‘योद्धा-कवि’ व्योमेश शुक्ल ने नागरीप्रचारिणी सभा पर परिवार का वर्चस्व तोड़ा, होंगे चुनाव!


नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना क्वींस कॉलेज, वाराणसी की नवीं कक्षा के तीन छात्रों – बाबू श्यामसुंदरदास, पं. रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह ने इसी कॉलेज के छात्रावास के बरामदे में बैठकर की. बाद में इसकी स्थापना की तिथि इन्हीं महानुभावों ने 16 जुलाई 1893 निर्धारित की और आधुनिक हिंदी के जनक भारतेंदु हरिश्चन्द्र के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास इसके पहले अध्यक्ष हुए. काशी के सप्तसागर मुहल्ले में घुड़साल में इसकी बैठकें होती थीं और बाद में इस संस्था का स्वतंत्र भवन बना. पहले ही साल जो लोग इसके सदस्य बने, उनमें महामहोपाध्याय पं सुधाकर द्विवेदी, इब्राहिम जार्ज ग्रियर्सन, अम्बिकादास व्यास, चौधरी प्रेमघन जैसे भारत-ख्याति के विद्वान थे.


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अंतर्राष्ट्रीय महत्व की हिंदीसेवी संस्था नागरीप्रचारिणी सभा में पिछले पंद्रह वर्षों से चल रहे कानूनी विवाद का पटाक्षेप हो गया है. जानेमाने कवि-आलोचक-संस्कृतिकर्मी व्योमेश शुक्ल की लिखित आपत्ति को स्वीकार करते हुए वाराणसी के उपज़िलाधिकारी : सदर प्रमोद कुमार पांडेय ने 23 पृष्ठों के आदेश में संस्था में काबिज़ पद्माकर पांडेय और शोभनाथ यादव की कमेटी को ग़ैरकानूनी मानते हुए सहायक निबंधक : सोसाइटीज़ को 2004 की साधारण सभा के सदस्यों की सूची के आधार पर ज़िला प्रशासन की देखरेख में नये चुनाव कराने के आदेश दिये हैं.

बीते पचास वर्षों से एक परिवार हिंदी की इस 128 साल पुरानी महान संस्था पर क़ब्ज़ा जमाये बैठा था. इस निर्णय के बाद संस्था को उस शिकंजे से मुक्ति मिल गयी है. इस बीच संस्था में बौद्धिक संपदा और ज़मीन-जायदाद के घपले से जुड़ी ख़बरें समय-समय पर प्रकाश में आती रही हैं. इलाहाबाद उच्च न्यायालय की भी इस संस्था पर नज़र बनी रही है और इसने यहाँ हुए चुनावों की जाँच का आदेश स्थानीय न्यायालय को दे रखा था. उसी सिलसिले में आये इस निर्णय के बाद देश-भर के शोधार्थियों और लेखकों को उम्मीद बंध गयी है कि अब संस्था को उसका खोया हुआ गौरव वापस मिल जायेगा.

 

नागरीप्रचारिणी सभा की मुश्किलें :

हिन्दी भाषा और नागरी लिपि के निर्माण और प्रसार में अनिवार्य भूमिका निभाने वाली 128 वर्ष पुरानी संस्था नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी की हालत चिंताजनक थी. इस संस्था लंबे समय से एक परिवार ग़ैरकानूनी तरीक़े से क़ाबिज़ था. ये लोग निजी लाभ के लिए मनमानेपन से संस्था की मूल्यवान चल-अचल संपत्ति का दुरुपयोग कर रहे थे. यों, ‘सभा’ की वाराणसी, नई दिल्ली और हरिद्वार स्थित अप्रतिम भौतिक और बौद्धिक संपदा और इसकी स्थापना के संकल्प ख़तरे में थे.

नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी-परिसर के पूर्वी हिस्से में स्थित प्रकाशन-कार्यों के लिए बनाया गया ऐतिहासिक भवन एक दवा व्यापारी को ‘लीज़ डीड’ के ज़रिये दस साल के लिए दे दिया है. ग़ौरतलब है कि उस भवन का उद्घाटन भारत के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने किया था. उनके नाम का शिलापट्ट भवन के बाहर से हट गया है.

