नोबेलधारियों ने चिदंबरम के सुझाव को सही बताया, पर क्या मानेगी सरकार?

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अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र और दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर अमर्त्य सेन, आरबीआई के पूर्व गवर्नर और शिकागो विश्वविद्यालय के बूथ स्कूल में फाइनेंस के प्रोफेसर रघुराम राजन, नोबेल पुरस्कार विजेता और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलोजी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अभिजीत बनर्जी, का साझा वक्तव्य –

भारत में जब कभी लोगों को पैसा (अथवा भोजन) हस्तांतरित करना हो तो इस बात की अत्यंत आशंका बनी रहती है कि इसका एक हिस्सा गलत हाथों में न चला जाए। करदाताओं की कीमत पर बिचौलिये न समृद्ध हो जायें।  कुछ मायनों में, यह सरकार द्वारा चलाये जा रहें होटलों और विलासितापूर्ण ‘रिवर-क्रूजों’ में कोई बुराई न देखने वाले आशावादी दृष्टिकोण से बेहतर और स्वागत योग्य सरोकार है लेकिन, महामारी और वर्तमान वैश्विक आर्थिक संकट के दौर में,  जब तालाबंद देश, उसके लोग और उन लोगों की आजीविका दांव पर हो तो इस प्रकार की चिंताएं बेमानी हो जाती हैं।   

यह तो स्पष्ट है कि लॉकडाउन कुछ और समय तक चलेगा।  इस समय की सबसे बड़ी चिंता, यह है कि कहीं स्थानीय एवं समग्र स्तर पर,  बड़ी संख्या में लोग अत्यंत गरीबी या यहां तक ​​कि भुखमरी की ओर न धकेल दिये जायें। इसके  साथ ही उनकी आजीविका के छिनने और मानक वितरण तंत्र में संभावित रुकावटों के खतरे भी मुंह बाये खड़े है। यह अपने आप में एक त्रासदी है।  ऐसी स्थिति में लॉकडाउन के आदेशों की बड़े पैमाने पर जोखिमपूर्ण अवहेलना होने का खतरा भी बन जाता है- आखिरकार  भूख से मर रहे लोगों के पास खोने के लिए होता ही क्या है। हमें लोगों को दरअसल इस रूप में आश्वस्त करने की आवश्यकता है कि समाज उनकी परवाह  करता है और साथ ही हमें ऐसे लोगों की न्यूनतम देखभाल सुनिश्चित करनी चाहिए।

हमारे पास इसके लिए संसाधन उपलब्ध हैंमार्च 2020  के आंकड़ों के मुताबिक भारतीय खाद्य निगम के पास  खाद्य पदार्थों का करीब 77 मिलियन टन भण्डार है– यह भण्डार वर्ष की किसी भी अवधि में रहने वाले भंडार से ही नहीं बल्कि “बफर स्टॉक मानदंडों” से तीन गुना से भी काफी ज्यादा है । अगले सप्ताह रबी की फसल आने के बाद इसमें और बढोतरी  की संभावना है। लॉकडाउन से कृषि बाजारों में होने वाली रुकावटों को देखते हुए, सरकार  खाद्यान को  खरीदने की दिशा में अत्यंत सक्रिय है। राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति में मौजूदा स्टॉक के एक हिस्से को वितरित कर देना एक समझदारी भरा कदम होगा और किसी भी संवेदनशील सार्वजनिक लेखा व्यवस्था को इसे महंगा सौदा नहीं करार देना चाहिए।

सच तो यह है कि सरकार ने पहले से ही इस स्टॉक का उपयोग करने की इच्छा दिखाई है – सरकार ने आगामी तीन महीनों में  5 किलो, प्रति व्यक्ति, प्रति माह के पूरक पीडीएस प्रावधान की पेशकश की है। हालांकि, काफी संभावना है कि तीन महीने की अवधि पर्याप्त नहीं होगी,  अगर लॉकडाउन जल्द समाप्त भी हो जाता है,  तब भी अर्थव्यवस्था को फिर से खोलने की प्रक्रिया में समय लगेगा। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी न किसी कारण गरीबों का एक बडा हिस्सा पीडीएस रोल से बाहर हो गया है; क्योंकि राशन कार्ड बनवाने में सबसे बड़ी बाधा और कठिनाई लाभार्थी की पहचान स्थापित करने में होती है।  और यह पूरक प्रावधान केवल उन पर लागू है जिनके पास पहले से ही राशन कार्ड है। उदाहरण के लिए, छोटे से राज्य झारखंड में ही  राशन कार्ड बनवाने के लिए 7 लाख आवेदन लंबित हैं। इस बात के भी सबूत हैं कि बहुत सारे बोनाफाइड आवेदन (जैसे कि वृद्धावस्था पेंशनभोगियों के) सत्यापन प्रक्रिया में अटक जाते हैं, आंशिक रूप से इसके लिए जिम्मेदार स्थानीय अधिकारी होते हैं जिनकी कोशिश होती कि उनसे सत्यापन में किसी तरह की कोई गलती या गड़बड़ी न हो जाए, इसलिए काफी पात्र लोग वंचित रह जाते हैं। 

