सीपी कमेंट्री: बिहार का पैग़ाम- ‘कॉमरेड लाओ नया वाम!’

चन्‍द्रप्रकाश झा चन्‍द्रप्रकाश झा
काॅलम Published On :


भारत में कोरोना-कोविड 19 नाम की नई महामारी के पहले से उत्पन्न आर्थिक, सामाजिक , राजनीतिक संकट बिहार की 17 वी विधान सभा चुनाव के बाद और गहरा गये. नई सरकार जिनकी भी बने वो शायद ही कह पाएंगे कि इस चुनाव के परिणामस्वरूप ‘भारत के हम लोग’ के सामने मुंह बाये खड़ी कोरोना महामारी और अन्य संकटों का अंबार खत्म हो जाएगा. ये अभूतपूर्व परिस्थितियों में कराया गया अभूतपूर्व चुनाव है जिसके परिणाम बिहार ही नहीं बल्कि देश भर के लिए देर सबेर अभूतपूर्व होना लाजिमी है। 

निर्वाचन आयोग ने 25 सितम्बर को किसानो के भारत बंद के दिन ही अचानक बुलाई प्रेस काफ्रेंस में बिहार चुनाव के कार्यक्रम घोषित किये. लोगों के बीच संदेह पैदा हुआ कि भारत बंद की खबरों को दबाने के लिए ही अचानक बिहार विधानसभा चुनाव कार्यक्रम का एलान किया गया. हालांकि चुनाव कार्यक्रम सितम्बर माह में घोषित करने की सम्भावना भारत बंद के आयोजन के निर्णय के पहले से व्यक्त की जा रही थी. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहले ही संकेत दे दिए थे कि चुनाव की घोषणा सितंबर में ही हो सकती है. वही हुआ भी. भारत में उत्तर प्रदेश के बाद सबसे बडी आबादी के राज्य, बिहार में 7.79 करोड़ वोटर हैं जिनमें से अधिसंख्य खेत मजदूर और खेत मालिक किसान ही हैं.

ये चुनाव दरअसल, विपरीत परिस्थितियों में भी भारत की सदियों पुरानी जीवंतता बरकरार रखने की अदम्य ईकछा शक्ति की अग्नि परीक्षा रही. किसी भी देश की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था मेँ सावधिक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की हिफाजत ही करती है. बिहार के चुनाव से भी यही उम्मीद रही. ऐसी उम्मीद न होती तो ये चुनाव भारत के संविधान के प्रावधानों के तहत कुछेक माह टाले भी जा सकते थे. इस प्रावधान का बिहार समेत कुछेक राज्यों में एक से ज्यादा बार उपयोग भी किया जा चुका है. मौजूदा विधान सभा का 5 बरस का कार्यकाल 29 नवंबर को खत्म हो रहा है. उसके पहले नई सरकार बन जाने के पूरे आसार हैं. लेकिन नई सरकार की राजनीतिक स्थिरता को लेकर अभी से व्यापक संदेह हैं. उन सन्देह के बारे में हम विस्तार से चर्चा बिहार का पैगाम शीषक इस विश्लेषणपरक लेखमाला के अगले अंक में करेंगे. ये अंक वाम और वामपंथ के जिसे कम्युनिस्ट भी कहते हैं. 

इस चुनाव में और खास कर चुनाव परिणाम से जो राजनीतिक परिदृशय उभरा है उसे हम समझने में सुविधा के लिये नया वाम कह सकते हैं. न्यू लेफ्ट की सियासी अवधारणा नई नहीं है. लेकिन भारत में चुनावी संदर्भ मे नया वाम पहली बार बिहार के मैदान में ही उभरा है. भारत में कम्युनिस्ट के सौ बरस के इतिहास में पहली बार इसी बिहार चुनाव में ये नया वाम नज़र आया जिसने आपस की पहली पूर्ण मोर्चाबंदी मे दाहिना और वाम के बीच की कांग्रेस और पूर्व मुख्यमंत्री लालू पसाद यादव की भी मध्यमार्गी ही राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को भी साथ ले लिया. इसलिये ये नया वाम है. 

