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हिंदू-मुस्लिम, चुनावी घंट-घड़ियाल में फँसे रहिए, मुकेश अंबानी पी गए एम.पी.की गैस !

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गिरीश मालवीय


मुकेश अम्बानी की मोदी राज में बढ़ती दौलत के राज अब खुलने लगे हैं, ये किस्सा बहुत दिलचस्प है क्योंकि सिर्फ इसी मामले में नही इस जैसे लगभग हर मामले में नियम शर्तों को तोड़ मरोड़ के ये उद्योगपति देश के संसाधनों की लूट मचाए रखते हैं और देश की जनता हिन्दू मुसलमान जैसे मुद्दों में उलझा दी जाती है ताकि यह खबरे आप तक पुहंच न पाए

मामला यह है कि येन केन प्रकारेण रिलायंस ने ठेका हासिल कर पिछले साल से मध्य प्रदेश की खान में सीबीएम यानी कोल बेड मिथेन का कॉमर्शियल उत्पादन शुरू किया

सीबीएम कोल बेड मीथेन कोयला भंडारों के साथ एसोसिएटेड होता है यह कोयला संस्तरों के बीच में दबा रहता है और कोयला खनन के दौरान निकलता है

सरकार ने जल्दी-जल्दी में तीन बार इसकी नीलामी की पहली दो नीलामी थोड़े समय के लिए थी लेकिन सितंबर 2017 में हुई तीसरी नीलामी मार्च 2021 तक उत्पादित होने वाले पूरे गैस के लिए थी

लेकिन रिलायंस ने अनुबंध की शर्ताें और सरकारी नीतियों का उल्लंघन कर पूरे उत्पादन को खुद की कंपनी को ही बेच दिया, जबकि कांट्रैक्ट में गैस उत्पादक और गैस खरीदने वाले के बीच किसी तरह का संबंध नहीं होने की शर्त का साफ साफ उल्लेख किया गया था

गैस खनन मामले की उच्च नियामक ईकाई हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय (डीजीएच) ने पिछले साल इन नीलामियों में त्रुटी पाई थी और इंगित किया था कि रिलायंस ने अन्य नीलामी लगाने वालों के साथ प्रक्रिया में भाग लेने के दौरान सीबीएम की नीतियों का पालन नहीं किया था। इसमें बिक्री के दौरान हितों के टकराव की शर्तों के बारे में प्रावधान किया गया था, डीजीएच की रिपोर्ट के बाद पेट्रोलियम मिनिस्ट्री ने इस मामले की जांच की। इसमें अधिकारियों ने पॉलिसी की शर्तों पर महीनों तक बहस की। कानून मंत्रालय की राय मांगी गई और रिलायंस इंडस्ट्रीज का पक्ष भी सुना गया

यह साबित करने में एक साल लग गया कि रिलायंस द्वारा सीबीएम की बिक्री खुद को करना, नीतियों का उल्लंघन है। साथ ही प्रोडक्शन शेयरिंग कांट्रैक्ट टर्म का भी उल्लंघन है।

अब एक बात बताइये, जब गैस निकालने वाली कम्पनी भी खुद की है और उसे खरीदने वाली भी स्वयं की है तो क्या कोई समझदार व्यापारी बताएगा कि उसने कितनी गैस का उत्पादन किया है ….यह होता हैं घोटाला जो सरकार की नाक के नीचे होता रहता है लेकिन उसके मानो पर जू तक नही रेंगती, ऐसे ही थोड़ी ये पूंजीपति पार्टियों को मोटा चन्दा देते हैं और ऐसे ही थोड़ी आलीशान दफ्तर बन जाया करते हैं।

लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।



 

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