चुनाव चर्चा: यूपी में योगी तो एमपी में शिवराज लगे मोदी की आँख में खटकने!

चन्‍द्रप्रकाश झा चन्‍द्रप्रकाश झा
काॅलम Published On :


भारत की केंद्रीय सत्ता पर सात बरस से काबिज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा) की उत्तर प्रदेश विधान सभा के अगले चुनाव को लेकर बेइलाज उलझनों फँसी ही थी कि सीमावर्ती मध्य प्रदेश में भी समस्या पैदा हो गई है. उत्तर प्रदेश विधान सभा के नये चुनाव अगले बरस का आगाज होते ही निर्धारित हैं.  सम्भव है यूपी चुनाव के साथ ही एमपी चुनाव कराना पड जाये. असम्भव कुछ भी नहीं लगता. कोरोना कोविड काल की पूरे भारत में पसरी महामारी में लोगो का ध्यान मोड़ने के लिये लोकसभा के भी मध्यावधि चुनाव हो जाये तो अचरज नही होना चाहिये.  

हम उत्तर प्रदेश विधान सभा के अगले चुनाव के सिलसिले में चुनाव चर्चा के इस हफ्तेवार कॉलम की पांच भाग की स्पेशल सिरीज ‘उंटडाउन यूपी पोल्स’ अगले अंक से शुरु करेंगे. क्योंकि यूपी में विधानसभा चुनाव कराने के लिये 2021 के का करीब छह माह बचा है. 

मध्य प्रदेश में अभी राज्यपाल गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री और मोदी जी की खास मंडली में रही आनंदी बेन पटेल है। वही अभी उत्तर प्रदेश की राज्यपाल भी हैं. 

भाजपा ने मध्य प्रदेश की 231  सीटो की विधान सभा के 2018  में हुए पिछले चुनाव में कांग्रेस के 114 से कुछ कम 109 सीट ही जीत सकी थी. पार्टी के तत्कालीन प्रदेश प्रमुक एवम पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिह की युक्ति से अन्य दलो से मिले सहयोग से बहुमत समर्थन जुटा कर अपनी सरकार बना ली. लेकिन कमलनाथ सरकार 15 माह ही टिक सकी. भाजपा ने कुछ कांग्रेस विधायको को फोड़ कर 20 मार्च 2020 को मामा जी की सरकार फिर बनवा दी थी. 62 बरस के मामा जी 2005 से 2018 तक लगातार मुख्यमंत्री रहे थे. 

खबर उडी मध्य प्रदेश में भाजपा के 30 से ज़्यादा विधायक मुख्य्मंत्री, ‘मामा’  शिवराज सिंह चौहान को अपदस्थ करने के लिये बग़ावत पर आमादा हैं. उन्होने मामा जी को हटाने के लौए राज्य की राजधानी भोपाल पहुंच कर डेरा डाल दिया है. 

 

ज्योतिरादित्य सिंधिया

भाजपा ने पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के खास दोस्त ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी सत्ता सुख भोगने में भागीदार  बनने का लालच देकर अपने पाला में खीच लिया था. सैर सपाटा के लिये विदेश गये ज्योतिरादित्य सिंधिया, भाजपा विधायको में ‘ बगावत ‘ की उडी खबर से अपने लिये सुनहरा मौका भांप कर भोपाल पहुंच गए. जाहिर है वह भी मामाजी का राज सिंहासन हिलाने में लग जायेंगे या फिर उनकी राजगद्दी बचाने में अपनी ताकत मिलाने के एवज में कुछ कीमत वसूलेंगे. 

भोपाली में कयास ये भी है कि मामा जी के मन में मोदी जी की जगह दिल्ली की राजगद्दी पर बैठने का मौका मिलने की सोच-सोच कर लड्डू फूट रहे हैं. 

 

सीन  

यूपी की तरह एमपी में भी भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेताओं की गुप्त बैठक के सिलसिले की चर्चा चलने लगी. ऐसे में बंगाल के हालिया चुनाव में प्रभारी रहे भाजपा  नेता कैलाश विजयवर्गीय और प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने स्पष्ट किया कि नेतृत्व परिवर्तन की कोई सम्भावना नहीं है और  शिवराज चौहान मुख्यमंत्री बने रहेंगे.

