दिल्लीः प्रदर्शन कवर करने के चक्कर में हिरासत में लिए गए एक पत्रकार की आपबीती

मो. आसिफ़
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कारवां डेली में इनटर्न रिपोर्टर मोहम्मद आसिफ़ बीते शुक्रवार को दिल्ली के यूपी भवन पर हुए प्रदर्शन को कवर करने गए थे जहां पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया और दिन भर मंदिर मार्ग थाने में बैठाए रखा। आसिफ़ ने उस दिन का समूचा घटनाक्रम और आपबीती मीडियाविजिल को लिख कर भेजी है  (संपादक)


यूपी भवन पर होने वाले प्रदर्शन को कवर करने के लिए मैंने लोक कल्याण मार्ग मेट्रो स्टेशन से ऑटो लिया. तकरीबन आधा किलोमीटर पहले ही कुछ पुलिसवालों ने मेरा ऑटो रुकवा लिया. मुझे प्रदर्शनकारियों के साथ डिटेन करने लगे. मैंने उन्हें बताया कि मैं एक फ्रीलांस रिपोर्टर हूं फिर भी उन्होंने मुझे डिटेन कर लिया. मैं बस में गया तो देखा बहुत सारे प्रदर्शनकारी यूपी पुलिस मुर्दाबाद, दिल्ली पुलिस मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे. उनमें एक लड़की पुलिसवाले पर भड़क रही थी और वह बार-बार पूछ रही थी हाथ कैसे लगाया, हाथ कैसे लगाया. उसका कहना था कि मर्द पुलिसवाले महिला प्रदर्शनकारियों को छू रहे थे.

मुझे देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि किसी भी पुलिसकर्मी की वर्दी पर उसके नाम की पट्टी नहीं थी. जब मैंने उनसे पूछना चाहा कि आपके नेम टैग कहां है तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. एक महिला पुलिसकर्मी से यही सवाल मैंने दुहराया तो उसने प्रदर्शनकारियों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि उन्होंने हमारे नेम टैग उतार लिए हैं और वे गिर गए. मैंने पलट कर सवाल किया कि क्या आप सभी के नेम टैग इन्होंने उतार दिए हैं, तो वे चुप हो गए.  जब उनसे पूछा गया कि किस प्रदर्शनकारी ने आपका नेम टैग उतारा है, तो इसका भी उनके पास कोई जवाब नहीं था

रास्ते भर पूछने के बावजूद किसी भी पुलिसकर्मी या सुरक्षाकर्मी ने यह नहीं बताया कि प्रदर्शनकारियों को डिटेन कर के वे कौन से पुलिस थाने ले जाने वाले हैं.

मंदिर मार्ग थाना पहुंचकर मैंने फैसला किया के सभी प्रदर्शनकारियों से पूछा जाए कि वे किस तरीके से और क्यों प्रोटेस्ट करने के लिए आए थे और उन्हें कब और कहां से डिटेन किया गया. गांधीजी की किताब मेरे सपनों का भारत लिए हुए एक लड़का मुझे दिखाई दिया. मैंने उससे पूछा कि आप यह किताब लेकर क्यों घूम रहे हैं. उसने बताया कि जामिया की सेंट्रल लाइब्रेरी के ध्वस्त हो जाने पर उन्होंने गांधी और अंबेडकर की किताबों के लिए एक खुली लाइब्रेरी की स्थापना की है. जामिया के गेट नंबर 7 के बाहर इन पुस्तकों की बिक्री करते हैं. आज प्रदर्शन के दौरान वे कुछ किताबें लेकर आए थे.

एक छात्र विशाल का कहना था कि वह झारखंड भवन के पास अकेला खड़ा था तभी कुछ पुलिस वाले आए और उसे अपनी जिप्सी में बैठा लिए. वे उसे ग्यारह मूर्ति लेकर गए और फिर उसे एक डीटीसी बस में डाल दिया. उसे कुछ नहीं बताया गया था कि कहां ले जा रहे हैं और क्यों डिटेन कर रहे हैं.

