कंधार की जेल तोड़-क़ैदी रिहा किए, दो तिहाई अफ़गानिस्तान पर तालिबान क़ाबिज़!

मयंक सक्सेना मयंक सक्सेना
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आख़िरकार अमेरिकी साम्राज्यवादी ज़िद की बलि अफ़गानिस्तान भी चढ़ ही गया है। विशेषज्ञों की मानें तो तालिबान ने अब दो तिहाई अफ़गानिस्तान पर क़ब्ज़ा कर लिया है। जहां बुधवार तक तालिबान ने 8 सूबों की राजधानियां अपने क़ब्ज़े में ले ली थी – बुधवार को एक और बड़े और रणनीतिक रूप से अहम शहर कंधार पर भी तालिबान का क़ब्ज़ा हो गया। तालिबान ने कंधार की जेल को तोड़ दिया और वहां से कई राजनैतिक क़ैदी भी रिहा कर दिए। तालिबान ने इसका वीडियो भी रिलीज़ कर दिया – जिसमें क़ैदी सड़क पर जाते दिखाई दे रहे हैं और इसके अलावा कंधार से अफ़गान सेनाओं और सुरक्षा बलों को एक अन्य वीडियो में गाड़ियों में सवार होकर – शहर छोड़ते देखा जा सकता है।

कंधार क्यों है अहम?

कंधार तालिबान के लिए एक अहम शहर है। ये वही कंधार है, जहां भारत से अगवा किया गया आईसी814 विमान ले जाया गया था। इससे समझा जा सकता है कि पिछली सत्ता के दौरान ये तालिबान का अहम रणनीतिक-सैन्य सेंटर था। इसके अलावा इस अहम शहर में भारतीय वाणिज्यिक दूतावास भी है, जहां से हाल ही में, वहां तैनात लगभग पचास भारतीय राजनयिकों वापस देश बुलाया गया था। कंधार पर क़ब्ज़े के बाद अब तालिबान, बेहद तेज़ी से काबुल की ओर बढ़ेगा।

क्या तालिबान काबुल क़ब्ज़ा लेगा?

समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बात करते हुए, एक अमेरिकी रक्षा अधिकारी ने कहा है, “तालिबान, क़ाबुल के नज़दीक आता जा रहा है। अगले 30 दिन में वो राजधानी को हर तरफ से अकेला कर देगा और 90 दिन में वो राजधानी पर नियंत्रण कर लेगा।” लेकिन इसके आगे रक्षा मंत्रालय के अधिकारी ने जोड़ा, “लेकिन ये कोई अंतिम भविष्यवाणी नहीं है। अगर अफ़गान सेनाएं, तालिबान के ख़िलाफ़ शक्तिशाली प्रतिरोध खड़ा करें, तो परिस्थिति पलट भी सकती है।”

ज़ाहिर है कि पहले तो अमेरिका ने अपनी सेनाओं को चुपके से अफ़गानिस्तान से हटा लिया और इसी के नतीजे में तालिबान ने इस तेज़ी से अपनी बढ़त ली है। अब अमेरिका ख़ुद की ही प्रशिक्षित की अफ़गान सेना को हारते देखकर, भविष्यवाणी और नीति के उपदेश दे रहा है।

मज़ार ए शरीफ़ क्यों है अहम?

तालिबान की निगाहें अब अफ़गानिस्तान के काबुल के बाद के सबसे अहम शहर – मज़ार ए शरीफ़ पर है। मज़ार ए शरीफ़ एक अहम शहर है, जो कि न केवल वाणिज्यिक बल्कि ऐतेहासिक-सामाजिक रूप से भी महत्वपूर्ण होने के कारण अहम है। तालिबान को पता है कि मज़ार ए शरीफ़ पर क़ब्ज़ा कर के वो अफ़गान सरकार और फ़ौज का मनोबल ध्वस्त कर सकता है। ये ही वजह है कि बुधवार को अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ख़ुद मज़ार ए शरीफ़ गए, बैठकें की और अफ़गान सेना का जोश बढ़ाने की कोशिश की। इसी शहर में प्रख्यात मज़ार ए शरीफ़ मस्जिद है, जिसे एक तबका हज़रत अली की मज़ार भी मानता है। भारत ने हालात को देखते हुए, अपना यहां का दूतावास भी खाली करवा लिया है और अपने राजनयिकों को वहां से सुरक्षित निकाल लिया है।

अशरफ़ गनी को ‘क्षेत्रीय सेनापतियों’ का सहारा?

तालिबान का दबाव किस तरह से काम कर रहा है, इसको ऐसे समझा जा सकता है कि राष्ट्रपति अशरफ़ गनी ने कोई औपचारिक एलान किए बिना अफ़गान सेनाध्यक्ष को बदल दिया है। वली अहमदज़ई की जगह अब हिबतुल्लाह अलीज़ई, अफ़गान सेना के नए मुखिया हैं।

इस बीच मज़ार ए शरीफ़ में अफ़गान राष्ट्रपति ने वारलॉर्ड अब्दुल राशिद दोस्तम से मुलाक़ात की, जिसके बाद दोस्तम ने एक बयान जारी कर कहा है कि तालिबान अपनी पुरानी ग़लती दोहरा रहा है, जिसकी कीमत उसे चुकानी होगी। दोस्तम के पास अपनी पूरी एक सेना है और मज़ार ए शरीफ़ में उनका वर्चस्व माना जाता है। इसके अलावा बताया जा रहा है कि राष्ट्रपति ने इस शहर को बचाने के लिए कई और युद्ध माफ़ियाओं से भी मुलाक़ात की है।

 


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