दरअसल , इन कयास की शुरुआत भोपाल में विजयवर्गीय जी के पार्टी नेताओं के साथ बैठक के सिलसिला से ही हुई. आरएसएस के कुछ बड़े नेता भी भोपाल में हैं. भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वी.डी शर्मा ने भी कई अलग नेताओं से अलग अलग बातचीत के बाद मामा जी से  भेंट की जिसके दौरान भाजपा के प्रदेश से केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल भी मौजूद थे. 

 

सियासत और भूगोल 

मध्य प्रदेश का ही हिस्सा रहे और वर्ष 2000 को पृथक प्रदेश बने छत्तीसगढ़ के अलावा मिजोरम, तेलंगाना और राजस्थान विधानसभा के चुनाव भी साथ हुए. राजस्थान में भी  भाजपा की सरकार थी. भाजपा ,छत्तीसगढ़ में मध्य प्रदेश की ही तरह बरस से सत्ता में थी. मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल  231 सीटें हैं. एक मनोनीत सीट है. राज्य विधायिका का एक ही सदन है. मौजूदा विधान भवन, प्रख्यात वास्तुकार चार्ल्स कोरिया के डिजाइन के आधार पर 1967 में निर्मित हुआ था.

राज्य की सीमाएं छत्तीसगढ़ के अलावा उत्तर प्रदेशमहाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान से लगती है। इसे यूँ ही नहीं, भारत का ह्रदय प्रदेश कहते है.  एक नवम्बर 2000 को छत्तीसगढ़ के गठन के पहले भारत का सबसे बड़ा राज्य मध्य प्रदेश ही था। इसे पहले ‘सेंट्रल प्रोविंस’ कहते थे और इसकी राजधानी नागपुर थी। 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद मराठी–भाषी नागपुर समेत विदर्भ के क्षेत्र तत्कालीन बॉम्बे प्रांत के हिस्से हो गए, जिसको बाद में गुजरात और महाराष्ट्र प्रांत में विभक्त कर दिया गया। 

मध्य प्रदेश में अभी 52 जिले और 10 संभाग हैं. अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोग अलग-अलग जिलों में राज्य की  आबादी के 30 से लेकर 50 प्रतिशत तक हैं. आदिवासियों की आबादी 2011 में करीब 21 प्रतिशत थी. राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) 2013-14 में  4,509 अरब रूपये था. प्रति व्यक्ति आमदनी देश में छठीं सबसे कम के स्तर पर थी.मध्य प्रदेश की  जनसंख्या 2011 में करीब साढ़े सात करोड़ थी. इनमें से अभी करीब पांच करोड़ वोटर हैं. 


|
व्यापामं घोटाला

शिवराज सिंह चौहान 29 नवम्बर 2005 को भाजपा के ही बाबू लाल गौड़ की जगह राज्य के 17 वें मुख्यमंत्री बने थे। बताया जाता है कि शिवराज 1972 में 13 वर्ष की अल्पायु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ( आरएसएस ) के सदस्य बन गए. 5 मार्च 1959 को पैदा हुए मामा जी पहली बार 1990 में सीहोर जिला की बुढ़नी विधान सभा सीट से जीते थे। 

वह 2003  के विधानसभा चुनाव में राघोगढ़ सीट पर कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से हार गए थे। भोपाल के बरकतुल्ला विश्विद्यालय से दर्शन शास्त्र में एम.ए. की शिक्षा प्राप्त शिवराज जी विदिशा से 1991 से पांच बार लोकसभा सदस्य रहे हैं। उनका विवाह साधना सिंह से हुआ. उनके दो पुत्र हैं, कार्तिकेय और कुणाल. 

शिवराज पर ही नहीं उनकी पत्नी, पुत्र और पत्नी के भाई  संजय सिंह मसानी  पर भी भ्रष्टाचार के आरोप रहे हैं.  वर्ष  2007 में कांग्रेस नेता एवं  वकील रमेश साहू की शिकायत पर भोपाल की एक अदालत ने चर्चित डम्पर घोटाला में शिवराज और उनकी पत्नी साधना सिंह के खिलाफ जांच के आदेश दिए थे. आरोप था कि साधना सिंह ने एक सीमेंट फैक्ट्री को पट्टे पर देने के लिए दो करोड़रूपये के डम्पर की खरीद में अपना आवासीय पता और पति का नाम गलत दिया. लोकायुक्त पुलिस ने जांच की। बाद में  2011 में अदालत को सौंपी गई लोकायुक्त की रिपोर्ट में शिवराज और उनकी पत्नी को क्लीन चिट मिल गई. 

