कोरोना काल में महिलाओं पर बढ़ी हिंसा: इस ख़ौफ़ से कैसे मिलेगी आज़ादी?

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राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में क्वारंटीन के दौरान एक स्कूल में 40 वर्षीय महिला से गैंगरेप का मामला सामने आया जिसके बाद राष्ट्रीय महिला आयोग को इस पर खुद संज्ञान लेना पड़ा। लॉकडाउन में सीकर राजस्थान के एक पिता की ओर से राष्ट्रीय महिला आयोग को शिकायत मिली, जिसमें पिता ने कहा कि उनकी बेटी की ससुराल में बेरहमी से पिटाई की जा रही है और उनके शिक्षक दामाद ने लॉकडाउन के बाद से उनकी बेटी को खाना तक नहीं दिया है।

कंचन, उम्र करीब 30/32 वर्ष. ठाकुर समाज से सम्बंधित हैं. भिलवाड़ा की रहने वाली हैं. 4 बच्चे हैं. सास- ससुर बूढ़े हैं. पति ठेला लगाते हैं. लॉकडाउन में काम धंधा बन्द रहा. कंचन कहती हैं कि “कोई सरकारी सहायता नहीं मिली. परिवार तो चलाना हैं.” इस सारे अभावों के तनाव को बच्चों और कंचन ने झेला हैं. कंचन बताती हैं कि “हर रोज पति की हिंसा का सामना करना पड़ा हैं.” कंचन अकेली महिला नहीं हैं। राजस्थान में ऐसी असंख्य महिलाएं हों जिन्होंने इस हिंसा को झेला है।

लॉकडाउन और उसके बाद उपजे हालातों ने महिलाओं की स्थिति को और गंभीर बना दिया है। तमाम सरकारें अपने -अपने दावे करतीं है। जबकी हकीकत बहुत डरावनी है। महिला आयोग की माने तो लॉकडाउन के दौरान आयोग को महिलाओं के दोगुनी से ज्यादा शिकायतें प्राप्त हो रही हैं।

हमें यहां ये भी ध्यान रखना है कि कितनी महिलाएं तो ऐसी हैं जो अपने परिवारिक, आर्थिक और सामाजिक कारणों के चलते शिकायत तक नहीं कर पातीं. एक अन्य स्टडी में ये भी तथ्य सामने आया है कि इस दौरान कंडोम की बिक्री तीगुनी से ज्यादा हो गई. ये बात किसी से छुपी नहीं हैं कि भारतीय समाज में महिलाओं का ये दायित्व बताया हुआ है कि वो चुपचाप पुरुष की इच्छा को पूरा करें।

आंकड़ों की जुबानी

भारत की कुल जनसंख्या में 48.5% महिलाएं है जिनकी श्रम बल भागीदारी 25% है, महिला की सेलरी पुरुष का 62% है, राष्ट्रीय आपराधिक अंकेक्षण ब्यूरो 2016 के अनुसार 39,068 महिलाओं के साथ रेप हुआ, ससुराल में प्रताड़ना के एक लाख से ज्यादा मामले हैं, महिलाओं के खिलाफ हिंसा में मध्य प्रेदेश, उतर प्रदेश तथा राजस्थान सबसे आगे हैं और न जाने कितने मामले तो समाज और परिवार की वजह से रिपोर्ट ही नहीं होते।

राजस्थान में करीब 50% लड़कियां 18 वर्ष से पहले ही ब्याह दी जाती हैं तथा दहेज के बिना शादी नामुमकिन है। महिलाओं की स्थिति सुधारने, उनको अधिकार देने के तमाम सरकारों के दावे बेमानी लगते हैं, जब यह रिपोर्ट देखते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण–3 के अनुसार राजस्थान में 46.03 प्रतिशत विवाहित महिलाएं पारिवारिक स्थिति में सताई हुई अनुभव करती हैं। घरेलू स्तर पर महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, दहेज के कारण महिलाओं को सताया जाना और यौन शौषण ऐसी स्थितियां हैं जिनके कारण महिलाएं सामान्य रूप से जीवन-यापन करने में अपने आपको असमर्थ पाती हैं।

आरक्षण से समाधान नहीं

भारत में महिला अधिकारों के मुद्दों को अक्सर आरक्षण और कानून में समेट दिया जाता है. जबकि मूल प्रश्न वहीं का वहीं रहता है कि क्या आज 70 वर्ष बाद भी हम स्त्री को पुरुष के समान मानने को तैयार है या नहीं? आखिर कैसे महिला को समाज में उसका हक मिले? नारीवाद की बहस का मुख्य बिंदु भी यही है।

