सुशांत मामले में पटना की FIR प्रशासनिक अराजकता को न्योता- पूर्व डीजीपी

विकास नारायण राय विकास नारायण राय
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बिहार पुलिस द्वारा सुशांत सिंह मामले में बेहद तोड़-मरोड़ कर दर्ज की गयी एफ़आईआर को देश के सर्वोच्च न्यायालय ने कई दिन शीर्ष वकीलों की बहस सुनने के बाद सही कदम ठहरा दिया। जबकि मुंबई पुलिस ने अपने अधिकार-क्षेत्र में हुयी संदेहास्पद मौत की इस दुःखद घटना पर पहले ही 174 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत छानबीन (इनक्वेस्ट) शुरू कर रखी है। इसी छानबीन के आधार पर तय होना था कि मामला किस प्रकृति का है- आत्महत्या, आत्महत्या के लिए उकसावा, दुर्घटना या हत्या का? छानबीन में यदि कोई अपराध बनता मिले तो 175 (2) के अंतर्गत यह इंक्वेस्ट ही एफ़आईआर में बदल जाती।

बिहार पुलिस ने मुंबई मामले में अपनी टांग अड़ाने का जो रास्ता अपनाया है उसकी मिसाल कम ही मिलेगी। इस तरह जाँच पर जाँच बिठाने और एफ़आईआर पर एफ़आईआर दर्ज करने की राह पर अगर देश की हर पुलिस चल निकली तो शायद प्रशासनिक अराजकता और न्यायिक आपाधापी का ही युग आ जाएगा। एक पुलिसकर्मी के रूप में मैं स्तब्ध हूँ।

शायद ही कोई पुलिसवाला होगा जिसने पेशेवर जीवन में थोड़ी बहुत तोड़-मरोड़ कर एफ़आईआर दर्ज होते न देखी हो। इसके पीछे आम तौर पर जो उकसावा होता है वह मुख्यतः तीन तरह का मिलेगा- किसी दबाव में, किसी को सबक़ सिखाने के लिए, कभी पैसा। हालाँकि, अनुभव बताता है कि इस तरह की एफ़आईआर, जो प्रायः चुपचाप थानों में दर्ज कर ली जाती है, विभागीय या न्यायिक स्क्रूटनी के सामने नहीं ठहरती।

लेकिन अब प्रशांत सिंह की अप्राकृतिक मौत के मामले में तो पटना में दर्ज की गयी बिना किसी अधिकार-क्षेत्र वाली एफ़आईआर से अपराध-प्रक्रिया को पूरी तरह पटरी से उतारे जाने पर सर्वोच्च न्यायालय से मुहर लगवा ली गयी है। इसमें निहित आयामों को एक रोज़मर्रा की पुलिस कार्यवाही के उदाहरण से समझिए।

पिछले दिनों फ़रीदाबाद के सेक्टर 6 की एक रबर फ़ैक्ट्री में गैस विस्फोट में दो किशोर भाई मारे गए। उनके पिता को गैस सिलिंडरों के रखरखाव के क्रम में कुशल ठेकेदार के रूप में सेवा देने के लिए बुलाया गया था और दोनों भाई सहायक बन कर आए थे। प्रबंधन द्वारा काफ़ी समय से सिलिंडर ठीक से न रखने के कारण वे फट गए। पुलिस ने सम्बंधित के विरुद्ध लापरवाही से मृत्यु का मामला दर्ज किया और फ़ैक्ट्री स्टाफ़ की गिरफ़्तारी की। लेकिन मृतकों के घर वालों ने मीडिया के समक्ष असंतोष जताया कि फ़ैक्ट्री मालिक को उत्तरदायी नहीं ठहराया गया।

यह परिवार बिहार के समस्तीपुर का रहने वाला है। क्या इस आधार पर बिहार पुलिस को अधिकार मिल जाएगा कि वह समस्तीपुर में नयी एफ़आईआर दर्ज कर ले? बिना अधिकार क्षेत्र के? अकेले फ़रीदाबाद में प्रति वर्ष विभिन्न राज्यों के दर्जनों लोग अप्राकृतिक मौत का शिकार होते हैं और उन सब मामलों में कानूनन हरियाणा पुलिस ही वांछित कार्यवाही करती है न कि उन अन्य राज्यों की पुलिस। यही क़ानूनी प्रक्रिया है और इसी के अक्षरशः पालन से परस्पर प्रक्रियात्मक अनुशासन बना रहता है। केवल महिलाओं की घरेलू प्रताड़ना मामलों में पीड़ित को सुविधा है कि वह चाहे तो अपने गृह नगर में भी एफ़आईआर कर सकती है।