नागरीप्रचारिणी सभा की अतिथिशाला में कुछ लोगों का कब्ज़ा है. उस अतिथिशाला के कमरे शोधार्थियों और साहित्यसेवियों के लिए – दरअसल किसी के भी लिए – उपलब्ध नहीं हैं. उसका कोई दाख़िला रजिस्टर, बिल-बुक और ऑफिस आदि कुछ नहीं है.

यही हाल नयी दिल्ली-स्थित अतिथिशाला का भी है – वह भूखंड भी भारत सरकार ने ‘सभा’ को दिया है, लेकिन उसका व्यावसायिक इस्तेमाल हो रहा है. पूरी बिल्डिंग ही किराये पर उठा दी गयी है. ख़ास बात यह है कि सभा की नयी दिल्ली शाखा की बैलेन्स शीट, बैंक ऑपरेशन और आयव्यय से जुड़ा कोई काग़ज़ सहायक निबंधक कार्यालय, वाराणसी में जमा नहीं है.

अनियमितताएँ अनेक हैं. संस्था की भू-संपदा को ग़ैरकानूनी तरीक़े से बेच देने या बहुत लंबी अवधि के लिए किराये पर उठा देने के षड्यंत्र के साथ-साथ ‘सभा’ की बौद्धिक संपदा को भी विदेश-स्थित व्यक्तियों और संस्थाओं को चोरीछिपे बेच देने की कोशिशें चल रही हैं. हिंदी भाषा, नागरी लिपि और भारतीय साहित्य की अनमोल संपदा – लगभग 80 वर्ष पहले नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा संकलित, संपादित और प्रकाशित ग्रंथ – ‘हिंदी शब्दसागर’ इसी अंधिकृत सोसाइटी ने अपनी जनरल काउंसिल (साधारण सभा) की अनुमति के बग़ैर शिकागो विश्वविद्यालय के एक विभाग को महज़ 21 लाख रुपये में बेच दिया है.

नागरीप्रचारिणी सभा के ऐतिहासिक मुद्रण और प्रकाशन विभाग अरसे से बंद हैं. अगर सभा द्वारा प्रकाशित सभी किताबें आज भी उपलब्ध हो जाएँ तो हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों और शोधार्थियों समेत वृहत्तर हिंदी संसार न सिर्फ़ लाभान्वित होगा, बल्कि उनकी बिक्री से होने वाली आय से ‘सभा’ का ‘इकोसिस्टम’ भी सुधर जा सकता है. वे किताबें आज अनुपलब्ध हैं और दूसरे प्रकाशक मौक़े का लाभ उठाकर, कॉपीराइट कानूनों का उल्लंघन करते हुए उन्हें चोरीछिपे छाप भी रहे हैं.

सभा का मुख्यभवन – जिसमें हिंदी का सबसे पुराना ‘आर्यभाषा पुस्तकालय’ है – सवा सौ साल पुरानी एक हेरिटेज इमारत है – जिसे तत्काल सघन देखरेख और सरंक्षण की ज़रूरत है, जबकि रखरखाव के अभाव में वह जीर्णशीर्ण होकर गिरने की कगार पर है. भूतल पर उसका एक हिस्सा ढह भी गया है.

सन 2000 के आसपास तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 94 लाख रुपये की एक परियोजना में नोएडा-स्थित एक कंपनी सी-डैक के माध्यम से नागरीप्रचारिणी सभा में मौजूद सभी दुर्लभ पाण्डुलिपियों, हस्तलेखों और पोथियों का डिजिटाईजेशन करवाया था; लेकिन उस डिजिटाइजेशन की सीडी या सॉफ्ट कॉपी कहीं – किसी के भी लिए – उपलब्ध नहीं है.

पांडुलिपियाँ और हस्तलेख न जाने किस हाल में हैं ? पता नहीं कुछ बचा भी है या नहीं. वे पाठकों और शोधार्थियों आदि के लिए उपलब्ध नहीं हैं.

