पहला पन्ना: बंगाल में हिंसा पर टेलीग्राफ़ की रपट चुनाव आयोग के विवरण से अलग!


ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि बिना किसी उकसावे के सुरक्षा बलों ने डंडे मारे और गोलियां चलाईं। सीआईएसएफ का उपयोग मुख्य रूप से हवाई अड्डों की सुरक्षा और औद्योगिक संस्थापना की रक्षा के लिए किया जाता है। ऐसी सशस्त्र सेना जो भीड़ संभालने का काम अमूमन नहीं करती है, मतदान के लिए तैनात की जानी चाहिए कि नहीं, एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब चुनाव आयोग को देना चाहिए। खासकर तब जब बड़ी संख्या में आम नागरिक मतदान के लिए आते हैं। बंगाल में इन बलों के लिए भाषा भी एक समस्या है।


संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
काॅलम Published On :


द टेलीग्राफ की आज की खबर का शीर्षक है, केंद्रीय बलों ने चार को मार गिराया। कूच बिहार में मतदान पर खून के धब्बे। मरने वाले चारो लोगों के नाम के साथ अखबार ने जो विवरण दिया है उससे यही लगता है कि एक वर्ग को मतदान से रोकने की कोशिश थी या उससे जबरन पंगा लिया गया ताकि हिंसा हो और मतदान बाधित हो। संप्रादायिक तनाव फैले। जोरपटकी के रहने वाले किसान सैफीद्दुनी मियां ने कहा कि मतदान शांतिपूर्ण चल रहा था तभी केंद्रीय सुरक्षा बल वाले अचानक हिंसक हो गए। सवेरे 10 बजे केंद्रीय सुरक्षा बलों के 20-25 लोग जो इस बूथ पर तैनात नहीं थे, पहुंचे और लोगों को पीटना शुरू कर दिया। ये लोग वोट देने आए थे। पीटने वालों ने  इसमें 15 साल के एक बच्चे, मृणाल हक को भी नहीं बख्शा गया जिसे मतदान करना ही नहीं था। 

इस खबर में टेलीग्राफ ने लिखा है, “प्रशासन जो अब चुनाव आयोग के तहत काम कर रहा है, ने कहा कि केंद्रीय गृहमंत्रालय को रिपोर्ट करने वाले केंद्रीय बल, सीआईएसएफ के जवान भीड़ के हमले के बाद गोली चलाने के लिए मजबूर हुए। पर ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि बिना किसी उकसावे के सुरक्षा बलों ने डंडे मारे और गोलियां चलाईं। सीआईएसएफ का उपयोग मुख्य रूप से हवाई अड्डों की सुरक्षा और औद्योगिक संस्थापना की रक्षा के लिए किया जाता है। ऐसी सशस्त्र सेना जो भीड़ संभालने का काम अमूमन नहीं करती है, मतदान के लिए तैनात की जानी चाहिए कि नहीं, एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब चुनाव आयोग को देना चाहिए। खासकर तब जब बड़ी संख्या में आम नागरिक मतदान के लिए आते हैं। बंगाल में इन बलों के लिए भाषा भी एक समस्या है। कल की घटना के बाद चुनाव आयोग ने जो प्रतिबंध लगाए हैं वह चुनाव प्रचार की दृष्टि से बिल्कुल नया प्रयोग है। अब उम्मीदवार चुनाव प्रचार नहीं करेंगे पर सत्तारूढ़ दल के प्रतिनिधि के रूप में केंद्रीय सुरक्षा बल काम करेंगे।

 