सुशांत मामले में एक पहलू यह भी है कि मुंबई पुलिस पर जान-बूझ कर अपनी छानबीन को लटकाने के आरोप लग रहे हैं। सुशांत की मौत से क़रीब एक माह पहले फ़िल्मी लोगों की एक पार्टी में दिशा सालियान की ऊपरी मंज़िल से नीचे गिरने से हुयी मौत को भी इस ढिलाई से जोड़ा जा रहा है। पर मुंबई पुलिस पर संदेह के जो भी कारण हों, उसका हल बिना अधिकार-क्षेत्र के पटना में एफ़आईआर दर्ज करना नहीं हो सकती। इसके लिए सुशांत के परिजनों क़ो मुंबई की मैजिस्ट्रेट अदालत और वहाँ के हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना चाहिए था।

सर्वोच्च न्यायालय ने तकनीकी आधार गिनाये हैं। रिया चक्रवर्ती ने पटना एफ़आईआर भी मुंबई पुलिस को देने की माँग की थी। कोर्ट ने कहा केवल केस / अपील ही ट्रांसफ़र हो सकते हैं, इंवेस्टिगेशन नहीं। यह भी कि 174 दंड प्रकिया संहिता के तहत मुंबई पुलिस की इनक्वेस्ट कार्यवाही इंवेस्टिगेशन नहीं कही जाएगी। ये तो वैसे भी सर्वविदित क़ानूनी प्रावधान हैं। मुद्दा तो यह था कि पटना में नहीं, अपराध मुंबई में हुआ था; एफ़आईआर पटना में क्यों?

कोर्ट ने दो और सर्वविदित प्रावधान पटना एफ़आईआर के समर्थन में दोहराए। संज्ञेय अपराध की सूचना दी जाए तो एफ़आईआर दर्ज करनी पड़ती है और आंशिक आरोप भी जिस थाना क्षेत्र में आते हों, वहाँ भी एफ़आईआर दर्ज हो सकती है। यानी पटना में भी क्योंकि, कोर्ट ने मान लिया, सुशांत का परिवार पटना में रहता है उसके पैसे का हिसाब-किताब पटना में होना बनेगा।

दरअसल, एक तरह से यह फ़ैसला सुशांत परिवार के लिए छूट है कि वे इनवेस्टिगेशन अपनी मनचाही पुलिस से कराएँ। कोर्ट ने न सिर्फ़ बिहार सरकार का पटना की एफ़आईआर सीबीआई को देना सही माना बल्कि आदेश में कहा, कोई भावी एफ़आईआर भी यदि मुम्बई में दर्ज हो तो वह भी सीबीआई ही जाँच करे।

सर्वोच्च न्यायालय की अंतर-निहित असीमित न्यायिक शक्तियों में (अनुच्छेद 142) यह भी शामिल है कि वह ‘संपूर्ण न्याय’ के लिए विधिशास्त्र को सिर के बल खड़ा कर दे, जैसा कि राम मंदिर विवाद में विशेष अपवादस्वरूप किया भी गया। ध्यान रहे, राम मंदिर विवाद लंबे कालखंड में पसरा एक राष्ट्रीय स्तर का अबूझ मामला बन चुका था। जबकि सुशांत प्रसंग एक व्यक्ति की संदेहास्पद मौत तक सीमित हालिया मुद्दा है। तब हाई-प्रोफ़ाइल होने के बावजूद सुशांत मामला इतना बड़ा अपवाद क्यों? चुनावी राजनीति के संदर्भ में बिहार पुलिस जैसी अराजकता भरी युक्ति का चलन प्रशासनिक रूप से आत्मघाती ही होगा।


विकास नारायण राय

अवकाश प्राप्त आईपीएस हैं. वो हरियाणा के डीजीपी और नेशनल पुलिस अकादमी हैदराबाद के निदेशक रह चुके हैं।

 


 


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