 

नागरीप्रचारिणी सभा की ख़ास बातें :

हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि के निर्माण और प्रसार में केन्द्रीय भूमिका निभाने वाली 127 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक महत्व की संस्था नागरीप्रचारिणी सभा के हालात इन दिनों चिंताजनक हैं. इस संस्था का प्रधान कार्यालय वाराणसी में है और इसकी शाखाएँ नयी दिल्ली और हरिद्वार में; लेकिन वहाँ भी भाषा, साहित्य, संस्कृति, शोध और अनुसंधान के काम नहीं हो रहे हैं.

नागरीप्रचारिणी सभा का योगदान बहुत बड़ा है. 1893 में स्थापित इस संस्था ने पचास सालों तक हस्तलिखित हिंदी ग्रंथों की खोज का देशव्यापी अभियान चलाया. इन ग्रंथों के विधिवत पाठ-संपादन से तुलसी, सूर, कबीर, जायसी, रहीम और रसखान जैसे कवियों की प्रामाणिक रचनावालियाँ प्रकाशित हुईं और शिक्षित भारतीय समाज उनसे परिचित हुआ.

इसी सभा ने अपने-अपने क्षेत्र के दिग्गज विद्वानों की लगभग लगभग पचीस वर्षों की साझा मेहनत के फलस्वरूप ‘हिंदी शब्दसागर’ नामक हिंदी का पहला, सबसे बड़ा, समावेशी और प्रामाणिक शब्दकोष तैयार किया. भारत की संविधान सभा और बाद में गठित अनेक आयोगों ने नियमों, कानूनों और संवैधानिक पदों के हिंदी प्रतिशब्द तैयार करने के लिए इसी शब्दसागर की मदद ली है. इस शब्दसागर की अहमियत का अंदाज़ा इस बात से भी लग जाता है कि इसकी भूमिका के तौर पर प्रकाशित आचार्य रामचंद्र शुक्ल-लिखित ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ शीर्षक निबंध को पिछले एक हज़ार वर्षों के साहित्य के इतिहास की सबसे विश्वसनीय और प्रामाणिक आलोचना-पुस्तक के तौर पर आज तक पढ़ा जाता है.

आज़ादी के पहले अदालतों में हिंदी को कामकाज की भाषा बनाने के लिए इस संस्था ने एक अखिलभारतीय आंदोलन चलाकर पाँच लाख हस्ताक्षरों का एक ज्ञापन संयुक्त प्रांत के तत्कालीन गवर्नर को सौंपा था. उसी समय हिंदी में सरकारी और अदालती कामकाज की सुविधा के लिए सभा ने एक ‘कचहरी हिंदी कोश’ भी प्रकाशित किया.

नागरीप्रचारिणी सभा के वाराणसी परिसर-स्थित आर्यभाषा पुस्तकालय की दुनिया-भर के अकादमिकों और बौद्धिकों के बीच बहुत इज़्ज़त है. दरअसल वह भाषा और साहित्य का एक अनूठा संग्रहालय है. हस्तलेखों का इतना बड़ा संग्रह कहीं और नहीं है. वहीं; अनुपलब्ध और दुर्लभ ग्रंथों का ऐसा संकलन भी कहीं और मिलना मुश्किल है. आधी सदी पहले तक हिंदी के जानेमाने विद्वान अपने निजी पुस्तक-संग्रह इस पुस्तकालय को प्रदान करते रहे थे. वह इमारत – जिसमें आर्यभाषा पुस्तकालय संचालित है – सवा सौ बरस पुरानी एक हेरिटेज इमारत है.

नागरीप्रचारिणी सभा के प्रकाशनों का इतिहास गौरवशाली रहा है. ‘हिंदी शब्दसागर’ के 12 खंडों के अलावा इस संस्था ने इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका की तर्ज पर 12 खंडों का ‘हिंदी विश्वकोश’, 16 खंडों का ‘हिंदी साहित्य का वृहत इतिहास’ और 500 से ज़्यादा ग्रंथ प्रकाशित किये. एक समय तक यहाँ से प्रकाशित रिसर्च जर्नल ‘नागरीप्रचारिणी पत्रिका’ का भी बड़ा मान रहा है.