बिहार चुनाव 2020 के बारे में हमारे एक आलेख का जो शीषर्क मीडिया विजिल के सम्पादक डाक्टर पंकज श्रीवास्तव ने दिया था वह सच साबित हुई. बिहार की सियासत में लाल तेल घुस गया है. तीनों प्रमुख कम्युनिस्ट दलो के कुल मिलाकर 16 विधायक जीते हैं. इनमें भाकपा-माले के 12, भाकपा के दो और माकपा के भी दो विधायक हैं. बिहार की विधायिका में इतने लाल लंबे समय बाद पहुंचे हैं. ये लाल रंग क्या बोलेगा इसकी चर्चा हम इस आलेख में करेंगे. फिलहाल इतना जरूर उल्लेख हो जाये कि नया वाम की चुनावी सफलता गैर-वाम सियासी पंडितो के लिये चोंका देने वाली है.  

माँ और कॉमरेड 

अधिकतर अवाम को कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के वर्षउनके मानवीय जिह्वा मरोड देने वाले लम्बे चौडे नाम, उनके आगे- पीछे के प्रत्यय और उपसर्ग, नेता, पोलितब्युरो, सेंट्रल और स्टेट कमेटी, स्थापना वर्ष के मतभेद के बारे में थेसिस, रिसर्च, पार्टी प्रोग्राम, पार्टी कांग्रेस, पार्टी प्लेनम, पार्टी स्ट्रेटजी, पार्टी टैक्टिक्स आदि को कोई खास मतलब नहीं है. लेकिन अवाम करीब एक सौ बरस से लाल झंडा पहचानती है. अवाम ये भी जानती है कि लाल झंडा वाले एक दूसरे को कामरेड कहते हैं. अवाम ने भी कामरेड कहना सीख लिया है. यह जानने के किये भाषाशास्त्री होने की जरुरत नहीं है कि क्यों दुनिया भर के लोग अपनी जननी माँ को जन्म के तत्क्षण बाद से अपनी-अपनी भाषा में मलंत ध्वनि की माँ जैसा सम्बोधन ही इस्तेमाल करते कहते हैं. यही बात दुनिया के हर देश के हर समाज की हर भाषा में कामरेड सम्बोधन पर लागू होती है. काम्ररेड, माँ के बाद एकमात्र सर्व-सामाजिक, सर्व-सांस्क्रितिक,  सर्व-देसीय और सर्व-भाषिक शब्द सम्बोधन बन चुका है. बिहार इसका अपवाद नहीं है. 

कम्युनिस्ट पार्टियाँ

सबसे पहले भारत की कम्युनिस्ट पार्टी यानि  सीपीआई ( भाकपा ) बनी. इसके स्थापना वर्ष को लेकर आम सहमति नहीं है. पर निर्विवाद तथ्य है कि भारत की सबसे पहले कम्युनिस्ट पार्टी सन 1920 से 1925 की अवधि में बनी. कुछ लोग भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की शत वार्षिकी इसी वर्ष 2020 में मना रहे हैं. कुछ और लोग इसके लिये और पांच बरस इंतजार कर सकते हैं. आरएसएस की स्थापना की भी शतवार्षिकी की तैयारी चल रही है जो 2023 में है. यह स्तम्भ्कार भाजपा की स्थापना से सौ बरस पह्ले मुम्बई मैं ही 1885 में सथापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शताब्दि अधिवेशन का प्रत्यक्षदर्शी है. 

भारत की तीनों प्रमुख संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियों ने 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले अपनी अपनी पार्टी-कांग्रेस में निवर्तमान महासचिव को ही इस पद पर फिर चुनकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के राजनीतिक अंग  के नये रूप में भारतीय जनसंघ की जगह मुम्बई में 1980 में कायम भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की साम्प्र्दायिक फासीवादी प्रवृतियों के खिलाफ सीमित परिप्रेक्ष्य में नई चुनावी कार्यनीति तैयार कर अपने पार्टी कार्यक्रम लगभग यथावत रखे. संसदीय लोकतांत्रिक चुनावों को लेकर भारत के कम्युनिस्टों के बीच खास तरह का द्वंद्व हमेशा से रहा है. 

