आंदोलनों के पीछे विदेशी ताकतों को देखना औपनिवेशिक मनोवैज्ञानिक बीमारी!


मैं नहीं जानता भाजपा के लोगों ने इतिहास कितना पढ़ा है। 1940 के दशक में स्पेन में जब गृहयुद्ध छिड़ा था,  तब जवाहरलाल नेहरू वहाँ गए थे। भारतीय मानवेंद्रनाथ राय ने चीन सहित कई देशों के कम्युनिस्ट आंदोलन में मदद की। इन सब के पूर्व महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में राजनीतिक संघर्ष किया। हमलोगों ने अपने युवाकाल में ‘मेरे नाम तेरे नाम वियतनाम-वियतनाम’  के नारे लगाए हैं। तिब्बत की आज़ादी के लिए, नेपाल की आज़ादी के लिए अनेक शीर्ष भारतियों ने संघर्ष किए हैं। इसी तरह अनेक विदेशी हस्तियों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में शिरकत की है। एनी बेसेंट, एंड्रूज, मीरा बेन (मेडेलिन स्लेड) आदि हस्तियां भारतीय नहीं थीं। जिस विवेकानंद की ताबीज़ भाजपा लटकाए होती है, उनकी सहयोगी भगिनी निवेदिता (मारगरेट एलिज़ाबेथ ) कौन थी? कहाँ की थी?


प्रेमकुमार मणि प्रेमकुमार मणि
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बस इसी बात का इंतज़ार था। भाजपा और केंद्र सरकार ने आखिर किसान आंदोलन के पीछे विदेशी साजिश देख ही ली। स्वीडन की एक अठारह वर्षीया बिटिया Greta Thunberg , जो पर्यावरण एक्टिविस्ट है , के एक ट्वीट, जो किसान आंदोलन के समर्थन में है,  को भाजपा और केंद्रीय सरकार में बैठे लोग विदेशी साजिश बता रहे हैं. कल एक ख्यात अमेरिकन सिंगर Rihanna  ने भी किसान आंदोलन के समर्थन में ट्वीट किया था। दो-दो विदेशी बालाएं अनायास तो नहीं ही भारत की आंतरिक राजनीति में दखल दे रही हैं! शायद मिस ग्रेटा के खिलाफ कहीं मुकदमा भी दर्ज़ कर लिया गया है।

जिन लोगों को 1975 की इमरजेंसी की याद होगी, वे बता सकेंगे कि तब इंदिरा गाँधी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लोग भी जयप्रकाश आंदोलन में विदेशी साजिश ही देख रहे थे। इमरजेंसी लगने के ठीक पहले जेपी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली की थी। रैली को विफल करने के बहुत उपाय किए गए। बावजूद इसके जब जबरदस्त रैली हुई तब इंदिरा भयभीत हो गईं। आनन-फानन इमरजेंसी लगाई गई और सभी विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इंदिरा गाँधी का कहना था कि जेपी सेना को बगावत करने के लिए भड़का रहे थे और इन सब के पीछे विदेशी ताकतें काम कर रही हैं।

जब हम छात्र थे, तब एक शब्द खूब प्रचलित था। तब की कांग्रेस सरकार हर आंदोलन के पीछे विदेशी पंचगामी तत्वों का हाथ देखती थी। आज तक मैं इस पंचगामी शब्द का ठीक-ठीक मतलब नहीं समझ सका हूँ।

आंदोलनों के पीछे विदेशी ताकतों को देखना एक औपनिवेशिक मनोवैज्ञानिक बीमारी है। विदेशी हुकूमत के गुलाम रहे देशों में यह बात यदि आप ने फैला दी कि इसके पीछे विदेशी ताकत है, तो लोग एक बार फिर सतर्क हो जाते हैं। विदेश से भय और विदेश से मुहब्बत एक साथ यहाँ चलते हैं। विदेशी डिग्रियां, विदेशी नौकरियां हमारे यहां खूब पसंद की जाती हैं। विदेशों में विवेकानंद, गांधी, नेहरू की इज़्ज़त होती है, तो यहाँ भी अचानक बढ़ जाती है। चुनाव के पहले और कुछ बाद भी विदेशों में खूब मोदी-मोदी के नारे लगे। तब कोई नहीं कहता था कि विदेशी ताकतें हमारे देश में दखल दे रही हैं। हमारे प्रधानमंत्री पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में वहां जाकर ट्रम्प के समर्थन में ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ के नारे लगाए तब यह बुरा नहीं था। बिचारी थन्बर्ग ने किसानों की पीड़ा देख सुन कर एक ट्वीट क्या कर दिया, सरकार की चूलें हिल गईं।