नागरीप्रचारिणी सभा ने ही आज से सौ साल पहले एम. ए. की कक्षाओं के लिए हिंदी का पहला पाठ्यक्रम बनाया था. लेकिन इनदिनों सभा की हालत बहुत ख़राब है. वहाँ शोध, अनुसंधान, संपादन और प्रकाशन का काम पूरी तौर पर बंद है. दुर्लभ हस्तलेख, पांडुलिपियों और पुस्तकों का हाल भी ख़राब है, जिनके तत्काल संरक्षण की ज़रूरत है. दरअसल पुस्तकालय की इमारत और वहाँ उपलब्ध बौद्धिक संपदा – दोनों को तत्काल बचाये जाने की ज़रूरत है. भारत सरकार के अनुदान से बनी संस्था की अतिथिशाला के साथ-साथ नयी दिल्ली और हरिद्वार-स्थित संपत्तियों की देखरेख भी नहीं हो रही है. ‘सभा’ की बौद्धिक संपदा भी ख़तरे में है. हिंदी भाषा, नागरी लिपि और भारतीय साहित्य की अनमोल संपदा – जिसका ज़िक्र ऊपर भी आया है – लगभग 100 वर्ष पहले इस संस्था द्वारा संकलित, संपादित और प्रकाशित ग्रंथ – ‘हिंदी शब्दसागर’ इन दिनों शिकागो विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर नज़र आ रहा है.

 

नागरीप्रचारिणी सभा का परिचय

नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना क्वींस कॉलेज, वाराणसी की नवीं कक्षा के तीन छात्रों – बाबू श्यामसुंदरदास, पं. रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह ने इसी कॉलेज के छात्रावास के बरामदे में बैठकर की. बाद में इसकी स्थापना की तिथि इन्हीं महानुभावों ने 16 जुलाई 1893 निर्धारित की और आधुनिक हिंदी के जनक भारतेंदु हरिश्चन्द्र के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास इसके पहले अध्यक्ष हुए. काशी के सप्तसागर मुहल्ले में घुड़साल में इसकी बैठकें होती थीं और बाद में इस संस्था का स्वतंत्र भवन बना. पहले ही साल जो लोग इसके सदस्य बने, उनमें महामहोपाध्याय पं सुधाकर द्विवेदी, इब्राहिम जार्ज ग्रियर्सन, अम्बिकादास व्यास, चौधरी प्रेमघन जैसे भारत-ख्याति के विद्वान थे.

जब इस संस्था की स्थापना की गई तो इसका उद्देश्य हिंदी और देवनागरी लिपि का राष्ट्रव्यापी प्रचार एवं प्रसार था, उस समय न्यायालयों में या अन्यत्र सरकारी कामों में हिंदी का प्रयोग नहीं हो सकता था और हिंदी की शिक्षा की व्यवस्था वैकल्पिक रूप से मिडिल पाठशालाओं तक ही सीमित थी. हिंदी में आकर ग्रंथों का पूर्ण रूप से अभाव था. प्रेमसागर, बिहारी सतसई, तुलसीकृत रामायण और मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत जैसे ग्रंथ ही आकर-ग्रन्थ माने जाते थे, जो जहाँ-तहाँ मिडिल में वैकल्पिक रूप से पढ़ाये जाते थे. भारतेंदु और उनकी मित्रमंडली का साहित्य केवल साहित्यकारों के अध्ययन और चिंतन तक सीमित था.

नागरी प्रचारिणी सभा ने अपनी स्थापना के बाद 7वें वर्ष में, अर्थात सन् 1900 तक निम्नलिखित महत्वपूर्ण कार्य पूरे कर लिये :

(क)  सरकार से हिंदी प्रदेशों के 60,000 विशिष्ट नागरिकों ने देवनागरी लिपि में हिंदी के प्रयोग की अनुमति सरकार तथा न्यायालयों में पं. मदनमोहन मालवीय और बाबू श्यामसुंदरदास के नेतृत्व में माँगी जिनमें हिंदी प्रदेश के राजा-महाराजाओं और विद्वानों का सहयोग था. यह आन्दोलन ख़ूब चला. सरकार को नागरी लिपि की वैज्ञानिकता के संबंध में मैमोरण्डम प्रस्तुत किया गया जो देवनागरी लिपि को संसार की सबसे अधिक वैज्ञानिक लिपि सिद्ध करने वाला पहला विस्तृत प्रामाणिक और सर्वमान्य दस्तावेज़ है. इस आंदोलन में सभा के अनेक कार्यकर्ता गिरफ्तार किये गये और यह माना जाता है कि यह हिंदी के लिए पहला सत्याग्रह था. सभा इस अनुष्ठान में सफल रही.