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी यानि सीपीएम (माकपा ) 

सीपीआई के 1964 में विभाजन से बनी माकपा में शुरू से कांग्रेस के प्रति विरोधी रूख रहा. माकपा 1960 के दशक के उत्तरार्ध में बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे कुछेक राज्यों में कांग्रेस के खिलाफ गैर-कांग्रेस दलों की संयुक्त विधायक दल (संविद) की सरकारों से बाहर ही रही थी. लेकिन यह दुनिया की शायद पहली और अब तक एकलौती कम्म्युनिस्ट पार्टी है जो बिभिन्न सरकार में शामिल हुए बगैर ही उसे बाहर से अपना समर्थन देती रही है.

निर्वाचन आयोग के कागज में ‘भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी’ के औपचारिक नाम से दर्ज सीपीएम (हिंदी में माकपा) ने बिहार विधानसभा चुनाव के लिए अपने घोषणापत्र में किसानों का फसली कर्ज माफ करने, युवा बेरोजगारों को मासिक 5 हजार रुपए भत्ता देने, वृद्धावस्था सामाजिक सुरक्षा पेंशन बढाने, आंगनबाड़ी सेविका, आशा, उषा आदि राजकीय स्कीम की महिलाकर्मियो को मासिक 18 हजार रुपए वेतन देने और भूमि सुधार के लिए डी. बंद्योपाध्याय आयोग की रिपोर्ट लागू करने का वादा किया. पार्टी राज्य सचिव अवधेश कुमार द्वारा जारी घोषणापत्र में गरीबों, किसानों, मजदूरों, युवाओं, महिलाओं के हितों के लिए आवश्यक और अधिक विधिक एवम वित्तीय व्यवस्था करने, शिक्षकों को बेहतर वेतनमान देने, सभी बच्चों को 12 वीं कक्षा तक गुणवत्तापूर्ण मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराने, मुफ्त स्वास्थ्य जांच और दवा देने के लिये पंचायत स्तरीय सुविधा सुदृढ़ करने, खेतों की सिंचाई व्यवस्था बेहतर करने और किसानों के अनाज की खरीद लाभकारी मूल्य पर करने का भी वादा किया गया.

यही चुनावी वादे भाकपा-माले और भाकपा ने ही नहीं उनके महागठबंधन के सभी दलो की तरफ से भी किये गये. भाकपा माले महासचिव ने मीडिया विजिल से बातचीत में संकेत दे दिये थे कि नई सरकार महागठबंधन की बनने की स्थिति में उसमें उनकी पार्टी शामिल नहीं होगी. लेकिन तत्काल यह स्पष्ट नहीं किया गया कि क्या सीपीएम ने ऐसी किसी भी सरकार में शामिल नहीं होने की अपनी पुरानी लाइन छोड़ दी है जिसमें उसका खास दखल न हो.

भाकपा से माकपा का विभाजन मूलतः इसी मुद्दे पर हुआ कि अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व कांग्रेस का हाथ थाम सत्ता में दाखिल होने के पक्ष में था. जिस हिस्से ने अलग माकपा बनाई उसका मत था जब तक किसी सरकार को चलाने में मुख्य भूमिका नहीं मिले, उसमें शामिल नहीं होना चाहिए। निर्वाचन आयोग से मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय पार्टियों में शामिल माकपा की लोकसभा और राज्यसभा में कुछ सदस्य हैं. उसकी पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में सरकार रही है. वह अभी केरल में सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) का नेतृत्व कर रही है. पहली बार 1967 में चुनावी मैदान में उतरी माकपा के जम्मू-कश्मीर , हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना आदि राज्यो में कुछेक विधायक रहे हैं. माकपा इंदिरा गांधी सरकार के अधिनायकवादी बताये गये राजकाज के खिलाफ बिहार से 1974 मैं समाजवादी सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण  की अगुवाई में शुरू हुए जेपी मूवमेंट आंदोलन से अलग रही थी. 

माकपा की हैदराबाद में अप्रैल 2019 में 22 वी पार्टी कांग्रेस में तबके  महासचिव सीताराम येचुरी को फिर इस पद पर चुन लिया गया. माकपा की चुनावी व्यूह-रचना में नई लाइन तय की गई. कांग्रेस से चुनावी सम्बन्ध नहीं रखने की पुरानी लाइन को भाजपा की हार सुनिश्चित करने संशोधित कर दिया गया. नई लाइन में माकपा के हर राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग चुनावी कार्यनीति पर चलने को हरी झंडी दे दी गई.