मैं नहीं जानता भाजपा के लोगों ने इतिहास कितना पढ़ा है। 1940 के दशक में स्पेन में जब गृहयुद्ध छिड़ा था,  तब जवाहरलाल नेहरू वहाँ गए थे। भारतीय मानवेंद्रनाथ राय ने चीन सहित कई देशों के कम्युनिस्ट आंदोलन में मदद की। इन सब के पूर्व महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में राजनीतिक संघर्ष किया। हमलोगों ने अपने युवाकाल में ‘मेरे नाम तेरे नाम वियतनाम-वियतनाम’  के नारे लगाए हैं। तिब्बत की आज़ादी के लिए, नेपाल की आज़ादी के लिए अनेक शीर्ष भारतियों ने संघर्ष किए हैं। इसी तरह अनेक विदेशी हस्तियों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में शिरकत की है। एनी बेसेंट, एंड्रूज, मीरा बेन (मेडेलिन स्लेड) आदि हस्तियां भारतीय नहीं थीं। जिस विवेकानंद की ताबीज़ भाजपा लटकाए होती है, उनकी सहयोगी भगिनी निवेदिता (मारगरेट एलिज़ाबेथ ) कौन थी? कहाँ की थी?

मुझे यह उम्मीद नहीं थी कि भाजपा इस छिछोरेपन पर उतरेगी। अब भी मेरा आग्रह यही होगा कि वह किसानों के मामले पर संजीदा हो। यह कैसा रिवाज है कि जिसकी भलाई के लिए आप कोई कदम उठा रहे हो और वह आदमी कह रहा है कि इसमें मेरी भलाई नहीं, बर्बादी है, तब भी आप कोई सुनवाई नहीं कर रहे हो। अंग्रेज यही कहते थे कि भारत की भलाई के लिए हम यहाँ बने हुए हैं। गांधी ने कहा, तुमलोग जाओ। हम अपना देख लेंगे। हमारी पौराणिकता का रावण भी सीता को सुखी बनाने के वायदे के साथ ही अपहरण कर ले गया था। वह उसे स्वर्ण लंका के आनंदवन का लोभ दे रहा था। हे पर्णकुटी की सीते! क्या है इस अरण्य में। आप को सोना की लंका में होना है। ऐसा ही लोभ किसानों को दिया जा रहा है। बाघ के हाथ में सोने का कंगन देख किसान सहम गए हैं। वे कह रहे हैं हमें पुराने हाल पर छोड़ दो। आप कह रहे हो, हम आप का विकास करके रहेंगे। सीधी बात नरेंद्र मोदी जी,  आप भारत के किसानों को कॉर्पोरेट ताकतों के हाथ बंधक बनाना चाहते हो। यह यदि हुआ तो भारत के गरीब रोटी के लिए तरस जाएंगे। शिक्षा और स्वास्थ्य को आप लोगों ने निजी हाथों में जाने दिया। नतीजा क्या निकला। गरीबों और अमीरों के स्कूल और अस्पताल अलग-अलग हो गए। कृष्ण और सुदामा अब कहीं  साथ नहीं पढ़ते। यह पूंजीवादी विकास कुल मिलाकर धोखे की टट्टी है। यह सोने का मिरगा है, जो छल करने आया है। इसे भारत के किसान समझ गए हैं। हो सके तो आप भी समझो मोदी जी।

इस कृषि बिल से किसानों की खेती धीरे-धीरे पूंजीपतियों के हाथ चली जाएगी। कृषि बिल के विरोध का मतलब है कृषि में पूंजीवादी घरानों के दखल को रोकना। कृषि का आधुनिकीकरण उसका पूंजीवादीकरण नहीं होना चाहिए।

और हाँ। किसानों का मामला जवानों से भी जुड़ा है। फौजी जवान व्यापारी घरानों से नहीं, किसान परिवारों से आते हैं। नब्बे फीसद जवानों के माता-पिता किसान हैं। हर जवान के दिल में किसान है और हर किसान के दिल में जवान है।


प्रेम कुमार मणि वरिष्ठ लेखक और पत्रकार हैं। सामाजिक प्रश्नों पर अपने बेबाक लेखन के लिए जाने जाते हैं। बिहार विधान परिषद के सदस्य भी रह चुके हैं।


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