मोहन भागवत के किए-धरे का ठीकरा कुशवाहा के सिर पर क्‍यों फोड़ रहे हैं मोदी?


एक तरफ वह उपेंद्र कुशवाहा के जाने से होने वाले नुकसान को छिपाना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ टूट रहे कुशवाहा वोट बैंक को लेकर नीतीश कुमार को अधिक कारगर बताने की कोशिश कर रहे हैं


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राहुल कुमार

बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने पटना में एक राष्ट्रीय चैनल के एक कार्यक्रम के दौरान अपने पूर्व सहयोगी और रालोसपा अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा पर वोट हस्तांतरित न करने और विधानसभा चुनाव में मिली सीटों पर जीत में न कनवर्ट करने का आरोप लगाया। दरअसल, सुशील मोदी जनादेश की आधी रात की डकैती से सत्ता सुख दिलाने वाले नीतीश कुमार की उपयोगिता साबित करने की असफल कोशिश कर रहे थे। सवाल उठता है कि हाल के दिनों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी रालोसपा प्रमुख को लेकर हमलावार क्यों हो जाते हैं?

इसका आकलन करने से पहले यह जरूर समझना चाहिए कि सुशील कुमार मोदी के आरोप में कितना दम है। 2014 के आम चुनाव में रालोसपा का वोट शेयर 3 फीसदी रहा था। पार्टी तीन सीटों पर चुनाव लड़कर तीनों सीट जीतने में सफल रही। वहीं, एनडीए में शामिल लोजपा का वोट शेयर 6.40 फीसदी था और 7 सीट में से 6 पर चुनाव जीतने में सफल रही। क्या रालोसपा ही सिर्फ अपनी सीटों को जीत में कनवर्ट नहीं कर सकी? ऐसा नहीं है। हाल के दिनों में समझौते में अधिक सीट हासिल करने वाली लोजपा का हाल विधानसभा चुनाव में और भी खराब रहा था। 2015 के विधानसभा चुनाव में रालोसपा 23 सीट पर चुनाव लड़ी और महज 2 सीट जीत पाई और 2.6 फीसदी वोट हासिल कर पाई, वहीं लोजपा 40 सीट पर चुनाव लड़ी, लेकिन वह भी सिर्फ 2 सीट ही जीत पाई और वोट भी 2014 की तुलना में घटकर महज 4.6 फीसदी रह गया।

इस तरह से लोजपा का वोट करीब 1.8 फीसदी घटा तो रालोसपा के वोट में महज 20 बेसिस प्वाइंट की कमी आई। वहीं भाजपा का वोट 2014 के 29.40 फीसदी की तुलना में 24.4 फीसदी रह गया। गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव के दौरान एनडीए में तब एक दलित नेता के तौर पर उभरे पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी भी शामिल हो गए थे, लेकिन इसका भी फायदा एनडीए नहीं उठा सकी। सवाल उठता है इस खराब प्रदर्शन के लिए सुशील मोदी के अनुसार उपेंद्र कुशवाहा दोषी हैं या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का वह बयान था, जिसमें उन्होंने आरक्षण की समीक्षा करने की बात कही थी और इसका सीधा असर वोटों के अगड़े और पिछड़े के धु्रवीकरण के रूप में सामने आया था। मोहन भागवत के सामने लालू प्रसाद यादव थे, और उन्होंने पूरे चुनाव अभियान को आक्रामक मोड़ दे दिया था। इसका फायदा महागठबंधन को मिला। जाहिर है सुशील कुमार मोदी इस चूक का ठीकरा आरएसएस प्रमुख पर नहीं फोड़ सकते हैं। ऐसे में वह उपेंद्र कुशवाहा को बलि का बकरा घोषित कर एक तीर से दो निशाना साध रहे हैं। एक तरफ वह उपेंद्र कुशवाहा के जाने से होने वाले नुकसान को छिपाना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ टूट रहे कुशवाहा वोट बैंक को लेकर नीतीश कुमार को अधिक कारगर बताने की कोशिश कर रहे हैं।

