अमेरिकी आयोग ने कहा भारत में धार्मिक स्वतंत्रता ख़तरे में, सरकार ने रिपोर्ट को बताया पक्षपाती

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साल 2020 की अंतरराष्ट्रीय धार्मिक आज़ादी पर अमेरिकी आयोग (USCIRF) की वार्षिक रिपोर्ट आ गयी है, जिसमें कहा गया है कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता लगातार ख़तरे में है, अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं और भारत को इस पर तुरंत ध्यान देने की ज़रूरत है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने रिपोर्ट को खारिज़ कर दिया है और अमेरिकी आयोग की इस रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण बताया है।

अमेरिकी आयोग ने धार्मिक स्वतंत्रता के लिहाज़ से सबसे चिंताजनक स्थिति से गुज़र रहे 14 देशों की सूची बनायी है, जिसे सीपीसी कहते हैं। इस सूची में भारत – बर्मा, चीन और इरीट्रिया के बाद चौथे स्थान पर है। रिपोर्ट के अनुसार सीरिया (ग्यारहवें), ईरान (पांचवें), पाकिस्तान (आठवें), सऊदी अरब (दसवें) और नाईजीरिया (छठवें) भारत से धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में बेहतर स्थिति में हैं। नार्थ कोरिया जैसा तानाशाह देश इस सूची में सातवें स्थान पर है। वहीं, भारत की तुलना में तालिबान का गढ़ रहा अफगानिस्तान भी आज बेहतर स्थिति में है।

रिपोर्ट में भारत को लेकर विशेष चिंताएं तो ज़ाहिर की गयी हैं, इसके साथ ही सत्ताधारी पार्टी बीजेपी सरकार की खासी आलोचना की गयी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मई 2019 में लोकसभा चुनाव जीतकर दोबारा सत्ता में आने के बाद से भारत सरकार ने मज़बूत बहुमत का इस्तेमाल देश में धार्मिक स्वतंत्रता, खासकर मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करने वाली नीतियां बनाने में किया है।

रिपोर्ट की कुछ ख़ास बातें हमने बिंदुवार रखी हैं:

