खिलंदड़ी मग़रूर ट्रम्प का अवसान और उदार लोकतंत्र की विजय! 


अमेरिका के ताज़ा घटनाचक्र  से जहाँ अमेरिका की  छवि  ध्वस्त हुई है वहीँ  इससे यह चेतावनी भी उभरी है कि  चरम दक्षिणपंथी किस  तरह से  उदार पूंजीवादी  लोकतंत्र को भी  बर्दाश्त नहीं करना चाहते। उन्हें इस सदी में फासीवाद-नाज़ीवाद-अधिनायकवाद  के नये अवतार चाहिये। पिछली सदी में  फ़्रांसिसी दार्शनिक फूकोयामा  ने  इतिहास  के अंत की घोषणा  की थी।  उनके  मत में  उदार लोकतंत्र के बाद  इतिहास  का अंत  हो चुका है। लेकिन  ट्रम्प  और उनके सरीखे  शासक  ‘उत्तर लोकतंत्र’  की  रचना  कर रहे हैं जिसमें  नस्लवाद, धर्म-मज़हब, जातिवाद, कॉर्पोरेट पूंजीवाद और  उच्च प्रौद्योगिकी का  मानव  विरोधी  गठबंधन  आक्रामक  रोल  अदा  कर रहा  है।


रामशरण जोशी रामशरण जोशी
काॅलम Published On :


आखिरकार अमेरिका के चरम हठीले व बचकानी हरकतबाज़ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आज़ अपनी शिकस्त मान ली और डेमोक्रैट पार्टी के विजयी प्रत्याशी जोसेफ (जो) बाइडेन को विधिवत सत्ता सौंपने के लिए तैयार हो गये। लेकिन इस घोषणा से पहले उन्होंने जहाँ अपनी जमकर फ़ज़ीहत कराई वहीँ इससे पहले  उन्होंने और उनके चरमपंथी या अंध भक्तों ने वाशिंगटन स्थित कैपिटोल हिल या संसद भवन में अमेरिका के उदार पूंजीवादी लोकतंत्र के परखचे भी उड़ाये। अंध  ट्रम्प-भक्त अमेरिकी राजधानी में जमा हुए और इसके बाद कांग्रेस भवन यानि संसद भवन में बलात प्रवेश कर गये। इनमें से कई हथियारबंद थे। जब वे अंदर घुस रहे थे तब संसद के दोनों सदनों (प्रतिनिधि सभा यानि लोकसभा और सीनेट यानि राज्यसभा) में बाइडेन की विजय की औपचारिक घोषणा की तैयारियां चल रही थीं। रिपब्लिकन पार्टी की ही उपराष्ट्रपति माइक पेन्स इसकी घोषणा करने वाले थे लेकिन अंधभक्तों ने संसद के दोनों चैंबरों (सदन) में जबरन प्रवेश किया। नारेबाज़ी की। हुड़दंग मचाया। चुनाव नतीजों को मानने से इंकार कर दिया और ट्रम्प की भाषा में कहते रहे ‘चुनाव फ्रॉड है, चुनाव नतीजों का अपहरण किया गया है’ आदि आदि।

यह स्तम्भलेखक कैपिटोल स्थिति अमेरिकी संसद के दोनों सदनों को देख चुका है। यह अत्यंत आकर्षक भवन है। सुरक्षा गज़ब की है। चप्पे-चप्पे पर तलाशी और  फ्रिस्किंग है। सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ामों के बावज़ूद हिंसक भक्तों का इस विशाल भवन में घुसना एक हैरतअंगेज़ घटना है। सुरक्षाकर्मी क्या कर रहे थे? क्या  नस्लवाद ने उन्हें दबोच रखा था? अश्वेतों से निपटने के लिए तो श्वेत सुरक्षाकर्मी ज़बरदस्त फुर्ती से काम लेते हैं लेकिन श्वेत हिंसक भीड़ के मामले में संकोच  दिखाते हैं इसलिए अमेरिकी पुलिस पर नस्लवादी होने के आरोप जड़े जाते हैं।

