“कोरोना की आड़ में श्रम क़ानूनों पर डाका मंज़ूर नहीं !”

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इस कोरोना क्वारंटीन समय में भी सरकार वह सब करने से बाज़ नहीं आ रही है जिसका आरोप अरसे से उसके सर है। यानी थैलीशाहों के चारण के रूप में श्रम और श्रमिकों की लूट का आधार तैयार करने का आरोप। कोरोना के नाम पर जिस तरह से बीेजेपी की अनेक राज्य सरकारों ने श्रमिकों के अधिकारों पर खुली डकैती डाली है, उसे श्रम संघों में व्यापक असंतोष है। ऐसा लगता है कि कोई झपटमार, महामारी के अंधकार के बीच सदियों के संघर्ष से प्राप्त उपलब्धियों को उड़ा ले गया हो। लेकिन अफ़सोस, यह झपटमार नहीं सरकार है जिसने एक बार फिर साबित किया है कि लोकतंत्र दरअसल,पूजीपतियों की तानाशाही का नाम है।पढ़िये, हरियाणा के ग्रामीण बैंकों की अधिकारी एसोसियेशन के राज्य महासचिव कुमार मुकेश की प्रतिक्रिया —

 

भारत की कुछ राज्य सरकारों ने देशव्यापी लॉकडाउन के परिणामस्वरुप ठप पड़ी आर्थिक गतिविधियों में जान फूँकने के इरादे से श्रम कानूनों में व्यापक बदलावों का प्रस्ताव किया है. 

मध्यप्रदेश सरकार द्वारा 5 मई को जारी अधिसूचना के अनुसार 11 उद्योगों को मध्य प्रदेश औद्योगिक सम्बन्ध अधिनियम 1961 (एम पी आई आर) से मुक्त कर दिया गया  है. ये उद्योग हैं: टेक्सटाइल, चमडा, सीमेंट, लोहा और इस्पात, बिजली का सामान, चीनी, विद्युत्, सार्वजनिक मोटर परिवहन एवं मोटर वाहन एवं कई अन्य आभियांत्रिकी उत्पादन. 

एमपीआईआर एक्ट 1961 के मार्फत ट्रेड यूनियनों और कर्मचारियों की एसोसिएशनों को स्थानीय स्तर पर किसी उद्योग विशेष में नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच उत्पन्न किसी भी प्रकार के विवाद को सुलझाने की दिशा में मध्यस्थता करने के लिए मान्यता प्राप्त थी. अब उपरोक्त 11 उद्योगों पर उपरोक्त प्रावधान अनिश्चित काल के लिए लागू नहीं होगा. 

इसके साथ ही राज्य-सरकार ने औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के अधिकांश प्रावधानों को उन कंपनियों के लिए निरस्त कर दिया है जो अगले एक हज़ार दिनों में स्थापित होंगी.

उत्तर प्रदेश सरकार ने दो कदम और आगे जाते हुए  कुछ प्रावधानों को छोड़कर मौजूदा लगभग सभी श्रम कानूनों को निरस्त कर दिया. इस कदम को जायज ठहराने के लिए तर्क दिया जा रहा है कि ऐसा चीन छोड़ कर आने वाली कम्पनियों को आकर्षित करने के उद्देश्य से किया गया है. इसके अलावा राज्य सरकार ने काम के घंटों को 8 से बढाकर 12 कर दिया है. 

यह निर्णय राज्य सरकार द्वारा एक अध्यादेश के माध्यम से लिया गया है. औद्योगिक विवादों के समाधान सम्बन्धी किसी व्यवस्था का प्रावधान यहाँ भी नहीं है. 

गुजरात सरकार के आदेशानुसार नई स्थापित होने वाली कम्पनियों पर  न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, औद्योगिक सुरक्षा नियमों और कर्मचारियों को मुआवजा देनें सम्बन्धी कानूनों को छोड़कर अन्य श्रम क़ानून लागू नहीं होंगे 

कोविड 19 का संकट खत्म होने में अभी समय लगेगा. उद्योगों में कार्य-स्थितियां कैसी रहेंगी, यह भी भविष्य के गर्भ में है. 

कोविड 19 और प्रवासी मजदूरों के संकट के मद्देनज़र श्रमकानूनों में बदलाव की सख्त आवश्यकता थी. परन्तु ये बदलाव एकतरफा तौर पर नियोक्ताओं के हक में किये जा रहे हैं, जिसमे गरीब-मजदूर के लिए कोई संवेदना जगह नहीं है.नये निवेश को आकर्षित करने और अर्थव्यवस्था को फिर पटरी पर लाने के लिए इस प्रकार के कदम कामगारों के प्रति इन राज्य-सरकारों की गहरी असंवेदनशीलता का नमूना है. 

इन तीनों राज्य-सरकारों की नई “श्रम-नीति” का कुल सार-संकलन यह है कि,

नियोक्ता को मजदूरों को काम पर लगाने की और हटाने की पूर्ण आज़ादी. सरकार द्वारा कोई निरीक्षण नहीं और ट्रेड-यूनियनों की कोई भूमिका नहीं. 

सवाल सिर्फ तीन राज्यों का नहीं है. और यह मात्र संयोग नहीं है कि इन तीनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं.

देश-भर के तमाम मजदूर और कर्मचारी संगठनों और राजनीतिक दलों को को इन राज्यों द्वारा पारित अध्यादेशों और आदेशों का मुखर विरोध करना चाहिए.

कुछ राजनीतिक दलों ने इस विषय में राष्ट्रपति को पत्र लिखकर हस्तक्षेप करने के लिए आग्रह किया है. इस बीच कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी ने भी इस विषय में ट्वीट के माध्यम से सरकार को आगाह करते हुए अच्छी पहल की है. राहुल गाँधी ने लिखा है, “अनेक राज्यों द्वारा श्रमकानूनों में संशोधन किया जा रहा है। हम कोरोना के खिलाफ मिलकर संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन यह मानवाधिकारों को रौंदने, असुरक्षित कार्यस्थलों की अनुमति, श्रमिकों के शोषण और उनकी आवाज दबाने का बहाना नहीं हो सकता। इन मूलभूत सिद्धांतों पर कोई समझौता नहीं हो सकता।


लेखक व अनुवादक कुमार मुकेश पिछले दो दशकों से ट्रेड यूनियन गतिविधियों में भी संलग्न हैं और वर्तमान में हरियाणा के ग्रामीण बैंकों की अधिकारी एसोसियेशन के राज्य महासचिव हैं.

   


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