  1. साल 2019 में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लेकर आयी, जो भारत में शरण लेकर रह रहे अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के गैर-मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता देने वाला कानून है। इसके साथ ही, राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को राष्ट्र-व्यापी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) की दिशा में पहला कदम होने की मान्यता दे दी। असम में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से एनआरसी लागू की गयी, जिससे गैरकानूनी प्रवासियों की पहचान की जा सके। इसके बाद असम में तैयार हुई नागरिकता सूची से 19 लाख मुस्लिम और हिंदू बाहर हो गये। भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने प्रवासियों को दीमक कहा। जब देखा गया कि असम की सूची से हिंदू भी बाहर हो गये हैं, तो अमित शाह और बीजेपी के पदाधिकारियों ने सीएए की ज़रूरत बतानी शुरू की और इसे हिंदुओं की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया। सीएए के साथ बीजेपी नेताओं ने राष्ट्र-व्यापी एनआरसी लाने की बात भी शुरू कर दी थी। इससे लाखों लोगों की नागरिकता पर प्रश्नचिह्न लग जायेगा, लेकिन, सीएए से बाक़ी सुरक्षित हो जायेंगे। अकेले मुस्लिमों को इसका सारा अपमान झेलना होगा और राज्यविहीन हो जाने के सारे बुरे परिणामों से भी गुज़रना होगा।
  2. सीएए कानून संसद में पास हो जाने के बाद इसके विरोध में पूरे भारत में प्रदर्शन शुरू हो गये, जिसे दिसंबर माह में उत्तर प्रदेश की पुलिस और सरकार समर्थित समूहों की हिंसा का सामना करना पड़ा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सीएए कानून के विरोधियों से बदला लेने की बात की और कहा कि इन्हें बिरयानी नहीं गोलियां खिलायी जानी चाहिए। अकेले उत्तर प्रदेश में इसी माह में प्रदर्शकारियों व विश्विद्यालयों पर हुए हमलों में 25 लोगों की जान चली गयी। कई रिपोर्ट्स में यह सामने आया कि पुलिस ने स्पष्ट तौर पर मुस्लिमों को निशाने पर लेकर कार्रवाइयां की। 
  3. इस पूरे साल सीएए के अलावा, गौहत्या, धर्म-परिवर्तन निरोधी कानून, नवंबर में बाबरी मस्जिद की भूमि को लेकर आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले आदि से संबंधित सरकार की कार्रवाइयों ने ऐसा माहौल तैयार कर दिया जिसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति हिंसा व उत्पीड़न को बढ़ावा मिला और ऐसा प्रचारित हुआ कि इसके बाद बचा भी जा सकता है। अगस्त महीने में सरकार ने मुस्लिम-बहुल राज्य जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता खत्म कर दी और वहां ऐसी पाबंदियां लागू कर दी जिससे धार्मिक स्वतंत्रता पर नकारात्मक असर पड़ा। गौहत्या या बीफ़ खाने के शक में मॉब लिंचिंग की घटनाएं जारी रहीं, ख़ासकर, भाजपा शासित राज्यों में ऐसी ज़्यादातर घटनाएं व हमले हुए। ऐसा पाया गया कि लिंच मॉब राष्ट्रवादी हिंदू पहचान से प्रेरित थे। ऐसी ही एक घटना में झारखंड में तबरेज़ अंसारी नामक मुस्लिम युवक की लिंचिंग हुई और उससे ‘जय श्री राम’ के नारे भी लगवाये गये। कई मामलों में तो हमलावरों को छोड़कर पुलिस ने पीड़ितों को ही गौहत्या या धर्म-परिवर्तन के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया। ईसाईयों पर हमले भी बढ़े और धर्म-परिवर्तन के आरोप की आड़ में लगभग 328 हिंसा की घटनाएं हुईं, चर्चों पर भी हमले हुए। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ही मॉब लिंचिंग की घटनाओं को लेकर केंद्र व राज्य सरकारों को कड़े कानून बनाने की अपील की थी, लेकिन 2019 में भी उचित कदम नहीं उठाये गये। बल्कि, गृहमंत्री अमित शाह ने लिंचिंग की घटनाओं में बढ़ोतरी की बात खारिज़ कर दी और कहा कि पहले से ही मौजूद कानून काफ़ी हैं। दूसरी तरफ़, गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो को 2019 की रिपोर्ट से लिंचिंग की घटनाओं को बाहर करने का निर्देश दे दिया।
  4. पूरे साल भेदभावपूर्ण नीतियों, सांप्रदायिक बयानों और राष्ट्र, राज्य व स्थानीय स्तर पर अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा के प्रति स्वीकार्यता ने गैर-हिंदू समुदायों के बीच डर का माहौल पैदा कर दिया। यह पूरे साल तो जारी रहा ही, साल 2020 के फरवरी महीने में भी भीड़ ने दिल्ली के मुस्लिम इलाकों में हमले किये। यह हिंसा 3 दिनों तक जारी रही। ऐसी रिपोर्ट्स भी आईं, जिसके अनुसार केंद्रीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली दिल्ली पुलिस ने हमले रोके नहीं, बल्कि हिंसा में ही सीधी भागीदारी की। इस हिंसा में तक़रीबन 50 लोगों की जान गयी।

ग़ौरतलब ये है कि ये 2004 के बाद से पहली बार हुआ है, जब USCIRF ने भारत को उन देशों की सूची में रखा है, जहां के हालात ज़्यादा चिंताजनक हैं। 2004 में इस सूची में भारत को गुजरात दंगों और उसके बाद किसी तरह के पुनर्वास से अल्पसंख्यकों को वंचित रखने की वजह से रखा गया था।

क्या सिफारिशें हैं अमेरिकी आयोग की?

आयोग ने इस रिपोर्ट के आधार पर भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति चिंताजनक बतायी है और अमेरिकी सरकार से इन मामलों में भूमिका निभाने वाली भारत की सरकारी एजेंसियों और पदाधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। ये प्रतिबंध निजी संपत्तियों को फ्रीज करने या अमेरिका में घुसने पर पाबंदी के रूप में काम करेगा। इसके अलावा, अमेरिकी दूतावास के धार्मिक समुदायों, स्थानीय अधिकारियों और पुलिस के साथ, विशेष तौर पर प्रभावित इलाकों में, मेल-जोल बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया है। सिविल सोसायटी को वित्तीय सहयोग, भारत में धार्मिक स्वतंत्रता को और भारत के प्रति अमेरिकी नीतियों को लेकर सुनवाई जारी रखी जाये, इसकी सिफारिश भी आयोग ने अमेरिकी संघीय सरकार से की है।


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