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छत्तीसगढ़: सरकार बदली, पुलिस नहीं! गाँधीवादी कार्यकर्ता के आदिवासियों से मिलने पर पाबंदी!

मैं बस्तर में तीस साल पहले आया था। तब मैं पच्चीस साल का युवा था। अब मैं पचपन साल का हूँ। बस्तर के ज्यादातर गाँव के लोग मुझे पहचानते हैं मुझे प्यार करते हैं मुझसे अपने सुख दुःख बांटते हैं मेरी शादी, मेरे बच्चों का जन्म, उनका बचपन सब इन लोगों ने अपने सामने देखा है। यह लोग मुझे अपने परिवार के सदस्य जैसा मानते हैं। मुझसे अब कोई कहे कि आप इन लोगों से बात नहीं कर सकते तो मैं तो सदमे से ही मर जाऊंगा। बस्तर और आदिवासी मेरा पहला और आख़री प्यार हैं मुझे इनसे कोई जुदा नहीं कर सकता!

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हिमांशु कुमार

मेरे साथ 10 जुलाई को बड़ा मजेदार वाकया हुआ। मेरा एक दोस्त है। उनका नाम कोपा कुंजाम है। कोपा कुंजाम पहले गायत्री मिशन से जुड़े हुए थे। फिर जब 1992 में मैं और मेरी पत्नी ने आदिवासियों के गांव में रहकर सेवा कार्य शुरू किया तो कोपा हमारे साथ जुड़ गये।

2005 में जब सलवा जुडूम में आदिवासियों के गाँव खाली कराये गये तब सर्वोच्च न्यायालय ने इन गावों को दोबारा बसाने का आदेश दिया। भाजपा सरकार ने आदेश पर अमल नहीं किया।हमारी संस्था ने वीरान हो गये आदिवासियों के गावों को दुबारा बसाने का काम शुरू किया।हम लोगों ने चालीस से ज्यादा गावों को दोबारा बसा दिया।

इससे भाजपा सरकार कोपा कुंजाम से चिढ़ गई। कोपा के ऊपर हत्या और अपहरण का एक फर्जी मामला बनाया गया।कोपा को थाने में ले जाकर उल्टा लटका कर सारी रात नीचे मिर्च का धुआं दिया गया और इतना मारा गया कि कोपा की पीठ की खाल उतर गई।कोपा को जेल में डाल दिया गया।

हम लोगों ने सुप्रीम कोर्ट से कोपा की जमानत करवाई। बाद में कोपा कुंजाम को अदालत ने निर्दोष माना और बरी कर दिया। इस साल जब ग्राम पंचायतों के चुनाव हुए तो कोपा को गाँव वालों ने अपना सरपंच चुना। सरपंच बनने के बाद कोपा अक्सर मुझे फोन करके मिलने के लिए बुलाते थे। लेकिन लाक डाउन की वजह से मैं टालता रहा। 10 जुलाई को मैं कोपा कुंजाम से मिलने उनके गाँव गया। मुझे देख कर आस पास रहने वाले एक दो लोग भी आ गये। चाय पीते पीते कोपा ने कहा गुरूजी बताइये कि हम लोग आपने गाँव को कैसे बेहतर बनाएं?

मैनें कहा नौकरियां तो अब मुश्किल होती जा रही हैं। इसलिए नौजवानों को खेती पर ही ध्यान देना होगा।गावों में जितने भी सिंचाई के स्रोत हैं वहाँ फेंसिंग की व्यवस्था पर ध्यान दो। रासायनिक खाद की बजाय केंचुआ खाद की शेड बनवाओ।

अभी हमारी चाय पूरी भी नहीं हुई थी कि कोपा के पास थानेदार का फोन आ गया कि आप किसी बाहर के व्यक्ति को बुलाकर बैठक नहीं करा सकते। कोपा ने कहा कि कोई बैठक नहीं हो रही है। इतनी देर में दो तीन अन्य अधिकारियों के भी फोन कोपा को आ गये। मैंने कहा कोपा लगता है प्रशासन नहीं चाहता कि मैं किसी से मिलूँ जुलूँ इसलिए मैं जा रहा हूँ। मैं नहीं चाहता कि तुम पर कोई मुसीबत आये।

(हिमांशु कुमार द्वारा स्थापित वनवासी चेतना आश्रम को बीजेपी के राज में 17 मई 2009 को प्रशासन ने ढहा दिया था। ये तस्वीर तब की है। चित्र में हिमांशु अपने परिवार और सहयोगियों के साथ)

मैं वापस आ रहा था तो रास्ते में मैंने कोपा के गाँव की तरफ जाती हुई सरकारी गाड़ियां देखीं। एसडीएम दंतेवाड़ा,जिला पंचायत दंतेवाडा के सीईओ और तहसीलदार कोपा के पास पहुंचे। उन्होंने पूछा कि यहाँ हिमांशु कुमार क्यों आये थे ? क्या वह यहाँ मानवाधिकार के बारे में बता रहे थे? कोपा से कहा गया कि तुम मुसीबत में पड़ जाओगे जो कि एक तरह की धमकी ही थी।

मैं तबसे हैरान हूँ। क्या कांग्रेस शासित प्रदेश में एक गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता किसी पड़ोस के गाँव में नहीं जा सकता ? क्या खेती बाड़ी की बात करना अपराध है? सभी राजनैतिक पार्टियों के नेता और अधिकारी पुलिस और अर्ध सैन्य बल गावों में जा रहे हैं फिर मेरे ही गाँव में जाने से इतना हडकम्प क्यों? अगर मैं आदिवासियों से उनके मानवाधिकार की भी बात करना चाहता हूँ तो क्या अब संविधान में वर्णित मानवाधिकारों की बात आदिवासियों से करने पर कोई पाबंदी लगा दी गई है?

मैं बस्तर में तीस साल पहले आया था। तब मैं पच्चीस साल का युवा था। अब मैं पचपन साल का हूँ। बस्तर के ज्यादातर गाँव के लोग मुझे पहचानते हैं मुझे प्यार करते हैं मुझसे अपने सुख दुःख बांटते हैं मेरी शादी, मेरे बच्चों का जन्म, उनका बचपन सब इन लोगों ने अपने सामने देखा है। यह लोग मुझे अपने परिवार के सदस्य जैसा मानते हैं। मुझसे अब कोई कहे कि आप इन लोगों से बात नहीं कर सकते तो मैं तो सदमे से ही मर जाऊंगा। बस्तर और आदिवासी मेरा पहला और आख़री प्यार हैं मुझे इनसे कोई जुदा नहीं कर सकता!


लेखक प्रसिद्ध गाँधीवादी कार्यकर्ता हैं। यह बयान उनके फ़ेसबुक से साभार।

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