क़ानून से बेपरवाह मुंबई के ‘कमाऊ पूत’ और उनके आक़ा!


मुंबई पुलिस के इस अभूतपूर्व शर्मनाक पुलिस प्रकरण को सामान्य पुलिस सुधार या वाझे जैसे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के संहार के रूटीन नैतिक चश्मे से देखना बेमानी होगा। यह पुलिस द्वारा कानून के सम्पूर्ण तिरस्कार का व्यापक मसला है जिसमें उसे राजनीतिक सत्ताधारी का प्रेरक वरदहस्त प्राप्त है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय में अमित शाह के काबिज होने के बाद यह सिलसिला उत्तरोत्तर बढ़-चढ़ कर हावी होता जा रहा है।


विकास नारायण राय विकास नारायण राय
काॅलम Published On :


पुलिस और राजनीति में ‘कमाऊ पूत’ एक जमी-जमायी परंपरा है। हालाँकि यह विरल ही मिलेगा कि मुंबई पुलिस के असिस्टेंट इंस्पेक्टर सचिन वाझे जैसा कोई कमाऊ पूत कानून के हाथों पकड़ा जाए। इन कमाऊ पूतों की प्रजाति में सबसे उल्लेखनीय बात होती है, इनका कानून के प्रति सम्पूर्ण तिरस्कार। ये कानून के शासन से बेपरवाह होते हैं; इनके आका ही सम्बंधित क्षेत्र में कानून लागू करने के सर्वेसर्वा जो हुए।

सचिन वाझे के माध्यम से सौ करोड़ महीना उगाही का मुंबई पुलिस प्रकरण शायद ही सामने आता अगर उद्योगपति मुकेश अंबानी के निवास पर स्कोर्पियो में धमकी के नोट के साथ जेलेटिन की छड़ें मिलने और स्कोर्पियो मालिक मनसुख हीरानी की कुछ दिनों बाद हुयी हत्या के मामले में उसकी गिरफ्तारी नहीं हुयी होती। तब से तत्कालीन मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह और राज्य के गृह मंत्री अनिल देशमुख के आरोपों-प्रत्यारोपों के गिर्द घूमता यह मामला राजनीतिक तूल पकड़ता चला गया है। यहाँ तक कि केंद्र की मोदी सरकार के गृहमंत्री अमित शाह अपनी संकट-मोचक सीबीआई समेत परमबीर की ओर से और महाराष्ट्र की महाअघाड़ी गठबंधन सरकार के मुख्य किरदार शरद पवार, अनिल देशमुख की ओर से एक छाया युद्ध का मोर्चा गर्म किये हुए हैं।

जहाँ वाझे की ‘कमाऊ पूत’ भूमिका में शक नहीं और स्वयं देशमुख शक के दायरे में हैं, क्या इन दोनों के आका भी बेचैन नहीं होंगे? मामला फिलहाल मुंबई उच्च न्यायालय के सामने जरूर है लेकिन इसमें राजनीति का दखल कदम-कदम पर देखा जा सकता है। महाराष्ट्र सरकार द्वारा मामले में उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश से जांच की घोषणा शायद ही किसी का विश्वास अर्जित कर सके। वाझे की भी किस्मत राजनीतिक समीकरण बदलने से पलटा खा सकती है और वह बेदाग बरी भी हो सकता है।

लेकिन सभी कमाऊ पूत इतनी किस्मत वाले नहीं होते। दरअसल, आज देश में कम ही पुलिस यूनिट मिलेंगी जहाँ कमाऊ पूत न पाले जाते हों। राजनीति में इन्हें फण्ड-रेज़र कहते हैं जबकि पुलिस में यह सुविधा नहीं होती। हाल में हरियाणा के गुरुग्राम पुलिस कमिश्नरेट में राज्य विजिलेंस ब्यूरो ने ऐसे ही एक थानाध्यक्ष इंस्पेक्टर और उसके सहयोगी पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार कर उनके विरुद्ध चार्जशीट अदालत में दी है। दो व्यापारियों के व्यवसायिक विवाद में जिसका क्षेत्र करनाल/दिल्ली था, एक व्यापारी को गुरुग्राम की इस कमाऊ पूत पुलिस टीम ने अगवा कर लिया। उसे गैर क़ानूनी हिरासत और यातना से 57 लाख रुपये देकर ही छुट्टी मिल सकी|

दशकों से हरियाणा में चलन रहा है कि थानाध्यक्ष स्थानीय प्रभावशाली राजनेताओं की सिफारिश पर लगाये ज़ाते हैं, बेशक उनके तबादलों/नियुक्तियों के आदेश पर किसी न किसी पुलिस अधिकारी के दस्तखत क्यों न हों। इसमें पैसे का लेन-देन भी छिपा नहीं होता। लेकिन, उपरोक्त गुरुग्राम मामले में भी, कानून का कभी-कभार गिरने वाला नजला बस कमाऊ पूत तक सीमित रहा और आका को नहीं छू सका। समझ यह कि बाद में आका के सहयोग से कमाऊ पूत को भी बचा लिया जाएगा। कभी एक फर्जी एनकाउंटर में पकड़ा गया सचिन वाझे भी ठीक इसी तरह मुंबई पुलिस में फल-फूल रहा था।

परमबीर सिंह की मानें तो उनके मातहत इन्स्पेक्टर (सचिन वाझे) को महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने मुंबई के ठिकानों से अपने लिए 100 करोड़ प्रतिमाह वसूली करने का लक्ष्य दिया था। सवाल है कि राज्य का गृह मंत्री एक इन्स्पेक्टर रैंक के जूनियर पुलिसकर्मी को इतनी बड़ी रकम जुटाने का जिम्मा देने की कैसे सोच भी सकता था जब तक कि उसे पक्का पता न हो कि इस तरह के कार्यकलाप में वाझे और पुलिस कमिश्नर का रिश्ता बेहद प्रगाढ़ है। ध्यान रहे, परमबीर सिंह की कमिटी की सिफारिश पर ही वाझे को 16 वर्ष बाद पुलिस विभाग में पुनः बहाली मिली थी।

मुंबई उच्च न्यायालय ने भी सवाल खड़ा किया है कि वाझे से सब कुछ जानने के बाद भी परमबीर खामोश क्यों बने रहे? उन्होंने एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की? लेकिन सीबीआई द्वारा जेलेटिन मामले में वाझे की गिरफ्तारी के बाद, बेशक अपनी चमड़ी बचाने के लिए, मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को लिखे पत्र में परमबीर ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री (अजित पवार, शरद पवार के भतीजे) को देशमुख की 100 करोड़ की मांग से तभी परिचित करा दिया था। दोनों ने ही इसका खंडन नहीं किया है। सवाल है, देशमुख के पीछे किस आका का वरदहस्त था कि उद्धव और अजित पवार खामोश बने रहे थे।

ऐसे में, मुंबई पुलिस के इस अभूतपूर्व शर्मनाक पुलिस प्रकरण को सामान्य पुलिस सुधार या वाझे जैसे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के संहार के रूटीन नैतिक चश्मे से देखना बेमानी होगा। यह पुलिस द्वारा कानून के सम्पूर्ण तिरस्कार का व्यापक मसला है जिसमें उसे राजनीतिक सत्ताधारी का प्रेरक वरदहस्त प्राप्त है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय में अमित शाह के काबिज होने के बाद यह सिलसिला उत्तरोत्तर बढ़-चढ़ कर हावी होता जा रहा है।

 

विकास नारायण राय, पूर्व आईपीएस हैं. वो हरियाणा के डीजीपी और नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद के निदेशक रह चुके हैं।


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