कार्यकर्ता नबीहा ने बताया कि उन्हें यह कहकर उठा लिया कि आप पर संदेह है. नव्या ने कहा कि मैंने उनसे पूछा कि क्या आप अपने प्रधानमंत्री की बात मानकर कपड़ों से पहचान रहे हैं क्योंकि मैंने एक हिजाब पहना हुआ है?

नबीहा को भी पुलिस वालों ने चाणक्यपुरी मोड़ पर ही रोक लिया था और आँटो से उतारकर डिटेंशन के लिए विशेष अनुबंधित डीटीसी बस में बैठा दिया था.

डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने वाले निर्देशक जसविंदर चौहान और फोटोग्राफर रेहान शाहीन बाग से यूपी भवन की तरफ जा रहे थे. उनका कहना था कि पुलिस वालों ने यह सुनते ही कि वे जामिया से आ रहे हैं और यूपी भवन जा रहे हैं, उन्हें ऑटो से उतारकर अपने पास खड़ा कर लिया. चौहान का कहना है कि हमसे हमारा आईडी कार्ड माना गया मांगा गया.

उन्होंने बताया, “मैंने अपना आईडी कार्ड दिखाया तो उन्होंने मेरा आईडी और आधार कार्ड ज़ब्त कर लिया, मुझे कहा गया कि मेरा आईडी कार्ड बैकग्राउंड चेक करने के बाद लौटा दिया जाएगा. मुझे लगता है कि मैं एक हिंदू हूं इसलिए बचा हुआ हूं. अगर मेरा दोस्त अपना आईडी कार्ड देता तो उसे शायद तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाता क्योंकि वह एक मुसलमान है.”

यूपी भवन के आसपास युद्धस्तर पर पकड़ा पकड़ी हो रही थी. किसी को भी जिस पर पुलिसवालों और सुरक्षाकर्मियों का संदेह होता वे उसे डिटेंशन के लिए बस में डाल देते. उमैर, जो एक सिविल इंजीनियर हैं, बताते हैं, “मैं एक दोस्त को यूपी भवन छोड़ने आया था, अपनी गाड़ी पार्क करके अपने दोस्त को कुछ पैसे देने लगा तभी सुरक्षाकर्मियों ने डिटेंशन के लिए बस में डाल दिया.”

प्रदर्शनकारियों में शामिल कुछ ऐसी भी महिलाएं थीं जो बुर्के में शामिल हुई थीं. उनका कहना है कि वे तीन लड़कियां असम भवन पर खड़ी थीं. धारा 144 का उल्लंघन तब होता है जब 4 से अधिक लोग एक साथ खड़े हों. वे कहती हैं, “पुलिस वाले हमारे पास आए और हमसे पूछा है कि हम वहां क्यों खड़ी हैं, हमने उन्हें बताने से इंकार कर दिया तो उन्होंने हमें खींचना शुरू कर दिया.”

नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने हमसे बताया कि उनका फोन छीन लिया गया था. बहुत शोर-शराबा करने के बाद उन्हें उनका फोन लौटाया गया. इसी तरह एक प्रदर्शनकारी के हाथ में नाखूनों से जख्म हो गए थे. उनका कहना है कि उन्हें किसी भी तरह की प्राथमिक चिकित्सा प्रदान नहीं की गई. मंदिर मार्ग थाने के एसएचओ विक्रमजीत सिंह ने किसी भी तरह के कमेंट करने से इंकार कर दिया.

ठीक इसी प्रकार इसी हफ्ते की 23 तारीख को यूपी भवन पर होने वाले प्रदर्शन को नाकाम करने के लिए पुलिस और सुरक्षाकर्मियों ने प्रदर्शनकारियों को डिटेन किया और अलग-अलग थानों में भेज दिया था.


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