्यों में टीके क्यों नहीं लग रहे हैं या कम क्यों हो रहे हैं जो राज्य टीका अनुपलब्ध होने की शिकायत कर रहे हैं वह क्यों है और केंद्र सरकार की मूल योजना क्या थी। अगर सब ठीक चल रहा है तो एसआईआई ने निर्यात करने के लिए दवा क्यों बनाई, बनाई तो अनुमति क्यों मांगी और मांगी तो मिली क्यों नहीं। सबके बाद रैपर बदलने जैसी स्थिति आना क्या समय खराब करना नहीं है? इसपर खबर ज्यादा महत्वपूर्ण है या सरकार ने अनुमति नहीं दी? यह खबर तब बड़ी होती जब यह बताया जाता कि इससे क्या फायदा हुआ। टाइम्स ऑफ इंडिया की ही खबर के साथ एक और खबर है, भारत बायोटेक ने 14 राज्यों को सीधी आपूर्ति शुरू की। इसमें लिखा है कि केंद्र सरकार से प्राप्त खुराक के आवंटन के आधार पर आपूर्ति की जा रही है। अगर ऐसा है तो केंद्र सरकार के आवंटन में गड़बड़ी है या सप्लाई लेट है पर खबरों में यह सब नहीं है जबकि यही शीर्षक होना चाहिए था।

एक तरफ नदी में मिले शवों के बारे में कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश से बहकर आए होंगे दूसरी तरफ द हिन्दू में खबर है कि तेलंगाना, आंध्र प्रदेश के कोविड मरीजों को अपने यहां आने से रोक रहा है। इस बीच इंडियन एक्सप्रेस में खबर है कि उत्तर प्रदेश सरकार कोविड को लेकर भले बहादुरी वाला चेहरा दिखा रही है पर भाजपा में अंदरूनी उठा-पटक चल रही है और नेता शिकायत कर रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस में गंगा में शव मिलने की खबर पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन पुणे डेटलाइन की एक खबर में बताया गया है कि अप्रैल से नए मामलों की संख्या पांच गुना बढ़ गई है और करीब 80 हजार रोज से अब चार लाख रोज पर है। इसमें बताया गया है कि महाराष्ट्र में अभी भी सबसे ज्यादा मौतें हो रही है पर चिन्ताजनक संकेत झारखंड, हरियाणा, छत्तीसगढ़, पंजाब और अब उत्तराखंड से हैं। मुझे उम्मीद थी कि शव मिलने की चर्चा इस खबर में होगी पर पहले पन्ने पर जितनी खबर है उसमें इसकी चर्चा नहीं है।

आप समझ सकते हैं कि नदी में इतनी बड़ी संख्या में एक साथ शव मिलने का कारण यही हो सकता है कि लोगों ने अंतिम संस्कार करने की बजाय शव ऐसे ही नदी में बहा दिए हों। कोरोना पीड़ितों के शव इस तरह नदी में बहाना कितना खतरनाक है मुझे नहीं पता पर सरकार की ओर से पहले पन्ने पर या सोशल मीडिया में ऐसा कोई बयान नहीं दिखा कि ऐसा नहीं करें पर लकड़ी खरीदने के पैसे न हों तो गरीब क्या करे – यह भी नहीं बताया गया है। ऐसे में आप समझ सकते हैं कि सरकार कितनी मुस्तैद और रक्षक है। यह इतना गंभीर मामला है कि सरकार को तुरंत सक्रिय हो जाना चाहिए था और नदीं किनारे रहने वालों को (अगर जरूरत हो) सतर्क करना चाहिए था या आश्वस्त करना चाहिए था कि इससे कोई परेशानी नहीं है। पर मुझे ऐसी कोई खबर या घोषणा अखबारों में नहीं दिखी।

द हिन्दू में आज लाशों की खबर लीड होने के साथ एक और मार्मिक फोटो है। इसका कैप्शन है : धैर्यपूर्वक – दिल्ली में लॉकडाउन एक और हफ्ते के लिए बढ़ाए जाने के बाद सोमवार को ताहिरपुर में भोजन के लिए लाइन में खड़े बच्चे।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 


मीडिया विजिल जनता के दम पर चलने वाली वेबसाइट है। आज़ाद पत्रकारिता दमदार हो सके, इसलिए दिल खोलकर मदद कीजिए। अपनी पसंद की राशि पर क्लिक करके मीडिया विजिल ट्रस्ट के अकाउंट में सीधे आर्थिक मदद भेजें।

मीडिया विजिल से जुड़ने के लिए शुक्रिया। जनता के सहयोग से जनता का मीडिया बनाने के अभियान में कृपया हमारी आर्थिक मदद करें।