उपेंद्र कुशवाहा को लेकर न सिर्फ सुशील कुमार मोदी सार्वजनिक तौर पर आक्रामक दिखने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि लंबे समय तक कुशवाहा वोट बैंक पर दावा करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी आक्रामक हैं। दरअसल, कुशवाहा वोट के प्रभाव और नीतीश कुमार की राजनीति का रिश्ता समता पार्टी के समय से ही है। जब नीतीश कुमार कुर्मी महारैली के बाद समता पार्टी बनाकर 1995 के विधानसभा चुनाव में उतरे, तब लालू प्रसाद यादव की पार्टी ने 76 यादव उम्मीदवार खड़े किए, वहीं उनके मुकाबले में नीतीश कुमार ने 73 विधानसभा सीटों पर कुर्मी, कुशवाहा और धानुक उम्मीदवार दिए। इन 73 सीटों में सिर्फ 16-18 उम्मीदवार ही कुर्मी और धानुक समाज से था, बाकी कुशवाहा समाज से था। और इसी के बदौलत नीतीश कुमार आगे बढ़े। उन्होंने बहुत ही रणनीतिक तौर पर उपेंद्र कुशवाहा को विपक्ष का नेता बनाया, लेकिन वो कभी नहीं चाहते थे कि कुशवाहा समाज का कोई नेता मजबूती से उभरे। उपेंद्र कुशवाहा से भी पार्टी के भीतर कई बार इन्हीं वजहों से टकराव होता रहा।

अब उपेंद्र कुशवाहा बिहार में एक राजनीतिक ताकत हैं। यही नहीं, कुशवाहा लगातार  सरकार को सामाजिक न्याय से जुड़े सवालों पर असहज कर रहे थे। एक तरफ वह “हल्ला बोल दरवाजा खोल” कार्यक्रम के जरिए न्यायपालिका में आरक्षण का सवाल उठा रहे थे तो दूसरी तरफ बैकलॉग और आरक्षण रोस्टर में कमियों के सवाल को भी उठा रहे थे। इस तरह वह न सिर्फ कुशवाहा बल्कि पिछड़ों के हिमायती करने वाली पार्टी बनाने की कोशिश में थे। पिछले दिनों उपेंद्र कुशवाहा को लेकर एक अन्य टीवी इंटरव्यू में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की एक टिप्पणी पर कुशवाहा समाज ने बहुत ही तीखी प्रतिक्रिया दी और इसका फायदा उपेंद्र कुशवाहा को होता दिख रहा है। इसे दो तरह से समझा जा सकता है, पहला, उपेंद्र कुशवाहा पिछले दो महीनों में मुंगेर, मुजफ्फरपुर, मोतीहारी में ‘हल्ला बोल दरवाजा खोल’ प्रमंडलीय रैली कर चुके हैं और इन तीनों रैलियों में अभुतपूर्व भीड़ का जुटना उपेंद्र कुशवाहा के प्रति बढ़ते आकर्षण के रूप में देखा जा सकता है। दूसरा, बीजेपी पहली बार कुशवाहा समाज के बड़े नेता रह चुके शकुनी चौधरी के जन्मदिवस को किसान दिवस के तौर पर मनाने को बाध्य हुई तो नीतीश कुमार भी कुशवाहा समाज के आने वाले छोटे-बड़े नेताओं की विशेष बैठक मुख्यमंत्री निवास में न सिर्फ करने को बाध्य हुए बल्कि उनको अधिक से अधिक देने का वादा भी करते दिखे।

इसका हालांकि उन्‍हें कोई फायदा नहीं होगा। समाज मन बना चुका है, गोलबंद हो रहा है और इसके साथ अन्य कृषक जातियों में भी मोहभंग हो रहा है। ये समाज समझ चुका है कि इनका भविष्य अब नीतीश कुमार और एनडीए में नहीं है।

लेखक इकनॉमिक टाइम्‍स के पूर्व पत्रकार हैं


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