#RRBNTPC भाग 2 – 3 साल इंतज़ार, 8 दिन बाद परीक्षा, केंद्र 1000-3000 किमी और सपना कई प्रकाश वर्ष दूर..

धारण गौर धारण गौर
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परीक्षा केंद्र की दूरी = ज़रूरत + सपना/हालात + सामाजिक स्थिति

गणित का साधारण फॉर्मूला अगर ऐसी ही किसी परीक्षा का सवाल बनता, तो यूं कह सकते थे कि A अगर इस शहर में रहता है और उसको परीक्षा केंद्र के शहर तक पहुंचने में B घंटे लगते हैं, जबकि उसकी औसत गति C किलोमीटर प्रति घंटा है। तो उसका परीक्षा केंद्र, उसके घर से कितनी दूर है। पर जो फॉर्मूला हमने ऊपर लिखा है, वह फॉर्मूला, पढ़ने में किसी को अतिश्योक्ति लग सकता है, किसी को हास्यास्पद और हो सकता है किसी को समझ में ही न आए। लेकिन दरअसल रेलवे भर्ती बोर्ड यानी कि आरआरबी की एनटीपीसी यानी कि नॉन टेक्निकल पॉपुलर कैटेगरी की सीबीटी2 स्तर की परीक्षा में परीक्षा केंद्र तक छात्रों के पहुंच पाने का सूत्र दरअसल ऐसा ही है। उनके लिए उनका सपना कितना भी अहम हो और उनकी ज़रूरत कितनी भी बड़ी, उनके आर्थिक-मानसिक हालात और सामाजिक स्थिति अगर कमतर है…तो परीक्षा केंद्र की दूरी उनके लिए और बढ़ती ही चली जाएगी। अगर आप आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं या फिर आप महिला या जेंडर माइनॉरिटी हैं, तो आपके लिए, पहले से ही बेहद दूर परीक्षा केंद्र की दूरी, प्रकाश वर्षों में बदल सकती है। सोशल मीडिया से लेकर हर तरह से आरआरबी अभ्यर्थी कोशिश कर रहे हैं कि रेलवे उनकी बात सुने पर शायद अब आवाज़ कितनी भी ऊंची की जाए, सुनने वाले कानों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इस सीरीज़ में हमारी ये दूसरी रिपोर्ट है….

कैथल, हरियाणा के रहने वाले दीपक ने हमको सोशल मीडिया पर संपर्क किया और उन से हमने बात की। उनका एक्ज़ामिनेशन सेंटर 3000KM दूर केरल के कोट्टायम में आया है। दीपक इस वक़्त हरियाणा सरकार में क्लर्क के पद पर हैं और 2017 से ही तैयारी कर रहे हैं। दीपक खुद की स्थिति को अधिकाँश छात्रों से बेहतर मानते हैं क्यों की काम से काम उनके पास रोज़गार है, वे कहते हैं, “सेंटर इतना दूर आने से ज़्यादातर छात्र परीक्षा देने जा ही नहीं पाएंगे, आप जानते ही हैं ट्रेनों में रिजर्वेशन दो-दो महीने पहले ही पूरा हो जाता है और जर्नल डिब्बे में 3000 KM का सफ़र कैसे किया जा सकता है?”

दीपक आगे पूरा अंकगणितीय हिसाब समझाते हैं, “इस भर्ती प्रक्रिया में छह स्तरों के नौकरियां दी जानी हैं, पहली परीक्षा में मैं पाँच स्तरों के लिए पास था, 9 मई को होने जा रही परीक्षा छठे स्तर की है, यही सब से ऊंचे स्तर की नौकरी के लिए है जो स्टेशन मास्टर की है। 18 से 20 मई को एक और स्तर की परीक्षा होनी है अगर उसका सेंटर भी इतना दूर आया तो शायद मैं जा ही न पाऊं। अभी मैं सोच रहा हूँ कि इस परीक्षा के लिए तो एक महीने की तन्खाह लगा कर हवाई जहाज़ से पहुंच जाएंगे, पर बाकी परीक्षाओं का क्या ? अगर आगे भी सेंटर इतनी ही दूर आए तो आने जाने का खर्च ही एक लाख से ज़्यादा हो जाएगा?”