इस तरह की अत्यौपचारिकता के अपने फायदे हो सकते हैं, लेकिन संकट के दौर में ऐसा नहीं होना चाहिए। सही तरीका यह होगा कि उन सभी लोगों को, जो अपना राशन कार्ड और मासिक आबंटन पाने के लिए कतार में खड़े होने के लिए तैयार हैं, उन्हें न्यूनतम जाँच के आधार पर छह महीने के लिए अस्थायी राशन कार्ड जारी किये जाएँ। ऐसे लोगों का जिन्हें इस समय इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है, का इससे वंचित रह जाना, सामाजिक रूप से ज्यादा घाटे का सौदा है बजाय इसके कि इस प्रक्रिया में कुछ लोग ऐसे भी शामिल हो जायें जिन्हें इसकी आवश्यकता नहीं है। 

इस सिद्धांत के कई महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं। सबसे पहले, सरकार को अपने पास उपलब्ध हर साधन का उपयोग, यह सुनिश्चित करने के लिए करना करना होगा कि कोई व्यक्ति भूखा न रहे। इसका अर्थ यह है कि हमें पीडीएस का विस्तार करना होगा। प्रवासियों और अन्य लोग जो घर से दूर हैं के लिए सार्वजनिक कैंटीन स्थापित की जाएँ। जो बच्चे अपने घरों में  अटके हुए हैं उनके घरों में स्कूल के भोजन के बराबर भेजा जाए; हालांकि कुछ राज्य यह काम पहले से ही कर रहे हैं।  इस दिशा में प्रतिष्ठित स्थानीय गैर सरकारी संगठनों, जिनकी पहुँच हाशिये पर पड़े लोगों तक, कई बार सरकार से भी अधिक होती है की सेवाएँ ली जानी चाहियें।

दूसरा, भुखमरी की समस्या अनेक चिंताओं में से एक है; भले ही  फिलहाल के लिए भोजन की सुरक्षा उपलब्ध हैं परन्तु आय और बचत, दोनों में ही अप्रत्याशित नुकसान के गंभीर परिणाम हो सकते हैं किसानों को अगली फसल की बिजाई के लिए बीज और उर्वरक खरीदने के लिए धन की आवश्यकता हैदुकानदारों को भी यह तय करना है कि कैसे उनकी दुकानों में पहले की ही तरह सारा सामान उपलब्ध हो; अन्य बहुत लोगों को यह  चिंता होगी कि वे अपने बकाया ऋणों को कैसे चुकाएंगे। एक समाज के रूप में, हम इन चिंताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते।

सरकार ने कुछ समूहों को नकद हस्तांतरण कर इस समस्या को आंशिक रूप से समझा भी है; लेकिन यह राशि भी कम है और लक्षित समूह भी काफी छोटा है। सिर्फ किसान ही क्यों, भूमिहीन मजदूर क्यों नहीं,  खासकर तब जब तालाबंदी के कारण मनरेगा के तहत काम ही बंद है?

शहरी गरीबों तक मदद पहुंचाने की जरूरत है। एक बार फिर, हमारी प्राथमिकता समावेशी होने की है। पी.चिदंबरम द्वारा दिए गये सुझावों पर अमल इस दिशा में पहला अच्छा कदम हो सकता है।  इन सुझावों में 2019 के मनरेगा रोल का उपयोग करने के अलावा जन आरोग्य और उज्ज्वला योजनाओं के लाभार्थी गरीब परिवारों की पहचान करने और प्रत्येक व्यक्ति के जन-धन खाते में 5000 रुपये भेजने जैसे उपाय शामिल हैं। 

लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि इनमें से कोई भी सूची परिपूर्ण नहीं है। रोहिणी पांडे, कार्तिक मुरलीधरन और अन्य लोगों के हालिया कामों से यह उजागर हुआ कि गरीबों तक पहुँचने के संदर्भ में जेएएम (जन-धन, आधार, मोबाइल) के बुनियादी ढांचे में अभी भी बहुत फासला है। कोई भी जरूरतमंद वंचित न रहे; इस प्रतिबद्धता के साथ राज्यों को धन उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि वे उन लोगों, जो अत्यधिक अभाव से पीड़ित हैं, तक पहुंचने के प्रभावी तरीके खोज कर, इसका उपयोग कर पायें ।

यदि किसी चुनौती पर अत्यंत बहादुरतापूर्ण और कल्पनाशील कार्रवाई की आवश्यकता होती  है, तो वह चुनौती आज हमारे सामने है। आने वाले महीनों में राजकोषीय संसाधनों की भारी मांग की संभावना को देखते हुए अत्यंत समझदारी से व्यय करने की आवश्यकता है, लेकिन अगर जरूरतमंदों की मदद करने में हम कंजूसी करते हैं तो निश्चित रूप से हम यह लड़ाई हार जायेंगे।


 

प्रस्तुति- कुमार मुकेश


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