‘टूलकिट’ में देशद्रोह जैसा कुछ भी नहीं-जस्टिस दीपक गुप्ता


“मैंने कई मामलों को देखा है, जहाँ लगता है कि जज भूल गए हैं कि जेल नहीं जमानत नियम है। इस स्तर पर, वे दस्तावेजों को भी नहीं पढ़ते। वे बस देखते हैं कि पुलिस उनसे क्या मांगती है। मुझे पता है कि इस स्तर पर एक विस्तृत जांच की आवश्यकता नहीं है, लेकिन कम से कम उन्हें अपना विवेक लगाना चाहिए। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नहीं पढ़ा होगा, लेकिन न्यायाधीश से अपेक्षा की जाती है कि वह कम से कम इसे पढ़ें।”


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“मैं देख रहा हूं कि हिंसा के संबंध में टूलकिट में कुछ भी नहीं है या लोगों को उकसाने के संबंध में कुछ भी नहीं है … मैं नहीं देख पा रहा कि इस दस्तावेज में क्या देशद्रोह है। कोई प्रदर्शनकारियों के साथ सहमत हो सकता है या नहीं, यह एक अलग मामला है। लेकिन यह कहना कि यह देशद्रोह है, समझ में नहीं आ रहा है।

यह  विचार सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता  के हैं। उन्होंने कहा कि 21 वर्षीय जलवायु कार्यकर्ता दिशा रवि की गिरफ्तारी का कारण बने ‘टूलकिट’  दस्तावेज में “देशद्रोह” जैसा कुछ भी नहीं देख पाये। न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता एनडीटीवी पर पत्रकार श्रीनिवासन जैन द्वारा दिशा रवि की गिरफ्तारी से संबंधित एक पैनल चर्चा में भाग ले रहे थे। उन्होंनेए कहा कि इस देश के प्रत्येक नागरिक को सरकार का विरोध करने का अधिकार है।

14 फरवरी को, बेंगलुरु की दिशा रवि को दिल्ली के एक मजिस्ट्रेट ने 5 दिन की हिरासत में भेज दिया था। रवि को बेंगलुरू से भारत के खिलाफ असहमति पैदा करने, सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने, आपराधिक षड्यंत्र आदि के साथ साथ देशद्रोह से संबंधित अपराधों के लिए, सोशल मीडिया एक “टूलकिट” बनाने और प्रसारित करने के मामले में गिरफ्तार किया गया था। वरिष्ठ वकील रेबेका एम जॉन, सिद्धार्थ लूथरा और विकास सिंह और एडवोकेट अभिनव चंद्रचूड़ के साथ मौजूद जस्टिस गुप्ता ने कहा कि दिशा रवि की गिरफ्तारी बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है और प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार है कि वो सरकार का शांतिपूर्वक विरोध करे।

न्यायमूर्ति गुप्ता ने 1962 केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य मामले का उल्लेख किया, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 124 A की संवैधानिक वैधता को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बरकरार रखा गया था, और कहा था कि राजद्रोह केवल तभी हो सकता है जब हिंसा के लिए उकसाया गया हो या सार्वजनिक अव्यवस्था हुई हो, जो तात्कालिक मामले में अनुपस्थित है। न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा, “राजद्रोह कानून को साम्राज्यवादी, उपनिवेशवादी शासक, ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा लागू गया था, जो भारत पर शासन करना चाहते थे। उस समय भी, कानून ने देशद्रोह को आजीवन कारावास के साथ दंडनीय एक गंभीर अपराध बना दिया। मैं उम्मीद कर रहा था कि जिस तरह बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी को देशद्रोह के आरोप में सलाखों के पीछे भेजा गया था, हम इस कानून को रद्द कर देंगे या कम से कम इस खंड को हल्का कर देंगे। लेकिन दुर्भाग्य से, इस कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है। असहमति पर अंकुश लगाने के लिए देशद्रोही कानून का दुरुपयोग हो रहा है।”

यह पूछे जाने पर कि क्या दिशा रवि को न्यायिक हिरासत में भेजने के दौरान न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किया गया था, न्यायमूर्ति गुप्ता ने जवाब दिया, “मैंने कई मामलों को देखा है, जहाँ लगता है कि जज भूल गए हैं कि जेल नहीं जमानत नियम है। इस स्तर पर, वे दस्तावेजों को भी नहीं पढ़ते। वे बस देखते हैं कि पुलिस उनसे क्या मांगती है। मुझे पता है कि इस स्तर पर एक विस्तृत जांच की आवश्यकता नहीं है, लेकिन कम से कम उन्हें अपना विवेक लगाना चाहिए। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नहीं पढ़ा होगा, लेकिन न्यायाधीश से अपेक्षा की जाती है कि वह कम से कम इसे पढ़ें।”

 

 

 

 


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