हमसे बातचीत में दीपक कहते हैं कि यह कोई गलती नहीं हो सकती कि इतने सारे छात्रों का सेंटर इतनी दूर दूर आया है। अगर ये कोई ग़लती होती तो इसे सुधारा जा चुका होता, या कम से कम प्रशासन इस बारे कोई सफ़ाई तो ज़रूर देता। पर देखने में तो ऐसा ही लगता है कि यह छात्रों के पहली परीक्षा के लिए किए गए आंदोलन का सरकार की ओर से जवाब है। परीक्षा सेंटर तक पहुंचना ही कठिन बना दिया गया है मानो कह रहे हों, “अगर परीक्षा दे सको तो लेलो नौकरी”। 

इस सीरीज़ की पहली रिपोर्ट यहां पढ़ें – 3 साल इंतज़ार, 12 दिन बाद परीक्षा, 1500-3000 किलोमीटर दूर परीक्षा केंद्र – Part 1

2017 से सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे रीवा मध्य्प्रदेश के RRB NTPC अभ्यर्थी शिवम (बदला हुआ नाम) से बात करते हुए लगा कि मानो उम्मीद हार कर परीक्षा लिखने जा रहे हैं। लेकिन ये नाउम्मीदी उनकी खुद से नहीं बल्कि प्रशासन से है। वे कहते हैं कि “आपके यह खबर छाप देने से भी क्या होगा? न तो इस परीक्षा की तारीख आगे बढ़ेगी न ही सेंटर बदले जाएंगे, होगा तो बस ये होगा कि हम सरकार की नज़रों में आ जाएंगे, हम लोगों को पहचान कर, निशाना बनाना सरकार के लिए बहुत आसान काम है।” शिवम फिलहाल इंदौर में रहते हैं और 2017 से कई नौकरियों की परीक्षा दे चुके हैं, 2019 और 2020 की MP PSC परीक्षा भी दी है जिसका अभी तक कोई अता-पता नहीं है। वे कहते हैं, “यह मेरे लिए कुछ नया नहीं है, परीक्षाएं तो सभी फंस रही हैं लेकिन हम परीक्षा देने के सिवा कर भी क्या सकते हैं। हाँ, सेंटर 1300 KM दूर आया है..पर जाना तो पड़ेगा। पहले घर वालों का भी दबाव था पर अब वे भी समझते हैं कि गलती मेरी नहीं सिस्टम की है।”

हमने शिवम से जब सवाल किया कि क्या उन्हें नहीं लगता कि इसमें मीडिया उनकी कुछ मदद कर सकती है? तो वे सीधे कहते हैं कि मीडिया से तो वे बहुत पहले ही उम्मीद छोड़ चुके हैं। “कोई एक टीवी न्यूज़ चैनल इस बारे बात नहीं कर रहा है। आप भी शायद इस बारे में इस ही लिए लिख पा रहे हैं क्योंकि आप उतने बड़े चैनल हैं नहीं!” शिवम के भीतर का डर और भी साफ़ दिखता है जब वे कहते हैं, “मेरी और भी परीक्षाएं अंतिम चरण में फंसी हुई हैं। मैं नहीं चाहता कि इस एक परीक्षा के चक्कर में,बाकियों से हाथ धो बैठूं…इसलिए मैं आप से ज़्यादा बात नहीं कर सकता”  

शिवम का मीडिया से न उम्मीद होना आख़िर कितना अकारण है क्योंकि जिस समय लोगों को मीडिया की ज़रूरत है, तब वह उनके साथ नहीं है। होना तो ये ही चाहिए कि आम लोगों के मुद्दे ही सबसे अहम ख़बर हों। लेकिन चाहें महंगाई हो या बेरोज़गारी या फिर बढ़ती गरीबी, 9 बजे के प्राइम टाइम को तो छोड़िए, किसी ताबड़तोड़-नॉनस्टॉप ख़बरों वाले बुलेटिन में भी इन नौजवानों का ज़िक्र तक नहीं है। ऐसे में मीडिया को नाउम्मीदी के सिवा क्या ही होना चाहिए? शिवम की दूसरी बात का एक हिस्सा ज़रूर सच है कि हम उतने बड़े संस्थान नहीं हैं, हालांकि हम ये इसलिए कर पा रहे हैं क्योंकि हम असल पत्रकारिता करना चाहते हैं। इसके बावजूद हम शिवम को इस दौर में आदर्श का ये मूल्य समझा कर भी क्या बदल पाएंगे, सो हम उनसे कुछ नहीं कहते।

आप सभी को लग सकता है कि सेंटर दूर होने से क्या ज़्यादा परेशान हो सकती है ?

