बैरीकेड और लाठीचार्ज के बीच सड़क जगाते हाथरस पहुँचे राहुल और प्रियंका!

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सड़कें सुनसान हो गई तो, संसद आवारा हो जाएगी

 

 पिछले 6 सालों में यह सवाल लगातार दोहराया गया है किआख़िर राहुल गांधी है कहाँ ?” और शायद पिछले कुछ दिनों की राजनैतिक सरगर्मियों ने राहुल गांधी कहाँ हैउसका जवाब थोड़ा सा तो दिया है। इसी मुस्तैदी, जोश और प्रतिरोध के साथ आज दिन में, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी आखिरकार हाथरस जाकर, पीड़िता के परिवार से मिले।  लेकिन इसके पहले हाई वोल्टेज राजनैतिक सीन भी देखने को मिला। कांग्रेस कार्यकर्ताओं के हुजूम के साथ निकला ये काफ़िला मोर्चा हाथरस की पीड़िता के परिवार से मिलने जा रहा था। उत्तर प्रदेश पुलिस ने दिल्ली- नॉएडा डाइरेक्ट हाइवे (DND) को पूरी तरह से ब्लॉक कर दिया है, जहां हज़ारों कांग्रेस कार्यकर्ता इकट्ठे हो गए थे। अंततः सिर्फ 5 लोगों को हाथरस जाने की अनुमति मिली और राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, के.सी. वेणुगोपाल, अधीर रंजन चौधरी और रणजीत सिंह सुरजेवाला हाथरस के लिए रवाना हुए।

इसके पहले 1 अक्टूबर को हमने देखा कि कैसे राहुलप्रियंका को हाथरस नहीं जाने दिया गया, 2 अक्टूबर को तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरिक ओ ब्रायन की भी पुलिस प्रशासन से झड़प हुई। इसके बाद देर शाम, प्रियंका गांधी का पीड़िता के परिवार से मिलने का एक भावुक वीडियो सामने आया है।

इस भावुक मुलाकात के बाद प्रियंका गांधी का ट्वीट आया, जिसमें उन्होंने फिर योगी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि-

“हाथरस के पीड़ित परिवार के प्रश्न:

  1. सुप्रीम कोर्ट के जरिए पूरे मामले की न्यायिक जाँच हो
  2. हाथरस DM को सस्पेंड किया जाए और किसी बड़े पद पर नहीं लगाया जाए
  3. हमारी बेटी के शव को बगैर हमसे पूछे पेट्रोल से क्यों जलाया गया?
  4. हमें बार-बार गुमराह किया, धमकाया क्यों जा रहा है?
  5. हम इंसानियत के नाते चिता से फूल चुनकर लाए मगर हमें कैसे माने कि यह शव हमारी बेटी का है भी या नहीं?

इन प्रश्नों के उत्तर पाना इस परिवार का हक है और उप्र सरकार को ये जवाब देना पड़ेगा”।

इस दौरान प्रियंका का एक अलग ही तेवर नज़र आया। एक कार्यकर्ता पर पुलिस की लाठी चल रही थी तो वे खुद उसके बचाव में आगे आयीं और पुलिस का डंडा अपने हाथ से रोका।

तो सड़कों के आंदोलन संसद और न्याय प्रणाली की प्रक्रिया विकल्प नहीं है, पर हाँ संसद, न्याय, प्रशासन की कार्यविधि की जवाबदेही जनता के बीच सड़कों पर निश्चित तौर से तय होती है। ऐसे में ये देखना सुखद तो है ही कि विपक्ष सड़क पर उतर कर, ठहरे हुए लोकतंत्र को थोड़ा सा गति दे रहा है। अब जनता को भी तय करना होगा की आपकी सड़कें और संसद, बिना असहमति के कितनी लोकतांत्रिक रह सकती हैं।

 



 


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