अमेरिकी लोकतंत्र को वैश्विक लोकतंत्र का सिरमौर माना जाता रहा है। इसे भारतीय मुहावरे में ‘लोकतंत्र का कलश’ कहा जा सकता है। लेकिन 2016 में रिपब्लिकन प्रत्याशी के रूप में निर्वाचित ट्रम्प ने अपनी ही राष्ट्र के कलश को शिखर से नीचे गिरा दिया। लोकतंत्र को धूलधूसरित कर डाला। अंधभक्तों या चरम नस्लवादियों की इस हिंसात्मक हरक़त को पर्यवेक्षकों ने ‘विद्रोह’ या ‘कू’ या ‘इन्सुररेक्शन’ की संज्ञा दी है। 2012 में रिपब्लिकन पार्टी के पूर्व राष्ट्रपति- उम्मीदवार मिट रोमनी ने कहा “राष्ट्रपति की वजह से यह सब कुछ हुआ है। यह विद्रोह है।” चरमपंथी-नस्लपंथी भक्तों की उग्रता को देखकर टीयर गैस छोड़ी गई। हिंसा हुई। खबर है कि चार लोग मर चुके हैं। करीब 50 लोगों को गिरफ्तार किया गया। हिंसा को देखते हुए निवर्तमान उपराष्ट्रपति पेन्स को चेतावनी देनी पड़ी, “हमारी कैपिटोल पर इस हमले को बरदाश्त नहीं किया जायेगा और जो इसमें लिप्त हैं उनके साथ कानून अच्छी तरह से निपटेगा”। उनकी यह चेतावनी ट्वीट ज़रिये देश को दी गई। उपराष्ट्रपति ने भी इसे विद्रोह कहा। उन्होंने गहरी नाराज़गी जाहिर करते हुए कहा “यह विरोध या प्रतिवाद नहीं है, विद्रोह है।”उन्होंने अपने राष्ट्रपति यानि बॉस ट्रम्प से कहा कि वे टेलीविज़न पर राष्ट्रीय सम्बोधन करें और जनता से कहें कि अपनी शपथ के अनुसार संविधान की रक्षा करेंगे। 

अमेरिका के ताज़ा घटनाचक्र से जहाँ अमेरिका की छवि ध्वस्त हुई है वहीँ इससे यह चेतावनी भी उभरी है कि चरम दक्षिणपंथी किस तरह से उदार पूंजीवादी  लोकतंत्र को भी बर्दाश्त नहीं करना चाहते। उन्हें इस सदी में फासीवाद-नाज़ीवाद-अधिनायकवाद  के नये अवतार चाहिये। पिछली सदी में  फ़्रांसिसी दार्शनिक फूकोयामा ने इतिहास के अंत की घोषणा की थी। उनके मत में उदार लोकतंत्र के बाद इतिहास का अंत हो चुका है। लेकिन ट्रम्प और उनके सरीखे  शासक ‘उत्तर लोकतंत्र’ की रचना कर रहे हैं जिसमें नस्लवाद, धर्म-मज़हब, जातिवाद, कॉर्पोरेट पूंजीवाद और उच्च प्रौद्योगिकी का मानव विरोधी गठबंधन आक्रामक रोल अदा  कर रहा है।

सवाल अमेरिका या कॉर्पोरेट, ट्रम्प का ही नहीं है, बल्कि उस ‘पैटर्न’ या ‘फिनोमेनन’ का है जो पिछले कुछ सालों से भारत समेत दुनिया के विकसित देशों में भी शिद्द्त के साथ उभर रहा है। संवैधानिक संस्थाओं को अधिनायकवादी शासन शैली का ‘दास’ बनाया जा रहा है। क्या मोदी-ट्रम्प जुगलबंदी (अहमदाबाद और हूस्टन) अकारण थी?  कोरोना के दौर में भी हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने बचकाने राष्ट्रपति ट्रम्प का गुजरात में स्वागत किया था। उससे पहले मोदीजी ने अमेरिका में नारा लगाया था “अब की बार ट्रम्प  सरकार।” क्या राजनयिक दृष्टि से इस घटना को शोभाजनक कहा जा सकता है?  इतना साफ़ है कि अंधभक्तों के लिए लोकतंत्र, लोकतान्त्रिक संस्थाएँ और  संविधान ‘ठेंगे’ पर हैं। उनके लिए वोट सिर्फ ताश का पत्ता है। किसान आंदोलन, लव जिहाद, दल-बदल के माध्यम से विरोधी दलों की सरकारों का अपहरण, भय-मनोविज्ञान, राज्य आतंक जैसे घटनाचक्र की पृष्ठभूमि में भारत के सच्चे राष्ट्रवादियों, देशभक्तों, लोकतंत्र आस्थावानों, बहुलतवादियों और संविधानवादियों को सबक़ लेना चाहिए और सावधान भी रहना चाहिए।




रामशरण जोशी वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विजिल के सलाहकार मंडल के सम्मानित सदस्य हैं।


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