(ख) बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी को अंग्रेज़ सरकार ने यह अधिकार दिया था कि संस्कृत के हस्तलिखित ग्रंथों की वह देश में खोज करें और उसकी विवरणात्मक सूची बनायें. सभा ने सरकार से यह अनुरोध किया कि इस खोज में जो हिंदी की पुस्तकें मिलें उनकी सूची मात्र एशियाटिक सोसाइटी प्रकाशित करे. इस सोसाइटी ने यह कार्य बेमन से साल-दो-साल किया. फिर हिंदी के लिए यह कार्य सभा को इस शर्त पर सौंपा गया कि इसका विवरण सभा प्रकाशित कर सकती है किन्तु वह अंग्रेज़ी में होगा तथा सरकार की ओर से छपेगा. सभा ने इसे स्वीकार कर लिया और हिंदी हस्तलेखों की खोज के इस काम का शुभारंभ किया. गाँव-गाँव, नगर-नगर उसके कार्यकर्ताओं ने मिले हस्तलेखों का विवरण त्रैवार्षिक रूप में प्रकाशित करना आरंभ किया जिनमें लाखों हस्तलेखों का विवरण ‘सभा’ प्रकाशित कर चुकी है. ये खोजें बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि में की गईं. ये खोजें और विवरण हिंदी की अनन्य संपत्तियाँ हैं, जिनके बिना अनुसंधान का काम असंभव है. इसी प्रसंग में संस्था ने हिंदी हस्तलेखों का इतना विशाल संग्रह सभा के पुस्तकालय में कर लिया जितना एक स्थान पर संसार में कहीं नहीं है; जिसमें 25,000 हस्तलेख संस्कृत के भी हैं, जिसके अध्ययन-अध्यापन के लिए विश्व-भर से शोधछात्र और विद्वान सभा में आते हैं.

एशियाटिक सोसाइटी ने भारतीय भाषाओं में सबसे विशाल काव्यग्रंथ चंदबरदाई की कृति पृथ्वीराज रासो का प्रकाशन आरंभ किया, जो किसी पुराण से भी बड़ा काव्यग्रंथ है, पर विवाद के कारण इसके कुछ खंडों का प्रकाशन कर एशियाटिक सोसाइटी मौन हो गई. इस काम को सभा ने अपने ऊपर उठाया और सन 1904 से  के बीच इस 3000 पृष्ठों के ग्रंथ को उसने प्रकाशित किया.

20वीं सदी के आरंभ के बाद सभा की मान्यता और उसके कृतित्व को सारे राष्ट्र में सम्मानित किया जाने लगा और भारत की महान विभूतियों का सहयोग और सान्निध्य इसे प्राप्त होने लगा. इनमें सभी वर्गों के लोग थे. स्वतंत्रता से पूर्व के उसके कुछ महत्वपूर्ण कार्य इस प्रकार हैं :

सन् 1905 में, काशी में कांग्रेस अधिवेशन के अवसर पर एक भाषा सम्मेलन हुआ, जिसकी अध्यक्षता सर रमेशचन्द्र दत्त ने की और उसमें नागरीप्रचारिणी सभा के प्रांगण में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने यह घोषणा की कि हिंदी ही भारत की भाषा हो सकती है और देवनागरी लिपि वैकल्पिक रूप से भारत की सभी भाषाओं के लिए प्रयुक्त की जानी चाहिए और यह कार्य सभा को करना चाहिए. तब से सभा निरन्तर प्रगति के नये आयाम इस दिशा में ढूँढ़ती और करती रही.

