हिमांशु कुमार पर जुर्माने को लेकर बढ़ा प्रतिवाद, सोनी सोरी और चंद्रशेखर आज़ाद ने भी जेल जाने का किया ऐलान

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न्याय माँगने गये गाँधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से लगाए गये 5 लाख रुपये जुर्माने को लेकर नागरिक समाज में प्रतिवाद बढ़ता ही जा रहा है। शुक्रवार को दिल्ली के प्रेस क्लब में तमाम मशहूर हस्तियों ने इस फ़ैसले को लेकर सुप्रीमकोर्ट की आलोचना की। छत्तीसगढ़ से आयीं आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी और आज़ाद समाज  पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद ने हिमांशु कुमार के साथ खुद जेल जाने का ऐलान किया। वहीं प्रख्यात लेखिका अरुंधति राय, मशहूर वकील प्रशांत भूषण और प्रो.नंदिनी सुंदर ने भी अदालती रवैये की कड़ी आलोचना की। हिमांशु कुमार ने कहा कि जिस मामले में उनके ख़िलाफ़ जुर्माना लगा है, उसकी जांच ही नहीं करायी गयी। अगर पुलिस का फ़ैसला ही अंतिम है तो फिर सुप्रीम कोर्ट की ज़रूरत क्या है।

प्रेस क्लब में खचाखच भरी प्रेस कान्फ्रेंस को संबोधित करते हुए सोनी सोरी ने कहा कि ऐसे फ़ैसलों को मानने का सवाल ही नहीं उठता। फाँसी चढ़ जायेंगे लेकिन आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार के विरोध में न्याय माँगने को लेकर लगाये गये जुर्माने को कभी नहीं देंगे। उन्होंने बस्तर के इलाके में सुरक्षा बलों और पुलिस द्वारा आदिवासियों पर किये जा रहे भीषण अत्याचार की तमाम कहानियाँ सुनाते हुए कहा कि इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ आदिवासी जल्दी ही सुप्रीम कोर्ट से सवाल करने दिल्ली आयेंगे। उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार दावा कर रही है कि पहली आदिवासी महिला को उसने राष्ट्रपति बनाया है, तो उनसे भी न्याय माँगने पहुँचेंगे। सोनी सोरी खुद छत्तीसगढ़ पुलिस के ज़ुल्मों का शिकार रही हैं और उन्हें लंबी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिल पाया था।

सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि इस समय सभी पार्टियाँ कारपोरेट कंपनियों की लूट का मार्ग प्रश्स्त करने के लिए काम कर रही हैं। अफसोस कि सुप्रीम कोर्ट लोकतंत्र को बचाने की अपना दायित्व पूरा नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि बीजेपी के दिवंगत नेता अरुण जेतली ने भी संसद में कहा था कि रिटायर होने के बाद मिलने वाले लाभ के लालच में रिटायर होने के पहले फ़ैसले दिये जाते हैं। उन्होंने कहा कि हिमांशु कुमार पर जुर्माना लगाना एक बेहूदा फ़ैसला है जिसका सार्वजनिक रूप से प्रतिवाद करना बेहद ज़रूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने जब सरकार के सामने घुटने टेक दिये हों तो फिर मूक दर्शक नहीं रहा जा सकता।

छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ़ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने वाली दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे कई आर्डर हैं जिसमें उसने पुलिस की गलती की तरफ ध्यान दिलाया और फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट अपने ऑर्डर में कह चुका है कि पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करती है, जांच नहीं करती है ,हत्या करती है। नंदिनी सुंदर ने कहा हिमांशु कुमार द्वारा उठाए गए गोमपाड़ वाले मामले में अगर वर्तमान जज कह रहे हैं कि पुलिस बिल्कुल सही है और हिमांशु कुमार गलत है तो इसका मतलब है कि जज कह रहे हैं कि इससे पहले के सभी जज गलत थे और सुप्रीम कोर्ट गलत था। इसका मतलब है कि न्यायालय की अवमानना वर्तमान जज के इस फैसले के द्वारा की जा रही है न कि हिमांशु कुमार के द्वारा। उन्होंने कहा कि स पुलिस को सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार छत्तीसगढ़ पुलिस पर सवाल उठाया है, अविश्वसनीय बताया है, अचानक इतनी विश्वसनीय कैसे हो गई?