ये समझने के लिए या तो आपको इन परीक्षाओं में से किसी एक में, बैठना होगा…3 साल परीक्षा देने का इंतज़ार करना होगा..इसके बाद, आपको 12 दिन पहले सेंटर की जानकारी मिलने के बाद, परीक्षा सेंटर की दूरी देखनी होगी..इससे भी अहम आपको इसके लिए सुविधासंपन्न नहीं होना होगा क्योंकि अगर आप वो हैं, तो न तो आपको ये परीक्षा देने की ज़रूरत है, न नौकरी की और न ही आपको परीक्षा सेंटर की दूरी, आवागमन, रात रेलवे स्टेशन पर सोने और होने वाले खर्चे जैसी बातों से कोई फ़र्क पड़ेगा। ज़ाहिर है कि आप कह सकते हैं कि परीक्षा देनी है, तो जाना ही होगा, लेकिन ये बात तो इन नौजवानों को भी पता है और रेलवे को भी…पता तो हमको ये भी है कि सभी मनुष्य बराबर हैं, आपस में लड़ना नहीं चाहिए, हिंसा खराब होती है और लोकतंत्र में अपनी आवाज़ रखने का सबको हक़ है, पर इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है। लेकिन फिर भी आपको समझाने के लिए एक और नौजवान की कहानी सुनते हैं..

 

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के रहने वाले दिनेश कुमार (बदला हुआ नाम) की पत्नी ऊषा (बदला हुआ नाम) RRB NTPC की CBT-2 परीक्षा देने जा रहीं है। दिनेश और उनकी पत्नी सामान्य परिवार से हैं और दिनेश राज्य सरकार में कर्मचारी हैं, जबकि उनकी पत्नी उषा प्राइवेट नौकरी करती हैं। हमारी बात दिनेश से हुई क्योकि उषा बात करने में सहज नहीं थीं, या शायद परीक्षा की अभ्यर्थी होने के कारण थोड़ा सशंकित थी। दिनेश बताते हैं, “यह सीधे तौर पर अन्याय है हमारे साथ सरकार नौकरी निकालती है, पहले तो परिणाम आने में ही इतना समय लग जाता है, इस बार सेंटर ही इतना दूर आया है की व्यक्ति जाने में दस बार सोचे। पैसा लगा कर वह परीक्षा देने जाए जिसमें पहले से ही देरी हो रही है, या पैसा बचा लिया जाए कहीं और इस्तेमाल करने के लिए।” आपको बता दें कि ऊषा का परीक्षा केंद्र आंध्र प्रदेश का राजमुंदरी है…दूरी है 12,50 किलोमीटर…

कोलकाता के ही रहने वाले शारिक़ (बदला हुआ नाम) का परीक्षा केंद्र, कर्नाटर के उडुपी में है। शारिक़ ट्वीट करते हैं कि उन्होंने आरआरबी सिकंदराबाद के लिए आवेदन दिया था लेकिन उनको कर्नाटक के उडुपी में परीक्षा केंद्र दिया गया है। उनके परीक्षा केंद्र की दूरी है, 2,114 किलोमीटर.. जब पहले ही रेलें कम चल रही हैं और इतने कम समय में आरक्षण भी नहीं मिल सकता है, तो वे देश के एक कोने से दूसरे कोने में परीक्षा देने आख़िर कैसे जा सकते हैं? वे साथ में गूगल मैप का स्क्रीनशॉट ट्वीट करते हैं, जो सब साफ कर देता है।

 

ऐसा भी नहीं है कि अपनी परेशानी को उठा रहे अभ्यर्थियों की संख्या कम है। बड़ी संख्या में ये सोशल मीडिया पर अपनी बात को अलग-अलग हैशटैग्स के साथ उठा रहे हैं। लेकिन कई छात्रों ने हमसे कहा कि आपसे अलावा हमसे किसी ने संपर्क नहीं किया, न ही सोशल मीडिया के बड़े इन्फ्लुएंसर इनके साथ आए…ऐसे में किसे ही फ़र्क पड़ता है? एक नौजवान ने हमसे कहा, “सोशल मीडिया भी तब ही प्रभावी है, जब कोई प्रभावी शख़्स या इन्फ्लुएंसर हमारी बात को रखे, रीट्वीटर करे..वरना कोई असर नहीं होता।” इन नौजवानों के साथ कोई नहीं है, 27 अप्रैल को सभी छात्रों के पास सेंटरों की जानकारी आई थी, तभी से सैकड़ों छात्र हज़ारों ट्वीट कर चुके हैं पर न तो सरकार को न ही टीवी की कथित मीडिया को इनके होने से कोई फर्क पड़ता है। हाँ फ़र्क तब पड़ता है जब वे हाथ में कागज़ का टुकड़ा लिए ऊँगली पर सरकारी स्याही लगवाए किसी पोस्टर बैनर के बगल खड़े रहते हैं और तब भी नतीजे आने के बाद इन्हे कुछ नहीं मिलता।

 

ये स्टोरी मीडिया विजिल के लिए धारण गौड़ के साथ मयंक ने की है। इस परीक्षा के लिए परीक्षा केंद्र की दूरी से जूझ रहे नौजवानों के ईमेल और संदेश लगातार हमारे पास आ रहे हैं, इसलिए ये रिपोर्ट अभी जारी है। इंतज़ार करिए, इसके भाग 3 का…