दूसरे अखबारों की रिपोर्टिंग वैसी ही जैसी वर्षों से होती आई है। हालांकि, उसमें तनाव भड़कने का कारण बताया गया है पर उसे महत्व नहीं दिया गया है। यह दरअसल दो संभावित पक्षों में दूसरा है – सुरक्षा बल वाले एक बीमार लड़के की सहायता कर रहे थे। गांव वालों ने समझा कि उसे पीटा गया है। 350 गांव वाले भिड़ गए। गोली चली चार लोग मारे गए। और सामान्य ढंग से खबर छप गई। वास्तविकता यह है कि आतंक का माहौल बनाया गया था। सुरक्षा बलों का मतलब पिटाई बताया गया है। केंद्र सरकार केंद्रीय बलों की अपनी ताकत का लाभ चुनाव में उठाना चाहती है – यह तो स्पष्ट ही है और उसका विरोध होना ही चाहिए। पर डर का माहौल बनाए रखने के लिए प्रधानमंत्री ने कहा है, “…. ममता दीदी और उनके गुंडे परेशान हैं क्योंकि जमीन पर भाजपा का समर्थन बढ़ गया है।” ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केंद्रीय बलों ने किसी विकल्प को आजमाए बिना इसीलिए सीधे गोली चला दी? सुरक्षा बलों ने नागरिकों को हत्या की है और प्रधानमंत्री जिम्मेदारी लेने की बजाय ममता बनर्जी पर दोष लगा रहे हैं। 

यह अपने आप में अनैतिक है कि एक महीने से ज्यादा चलने वाले एक राज्य के चुनाव में चौथे दौर के मतदान के दिन भी प्रधानमंत्री रैली कर रहे थे। क्या आपको किसी अखबार की खबर से इसका अहसास हुआ?  दूसरी ओर ममता बनर्जी ने एक अच्छे शासक की तरह सवाल उठाया है, सुरक्षा बलों पर हमला हुआ तो कौन घायल हुआ? क्या कोई वीडियो है? असल में लोगों को मार डालने के बाद वे अपनी कार्रवाई का समर्थन कर रहे हैं। सीआईडी जांच करवाई जाएगी। आज की घटना के लिए अमितशाह पूरी तरह जिम्मेदार हैं और वही साजिशकर्ता हैं ….। यहां उल्लेखनीय है कि ममता बनर्जी अपने पुराने कार्यकर्ताओं, समर्थकों और दलबदलुओं से भी लड़ रही हैं। उनके लिए मतदाता आज विरोधी है तो कल समर्थक हो सकता है। लेकिन केंद्र सरकार को ताकत और झूठी लोकप्रियता के दम पर किसी तरह सत्ता चाहिए। वरना प्रधानमंत्री को यह कहने की कोई जरूरत नहीं थी,  जमीन पर भाजपा का समर्थन बढ़ गया है। मेरा मानना है कि वह तो आपकी कोशिशों से भी दिख रहा है लेकिन आप ममता बनर्जी पर दोष मढ़ रहे हैं और मीडिया छाप रहा है। 

 

आज सभी अखबारों में बंगाल चुनाव के दौरान सुरक्षा बलों की गोलियों से चार लोगों के मारे जाने की खबर लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स में मरने वालों की संख्या पांच है। पांचवीं मौत किसी अन्य बूथ पर हुई। वहां पहली बार का एक मतदाता कुछ अनजाने लोगों की गोलियों का शिकार हुआ। मैंने पांच अखबारों की पूरी खबर पढ़कर जो जाना उसे ऊपर लिखा है और कायदे से यही खबर थी। यह पुराने जमाने के बूथ लूटने या मतपेटियां लेकर भागने का मामला नहीं था कि गोली चलवा दी गई। प्रकाशित सूचनाओं के आधार पर बताया है कि क्या हुआ। उसे कैसे पेश किया गया है वह तो आप देख ही रहे हैं। खबरें पेश करने का यह अंदाज लोगों को डराएगा। कुछ लोगों को नाराज भी करेगा। बदले में आगे हिंसा की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है और लोग डरकर घर से नहीं निकलें यह तो संभव है ही। 

ऐसा कौन चाहता है, आप जानते हैं। आज की रिपोर्टिंग दोनों पक्ष छाप देने वाली है अखबारों ने वास्तविक स्थिति जानने और मालूम हो तो अपनी तरफ से, प्रमुखता से बचाने की कोशिश नहीं की है। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के साथ हाइलाइट की गई सूचनाओं में कहा गया है कि चुनाव आयोग के अनुसार, मतदान केंद्र के पास सुरक्षा बल वाले एक बीमार लड़के की सहायता कर रहे थे। स्थानीय लोगों को लगा कि उसे पीटा गया है। इसपर करीब 350 ग्रामीण इकट्ठा हो गए और अर्धसैनिकों पर हमला कर दिया। लेकिन यह टेलीग्राफ में प्रकाशित चश्मदीद के विवरण से अलग है। निश्चित रूप से किसी भी स्थिति में अर्धसैनिक बलों पर हमला गलत है और ऐसा नहीं होना चाहिए था। पर क्या भाजपा इसकी जांच कराएगी? ममता बनर्जी ने तो सीआईडी जांच कराने की घोषणा कर दी है। 