बहरहाल, भष्टाचार के आरोपों ने शिवराज का पीछा नहीं छोड़ा.  30 नवम्बर 2013 को उनका नाम बहुचर्चित मध्य प्रदेश प्रोफेशनल एग्जामिनेशन बोर्ड ( एमपीपीईबी) घोटाला में उभरा , जिसे व्यापामं घोटाला भी कहते हैं. मध्यप्रदेश पुलिस के विशेष जांच दल की तहकीकात में यह पाया गया कि मध्य प्रदेश की राजकीय सेवाओं की नौकरियों में भर्ती के लिए चयन परिक्षण में व्यापमं अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी की। इस घोटाला से सम्बंधित 40 व्यक्तिओं की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु होने की आधिकारिक पुष्टि की जा चुकी है. गैर-सरकारी आंकड़ों के अनुसार पुलिस हिरासत से लेकर अजीबोगरीब सड़क दुर्घटनाओं में ऐसे मरने वालों की संख्या सौ से अधिक है. घोटाले में राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकान्त शर्मा और करीब सौ अन्य राजनीतिज्ञों समेत दो हज़ार से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया गया. उनमें से कोई भी अदालत में दोषसिद्ध नहीं हो सका. अधिकतर की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई. इसको लेकर देशभर में उठी चिंताओं के बाद जुलाई 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने व्यापाम घोटाला की जांच केंद्रीय गुप्तचर ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने के आदेश दिए. 

 

राहुल गांधी

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले चुनाव में प्रचार के दरान इंदौर में ‘ पनामा पेपर्स’  और व्‍यापम घोटाला का जिक्र कर  शिवराज जी और उनके पुत्र कार्तिकेय पर भी निशाना साधा था. इस पर भड़के शिवराज जी ने कहा वह कांग्रेस अध्‍यक्ष के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दाखिल करेंगे.  उन्होंने  ट्वीट किया, ‘ पिछले कई वर्षों से कांग्रेस मेरे और मेरे परिवार के ऊपर अनर्गल आरोप लगा रही है. हम सबका सम्मान करते हुए मर्यादा रखते हैं, लेकिन आज तो राहुल गांधी ने मेरे बेटे कार्तिकेय का नाम पनामा पेपर्स में आया है, यह कहकर, सारी हदें पार कर दी. हम उन पर आपराधिक मानहानि का केस करने जा रहे हैं।’ बाद में राहुल गाँधी की इस सफ़ाई पर मामा जी का गुस्सा शांत हो गया कि उन्हें कन्फ्यूज़न हो गया था। पनामा पेपर्स में नाम छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे का है. 

 

राम बाण

बहरहालये जगविदित है मामा जी बतौर मुख्यमंत्री मोदी जी की पहली पसंद नही है. सन 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले प्रधानमंत्री पद के भाजपा के दावेदार के लिये मोदी जी का नाम औपचरिक रूप से पेश किये जाने के वक्त मामा जी ने कुछ अन्य नेतओ के साथ पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवानी कैम्प की तरफ से रोकने की कोशिश की थी. मोदी जी इसे नहीं भूले हैं. योगी जी और मामा जी मुख्यमंत्री की गद्दी पर विराजमान हैं तो इसका श्रेय मोदी जी को नहीं बल्कि दोनो के प्रति वरदहस्त मुद्रा में दिखते आरएसएस को जाता है. 

आरएसएस और कुछ भाजपा नेताओ को भी शायद यह लगता होगा कि महामारी से देश में दिनो दिन बढ्ती आर्थिक , सियासी और सामाजिक जटिलता के कारण अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के साथ ही भारत को हिंदु राष्ट्र घोषित करने के वास्ते उत्तर प्रदेश ही नहीं मध्य प्रदेश जैसे अन्य बडे़ राज्य में और सम्भवत: लोकसभा के लिये नया चुनाव ही एकमात्र रामबाण है।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


मीडिया विजिल जनता के दम पर चलने वाली वेबसाइट है। आज़ाद पत्रकारिता दमदार हो सके, इसलिए दिल खोलकर मदद कीजिए। अपनी पसंद की राशि पर क्लिक करके मीडिया विजिल ट्रस्ट के अकाउंट में सीधे आर्थिक मदद भेजें।

मीडिया विजिल से जुड़ने के लिए शुक्रिया। जनता के सहयोग से जनता का मीडिया बनाने के अभियान में कृपया हमारी आर्थिक मदद करें।