भाकपा माले यानि सीपीआईएमएल 

सन 1998 से भाकपा-माले के महासचिव गुवाहाटी में दिसम्बर 1960 में पैदा दीपांकर भट्टाचार्य हैं, जो 1998 में विनोद मिश्र ( वीएम ) के निधन के बाद महासचिव बने. भाकपा-माले ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) से  चुनावी सम्बंध के लिए राजी होने का संकेत देकर राजद नेता और झामुमो नेता (अब मुख्यमंत्री ) हेमंत सोरेन से भेंट की थी. कारण जो भी हो, उस चुनाव में बिहार और झारखंड में भाकपा, माकपा और भाकपा-माले की राजद, झामुमो और काग्रेस की मोर्चाबंदी नहीं बन सकी. 

चुनावों को लेकर भाकपा-माले का भटकाव कम नहीं रहा है. उसने नागभूषण पटनायक और अन्य कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा कायम इंडियन पीपुल्स फ्रंट(आईपीएफ) से अलग रूप में चुनाव में भाग लेना शुरू किया था. उसे कुछ शुरुआती सफलता मिली. सन 1990 के दशक के आखिर में जनता दल से लालू प्रसाद यादव के विरोध में मौजूदा मुख्यमंत्री नीतिश कुमार, पूर्व केंद्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस (अब दिवंगत) आदि ने अलग होकर जो समता पार्टी बनाई उससे भाकपा-माले ने चुनावी गठबंधन किया था. समता पार्टी जब जनता दल यूनाइटेड बन भाजपा के के गठबंधन नैशनल डेमोक्रेटिक अलायन्स ( एनडीए ) में चली गई तो उससे भाकपा माले ने किनाराकसी कर ली. बाद में भाकपा-माले का बिहार में राजद और और उसकी सरकारों के प्रति विरोध कम पड्ता गया.

भाकपा

भाकपा की लाइन हट कर रही है. उसके नेता डी.राजा कहते हैं कि कांग्रेस के साथ चुनावी सम्बंध के बगैर भाजपा-विरोधी मतदाताओं में भरोसा लाना संभव नहीं है. उनके अनुसार गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस ही प्रमुख विपक्षी ताकत है. 2019 के आम चुनाव में भाजपा-विरोधी वृहत्तर महागठबंधन में कम्युनिस्ट पार्टियों के शामिल नहीं होने का एक कारण बिहार की बेगूसराय लोकसभा सीट पर भाकपा प्रत्याशी कन्हैया कुमार के खिलाफ राजद का विरोध भी था. भाकपा, सत्ता में रहने के लिये उत्तर प्रदेश में उस मिली जुली सरकार में भाजपा के पूर्ववर्ती  जनसंघ के भी साथ शामिल हो गई थी जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी शामिल होकर पहली बार मंत्री बने थे. 

बहरहाल देखना यह है कि राज्य की नई सरकार के प्रति इस नये वाम का लाल और कितना लाल होता है. ये नया वाम बिहार के बाद बगल में बंगाल में क्या रंग लेता है. ये भी देखना है कि अगले वर्ष चुनाव होने हैं. तय सी बात लगती है बंगाल में भी नया वाम उभरेगा जहाँ की सियासत एक चौथी सदी से ज्यादा लाल ही रहने के बाद ही कुछ वर्ष पहले तक लाल के खिलाफ चली गई.


*सीपी नाम से चर्चित लेखक चंद्रप्रकाश झा ,युनाईटेड न्यूज ऑफ इंडिया के मुम्बई ब्यूरो के विशेष संवाददाता पद से रिटायर होने के बाद तीन बरस से अपने गांव में खेतीबाड़ी करने और स्कूल चलाने के साथ ही स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन भी कर रहे हैं. उन्होने भारत की आज़ादी, चुनाव , अर्थनीति, यूएनआई का इतिहास आदि विषय पर कई ई-किताबे लिखी हैं. वह मीडिया विजिल के चुनाव चर्चा के स्तम्भकार हैं. वह क्रांतिकारी कामरेड शिव वर्मा मीडिया पुरस्कार की संस्थापक कम्पनी पीपुल्स मिशन के अवैतनिक प्रबंध निदेशक भी हैं, जिसकी कोरोना- कोविड 19 पर अंग्रेजी–हिंदी में पांच किताबो का सेट शीघ्र प्रकाश्य है.


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