सर आशुतोष मुखर्जी सभा के न्यासी मण्डल के अध्यक्ष बने और बाद में लाला लाजपतराय इस पद पर आये. सर तेजबहादुर ‍‌सप्रू ने उस युग में सभा की आर्थिक एवं नैतिक सहायता की जो तब कई सहस्त्र रुपयों की थी. पं. गोविन्दवल्लभ पंत सन् 1908 से प्रतिमाह 1.50 रुपये से सभा की सहायता करने लगे और उन्होंने अपने सामाजिक और राजनीतिक जीवन की शुरुआत अपनी संस्था प्रेम सभा को नागरीप्रचारिणी सभा से संबद्ध करके की. उस समय के राजा-महाराजाओं में काशी नरेश, उदयपुर, ग्वालियर, खेतड़ी, जोधपुर, बीकानेर, कोटा, बूँदी, रीवाँनरेश आदि ने जहाँ इसे सहायता पहुँचाई, वहीं कर्मवीर मोहनदास करमचंद गाँधी ने भी इसकी कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में सहायता की और सन् 1934 में यंग इंडिया में उन्होंने सभा की सहायता के लिए अपने हस्ताक्षर से अपील की. पं. मोतीलाल नेहरू ने भी सभा की धन से सहायता की. सी.वाई.चिन्तामणि ने विधान परिषद् में सभा के भाषा के संबंध में विचारों का बराबर समर्थन किया तथा सर सुंदरलाल आदि ने इसकी भरपूर सहायता की.

हिंदी की सबसे प्राचीन शोध पत्रिका नागरीप्रचारिणी पत्रिका है जिसका सारे संसार के खोज जगत में अद्भुत मान है. यह सन् 1897 से निकल रही है. यह स्मरणीय है कि इस पत्रिका के सम्पादक मण्डल में बाबू श्यामसुन्दरदास, गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’, विद्यालंकार, डॉ. संपूर्णानंद, आचार्य नरेंद्रदेव, हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे महान विद्वान् रहे हैं.

सरस्वती हिंदी की आदि नियामक पत्रिका है जिसका शुभारम्भ नागरीप्रचारिणी सभा ने किया और 3 वर्षों तक उसका सम्पादन वह करती रही और बाद में आचार्य पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी को इसका सम्पादन-भार सौंपा.

सभा ने हिंदी में आर्यभाषा पुस्तकालय की स्थापना की जिसमें हज़ारों पत्र-पत्रिकाओं की फाइलें, लगभग 50,000 हस्तलेख और हिंदी के अनुपलब्ध ग्रंथों का विशाल संग्रह है जिसे और भी सुसंपन्न बनाया है डॉ श्यामसुंदरदास, पं. रामनारायण मिश्र, अज्ञेयजी के पूज्य पिता हीरानन्द शास्त्री, मायाशंकर याज्ञिक, डॉ संपूर्णानंद, नंददुलारे वाजपेयी, पांडेय बेचन शर्मा, ‘उग्र’, कृष्णदेवप्रसाद गौड़ ‘बेढब बनारसी’, आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी आदि के अवदान ने इन्होंने अपना सारा पुस्तकालय इसे समर्पित किया. संसार-भर के शोधार्थी इसका लाभ उठाते रहे हैं.

‘सभा’ ने 20वीं शती के प्रारंभ में यह प्रयत्न किया कि हिंदी का एक शब्दकोश अधुनातन वैज्ञानिक शैली पर तैयार किया जाए. सन् 1904 में यह कार्य आरम्भ हुआ और 25 वर्षों के अथक प्रयत्न से इसे पूरा किया गया जिसके सम्पादक थे बाबू श्यामसुन्दर दास ‘बी.ए’ और सहायक सम्पादक मण्डल में थे हिंदी जगत के शीर्षस्थ विद्वान् श्री बालकृष्ण भट्ट, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, श्री अमीर सिंह, श्री जगन्मोहन वर्मा, लाला भगवानदीन एवं श्री रामचंद्र वर्मा.

