चुनाव चर्चा: बिहार का चुनावी पहाड़ अकेले चढ़ने का भाजपायी स्वप्न

चन्‍द्रप्रकाश झा चन्‍द्रप्रकाश झा
बिहार Published On :


कोरोना कोविड-19 की चौतरफा पसरी महामारी के बीच ही बिहार विधान सभा के नवम्बर 2020 से पह्ले सम्भावित चुनाव को लेकर सभी चुनावी राजनीतिक पार्टियां की तैयारी तेज होती जा रही है. वे अपनी जमीनी चुनावी ताकत को बढाने के लिये पुराने और नये सहयोगी दलो और मुद्दो की तलाश में लगे है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का रास्ता सुगम बनाने में अदालती और प्रशासनिक बाधा दूर करने में अपने सर्वोच नेता एवम प्रधानमंत्री नरेंद मोदी के योगदान के दावे के साथ ही इसी राज्य के फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की कथित आत्महत्या को भुनाने की खुल कर ठान ली है. केंद और बिहार की भी सत्ता में काबिज नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) में शामिल भाजपा ही राज्य के मुख्यमत्री नीतिश कुमार की पार्टी, जनता दल यूनाइटेद (जेडी-यू) समेत अन्य दलो के भी मुद्दे सेट कर रही है.

विपक्ष के पास संसद के चालू मानसून सत्र में पारित तीन विवादित कृषि विधेयको की बदौलत अचानक से किसानो का मुद्दा हाथ लग गया है. किसान मुद्दा राज्य में गरमा गया है. इसलिए भी कि गत रविवार राज्यसभा मे इन विधेयको को एनडीए के स्पषष्ट बहुमत न होने की सम्भावना के मद्देनज़र उन्हे मत विभाजन की विपक्ष की मांग ‘ असंवैधानिक ‘ रूप से अनसुनी कर ‘ संदेहास्पद ध्वनिमत ‘ के जोर पर पारित घोषित कर देने वाले उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह जेडी-यू के ही हैं.वह नीतिश कुमार के बेहद करीबी भी हैं.

विपक्ष के पास बेरोजगारी , भुमि सुधार और महामरी से निपटने में केंद्र और राज्य दोनो की सरकार की कमोबेश विफतता का मुद्दा पहले से है.चुनाव कार्यक्रम की निर्वाचन आयोग की औपचारिक घोषणा हो जाने के बाद हम इस स्तम्भ के अगले अंको में सभी पक्ष के चुनावी मुद्दो की विस्तार से चर्चा करेंगे. 

फिलक़्त हम इस आलेख के साथ दिवंगत सुशांत सिह राजपूत को लेकर भाजपा की बिहार प्रदेश इकाई द्वारा जारी एक पोस्टर का फोटो दे रहे है (देखे फोटो). हम इंडिया टीवी के मलिक एंकर रजत शर्मा के टवीट के साथ नत्थी उस पेंटिंग का भी फोटो दे रहे हैं जिसमें भगवान राम से भी बडे मोदी जी को राम जी को मंदिर ले जाते दर्शाया गया है. ये पेंटिंग अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को बिहार के चुनाव मे सियासी रूप से भुनाने की पेशबंदी मानी जा सकती है. 

गौरतलब है कि जिस भाजपा का त्रिपुरा और पूर्वोत्तर के कई राज्यो में कभी एक भी विधायक नहीं था वहाँ उसकी अपने दम पर या फिर कुछ छोटे दलो के समर्थन से सरकार बन चुकी है. वह महाराष्ट्र  और हरियाणा जैसे उन कुछेक राज्यो तक में अपनी सरकार बना चुकी है जहा वह किसी छोटे दल की पिछलग्गू होती थी. 

बिहार में पिछले 15 बरस से बीच के कुछ समय को छोड मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की पार्टीजेडी-यू और भाजपा की ही संझा सरकार रही है. लेकिन इस सरकार का नेतृत्व कभी उसके पास नहीं रहा. 

देश के उत्तरी राज्यो में जब 1960 के दशक में गैर-कांग्रेसवाद के नारे पर ‘संयुक्त विधायक दल’ की मिलीजुली सरकारो का दौर शुरु हुआ तो उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में भी भजपा की पूर्ववर्ती पार्टीभारतीय जनसंघ को साथ लेकर ऐसी सरकार बनी, गिरी , फिर बनी और फिर गिरी थी. मध्य प्रदेश, राजस्थान के पुराने राज्यो और नये बने राज्यो- हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड,  छत्तीसगढ और गोवा तक में भाजपा ने अपने दम पर सरकार बनाने के बाद वहा अपनी राजनीतिक जमीन बढा ली. लेकिन बिहार का राजनीतिक मैदान भाजपा के लिये पहाड ही बना रहा. भाजपा को इस राजनीतिक पहाड पर चढाई के लिये जेडी-यू जैसी उस पार्टी का पिछलग्गू बन जाना पड़ा जो मूलभूत रूप से नीतिश कुमार की व्यक्ति आधारित पार्टी ही है. 



वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश झा का मंगलवारी साप्ताहिक स्तम्भ ‘चुनाव चर्चा’ लगभग साल भर पहले, लोकसभा चुनाव के बाद स्थगित हो गया था। कुछ हफ़्ते पहले यह फिर शुरू हो गया। मीडिया हल्कों में सी.पी. के नाम से मशहूर चंद्र प्रकाश झा 40 बरस से पत्रकारिता में हैं और 12 राज्यों से चुनावी खबरें, रिपोर्ट, विश्लेषण के साथ-साथ महत्वपूर्ण तस्वीरें भी जनता के सामने लाने का अनुभव रखते हैं। सी.पी. आजकल बिहार में अपने गांव में हैं और बिहार में बढ़ती चुनावी आहट और राजनीतिक सरगर्मियों को हम तक पहुँचाने के लिए उनसे बेहतर कौन हो सकता था।



 


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