सरकारों के दावे नाकाफी 

हालही में राजस्थान सरकार ने बहुत जबरदस्त तरीके से महिला थाना लगाने को लेकर वाहवाही लूटी है। किंतु हम ये भूल गए कि इनमें से अधिकांश प्रावधान तो हर जिले में लागू हैं. लेकिन क्या इससे अपराध रुके? उन्नाव, कठुव, हरियाणा का गैंग रेप, जयपुर में पहले हुए गैंग रेप और उसके वीडियो को वायरल कर देना और मंडप तक से महिला को अगवा कर लेना।

सरकारें बनी ख़ौफ़ फैलाने का जरिया

आजकल तो सरकारों की घोषणाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि वो सुरक्षा के नाम पर खौफ फैलाने का तंत्र बन गई है. सरकार के दावों में पुलिस की पेट्रोलिंग, स्ट्रीट लाइट, पब्लिक ट्रांसपोर्ट में जीपीएस, अपराध में सज़ा को बढ़ाना, हर स्थान पर सीसीटीवी लगाना, महिला थाना बनाना इत्यादि शामिल है।

दावे क्यों नाकाफी हैं?

जहां तक बात महिला के खिलाफ अपराध के रोकथाम की है, तो हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि 94.6 % अपराध महिला को जानने वाले लोग करते हैं. तो क्या इन प्रावधानों से यह अपराध रूक जाएंगे? और एक सबसे बड़ी बात हमारे यहां कन्विक्शन रेट बहुत कम है, अगर सज़ा को ज्यादा या फांसी कर दिया तो चूंकि अपराधी जानने वाला ही है तो महिला पर यह दवाब रहेगा और इससे तो कन्विक्शन रेट ओर कम हो जाएगा।

सुझाव

कनविक्शन रेट बढ़ाने पर काम हो

काम इस बात पर होना चाहिए कि कन्विक्शन रेट कैसे बढ़े? अर्थात यदि किसी ने अपराध किया है तो उसे कम से कम सज़ा तो मिले भले ही 2 वर्ष हो या 20 वर्ष.

तमाशबीन लोगों पर कार्यवाही हो

काम इस बात पर होना चाहिए जो लोग किसी भी महिला के साथ हिंसा होते हुए देख रहे हो और मूक दर्शक बने हुए हों उनके लिए कम से कम एक दिन की सज़ा का प्रावधान हो।

हिंसा की सँस्कृति को तोड़ना जरूरी

समाज में जब तक हिंसा की संस्कृति रहेगी तब तक स्त्री खौफ में जियेगी, आज हम न केवल उस संस्कृति को बना रहे हैं, जी रहे हैं, बल्कि जाने अनजाने में उसे आगे भी बढ़ा रहे हैं, जब तक उस हिंसा की संस्कृति की कड़ी को नही तोड़ेंगे तब तक स्त्री की मुक्ति संभव नही है,  जैसा जस्टिस वर्मा कमिटी ने भी सुझाव दिया था की हमें ऐसा माहौल बनाना चाहिए जहां हिंसा की स्थिति ही पैदा न हो।

आत्मनिर्भर बनाएं

स्त्री की मुक्ति और उसका आत्मसम्मान उसकी आत्मनिर्भरता से जुड़ा है। जब तक स्त्री आत्मनिर्भर नहीं बनेगी, तब तक वो अपनी मुक्ति की कल्पना नही कर सकती है। कोई भी देश अपनी 48.5 % जनसंख्या की अवहेलना कर न सैन्यशक्ति बन सकता है और न ही आर्थिक महाशक्ति। केवल पंचायतों में आरक्षण दे देने भर से कुछ नहीं होगा।

बेचारगी के भाव को छोड़ना जरूरी

स्त्री को भी चाहिए कि वो अपने बेचारगी के भाव को छोड़ें। क्योंकि महिला की बेचारगी राजनीतिक दलों के लिए सोने पे सुहागा है। जब तक उसके साथ बेचारगी का भाव रहेगा तब तक न वो खौफ से मुक्त हो सकती है और न ही अपनी आजादी को जी सकती हैं।

सुशासन जांचने का पैमाना बनाना पड़ेगा

किसी भी सरकार और सुशासन को जांचने का एक पैमाना यह भी है कि वहां महिला खौफ से कितनी मुक्त है? घर और दफ़्तर में लिए जाने वाले निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता कितनी है ?


 

चंद्रशेखर सैन, मिट्टी के जाने माने शिल्पी हैं.

 


 


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