जहां तक चुनाव आयोग और केंद्र सरकार की तैयारियों के साथ आठ चरण में चुनाव कराने का मामला है, क्या कल की घटना से निपटने का यही एकमात्र तरीका है? अव्वल तो दूसरे तरीकों का उपयोग नहीं किया गया और संभव है उसकी तैयारी भी नहीं हो। लग तो यही रहा है कि केंद्रीय सुरक्षा बलों की भारी मौजूदगी से राज्य में पार्टी कार्यकर्ताओं को डराने और निष्क्रिय करने का प्रयास किया जा रहा है। इतने दिनों से अखबारों में जो छप रहा था वह यह नहीं था कि मतदान के दौरान सुरक्षा बलों से भिड़ने वालों को प्यार किया जाएगा और मिठाई खिलाई जाएगी। बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती और आठ चरणों में चुनाव करने का मतलब ही था कि मौका दिया और पिटे। अगर मरने का अंदाजा नहीं होगा या मरने से डर नहीं हो तो भी मार से कौन नहीं डरता है वह भी पुलिसिया। भारी तैयारी और सुरक्षा की पूरी व्यवस्था जैसी खबरों के बावजूद लोगों को डर नहीं था और लोग मर गए पर डरे नहीं। ऐसा आजादी के बाद से होता आया है और व्यवस्था नहीं बदली तो आगे भी होता रहेगा। पर क्या व्यवस्था नहीं बदलनी चाहिए। कौन बोलेगा

बोलना और करना जिसका काम है वह चुनाव जीतने में व्यस्त है। जो कुछ बोलकर सत्ता मिली और जो शपथ लेकर पद पाया उससे बिल्कुल अलग। जब आम लोग या किसी पार्टी के कार्यकर्ता भ्रम में या हिसाब बराबर करने के लिए भी सुरक्षा बलों से भिड़ जाएं तो इसका मतलब यह नहीं होता है कि वे कमजोर हैं या पार्टी कमजोर है। पर प्रधानमंत्री यही बताना चाहते हैं। ममता बनर्जी के गुंडे अगर सुरक्षा बलों से भिड़ गए तो कमजोर कैसे हैं और भाजपा का समर्थन बढ़ गया है तो कार्यकर्ता कहां हैं? मतदाता को पीटे जाने की अफवाह या गलत खबर पर वे शांत क्यों रहे? मतदाता सुरक्षा बलों के साथ क्यों हो सकते हैं? मैं नहीं जानता सच क्या है पर सरकार, मीडिया या चुनाव आयोग की ओर से आगे के लिए तनाव कम करने, माहौल शांत करने की कोई कोशिश तो नजर नहीं आ रही है। 

बहुत साधारण सी बात है कि सच बताया जाता तो सुरक्षा बलों में, सरकार की व्यवस्था में लोगों को विश्वास होता। पर क्या आपको लगता है कि कोई ऐसा चाहता है। अगर यह मान लिया जाए कि किसी की पिटाई की गलत सूचना पर हमला हुआ तो सुरक्षा बलों को अतिरिक्त बल मंगाने की बजाय सच बताने की कोशिश करनी चाहिए थी। इसका उपाय होना चाहिए था। पर यह सब नहीं करके गोली चला दी गई और हथियार लूटने का आरोप लगा दिया गया। यह बहुत पुराना तरीका है। ममता बनर्जी ने सीआईडी जांच की बात कह दी है क्या भाजपा इस बात की जांच करवाएगी कि हथियार लूटने के आरोप कितने सही हैं और सही हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई हुई या नहीं। या हिंसा की शुरुआत कैसे हुई। 

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 


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