इस मौके पर हिमांशु कुमार ने कहा कि आज़ादी के बाद एजेंडा था न्याय..ऐसा समाज जहाँ किसी को कोई यातना दे सकता है और कोई रोकने वाला न हो, वह राष्ट्र नहीं हो सकता। अन्याय कभी राष्ट्र का आधार नहीं हो सकता। गांधी जी ने कहा था कि प्रकृति ने सबको बराबर दिया है। इस विकास के माडल में उसी का विकास  होता है जिसमें छीनने की ताकत हो। इस समय सबसे ज्यादा अर्धसैनिक बल आदिवासी क्षेत्र में हैं। ये संसाधनों पर कब्जा करने के लिए अमीरों की तिजोरी भरने के लिए है। आदिवासी क्षेत्रों में युद्ध चल रहा है और पूंजीवाद के साथ ये युद्ध और फैलेगा। उन्होंने कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट का नहीं सत्ता से डरे हुए जजों का फैसला है। हम फ़ैसला न मानकर सुप्रीम कोर्ट की इज्जत की रक्षा करेंगे। हम आज़ादी के उन दीवानों के वारिस हैं जो हंसते-हंसते जेल गये।

इस मौके पर मशहूर लेखिका अरुंधति राय ने कहा कि जब वे बस्तर के जंगलों में गयीं थीं तो वहाँ माओवादी गुरिल्लों में 40 फ़ीसदी महिलाएँ थीं। उन्होंने सुरक्षा बलों और पुलिस के बलात्कार और अन्याय के खिलाफ हथिार उठाया था। उन्होंने कहा कि ये लड़ाई अब फैल चुकी है। किसान आंदोलन की भी मुख्य मांग है कि कारपोरेट लूट बंद हो। इसी लड़ाई के बारे में बोलने वाले सब लोग आज जेल में हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय प्रक्रिया के पालन करने को अपराध बताया जा रहे हैं। एक संस्था बताइए जिसके पास जाकर इंसाफ़ मांग सकते हैं। उन्होने कहा कि बीती सदी के साठ के दशक में बहुत से क्रांतिकारी आंदोलन हुए। ज़मीन जोतने वालों को देने की माँग हो रही थी, फिर 80 के दशक में  नर्मदा बचाओ जैसे आंदोलन हुए। यानि न्याय की जगह विस्थापन मुद्दा बन गया। इस सदी में 2009 में आते-आते मनरेगा मुद्दा बना, अब लोग मांग रहे हैं कि खाने के लिए अनाज और नमक मिल जाये। कोई राजनीतिक दल नहीं है जो इसके खिलाफ समझौताहीन संघर्ष कर रहा हो।

उन्होंने कहा कि जब तक मुसलमान मुसलमान के लिए, दलित दलित के लिए और आदिवासी आदिवासी के लिए लड़ेगा, शासक वर्ग बहुत खुश होगा। तब तक कुछ नहीं होगा। जब तक पूंजीवाद और जातिवाद के रिश्ते को नहीं समझेंगे, कुछ नहीं होगा।

आज़ाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा कि किसी डरी हुई एजेंसी के फ़ैसलों से डरने का कोई सवाल ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट हमारे टैक्स से चलता है, उसके फ़ैसलों पर नजर रखना हमारा अधिकार है। ये सरकार बोलने और लड़ने का अधिकार छीनना चाहती है, लेकिन ये देश संविधान से चलेगा मनुस्मृति से नहीं। उन्होंने कहा कि दलितों और आदिवासियों को इंसान नहीं जानवर समझा जाता है, और जानवरों को मारने में किसी को तक़लीफ़ नहीं होती। उन्होंने ऐलान किया कि अगर हिमांशु कुमार सुप्रीम कोर्ट की मानहानि में जेल जाते हैं, तो वे भी जेल जायेंगे। यह ऐलान हफ्ते भर पहले ट्विटर पर भी कर चुके हैं।

 

 


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