यह कोश उस युग में भी आज की ही भाँति आधुनिक भारतीय भाषाओं का सबसे अधिक विस्तृत और प्रमाणिक माना जाता था.

विज्ञान और विविध विषयों पर नागरीप्रचारिणी सभा ने भारत-भर के विद्वानों के सहयोग से वैज्ञानिक शब्दावली की रचना की तथा विज्ञान के विषयों पर गंभीर किताबों का लेखन आरम्भ कराया.

नागरीप्रचारिणी सभा ने सन् 1910 में अपने प्रांगण में अखिलभारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की और इस हिंदी साहित्य सम्मेलन से ही दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा, उद्भूत हुई. हिंदी साहित्य और भाषा की लगभग 60 संस्थाएँ इससे संबद्ध हैं.

नागरीप्रचारिणी सभा की सदस्यता प्रारम्भ से ही संसारव्यापी है और इसकी कार्यकारिणी में विदेशों के तीन विद्वान सदा से रहते आये हैं.

जिस समय सभा की स्थापना हुई उस समय न तो हिंदी का कोई प्रामाणिक व्याकरण था और न इतिहास. सभा ने सारे हिंदी जगत के मूर्धन्य विद्वानों – यथा बाबू श्यामसुन्दरदास, आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’, लज्जाशंकर झा आदि के सहयोग से कामताप्रसाद गुरु से व्याकरण तैयार कराया जो हिंदी का सर्वमान्य व्याकरण है. इसी प्रकार शब्दसागर की भूमिका के रूप में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से हिंदी साहित्य का इतिहास प्रस्तुत कराया जो विश्व में आज तक अनन्य समादृत है.

गाँधीजी के अनुरोध पर हिंदी में निष्काम संकेत लिपि प्रणाली का सभा ने आविष्कार कराया जिसके आदि विद्यार्थी लाल बहादुर शास्त्री, टी.एन.सिंह तथा अलगू राम शास्त्री थे और जिन्होंने इसके माध्यम से कटक कांग्रेस की रिपोर्टिंग की तथा संकेत लिपि विद्यालय की स्थापना की.

भारत कला भवन, जो उत्तर भारत का अत्यंत महत्वपूर्ण कला-संग्रहालय है, वह नागरीप्रचारिणी सभा का है और उसने उसे काशी हिंदू विश्वविद्यालय को संरक्षण, संवर्द्धन और विकास के लिए स्थानांतरित किया. हिंदी ने विविध वैज्ञानिक विषयों पर व्याख्यानमाला का आयोजन सभा ने किया. सभा के द्वारा ही हिंदी के साहित्यकारों और विद्वानों को लेखन के लिए पद और पुरस्कारों की व्यवस्था प्रारंभ की गई. सभा ने वर्तमान हिंदी रूप को निर्धारित किया और हिंदी को बोधगम्य बनाने के लिए मूलतः संस्कृत से और अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण करने की नीति का निर्धारण किया जो भारतीय संविधान में भी ग्राह्य हुआ. काशी नागरीप्रचारिणी सभा में एक सम्मेलन में इस रूप का निर्धारण सन् 1934 ई. में किया गया था.

नागरीप्रचारिणी सभा ने हिंदी के प्राचीन साहित्यकारों की ग्रंथावलियों का प्रकाशन किया और वे ग्रंथावलियाँ आज तक हिंदी की निधि हैं. ऐसे ग्रंथो की संख्या लगभग 100 है. हिंदी के लिए सभी संघर्षों का नेतृत्व सभा ने किया और इसने ही हिंदी-हिन्दुस्तानी, आकाशवाणी की हिंदी विरोध नीति और राष्ट्रभाषा हिंदी को लेकर व्यापक संघर्ष किया.

स्वतंत्रता के उपरान्त इस संस्था ने अपनी गौरवशाली परंपरा को और बढाया. इसके अध्यक्ष इस युग में आचार्य नरेन्द्रदेव, पं. गोविन्दवल्लभ पन्त, डॉक्टर संपूर्णानंद, डॉक्टर अमरनाथ झा, पं. कमलापति त्रिपाठी, डॉक्टर वेणीशंकर झा, जैसे विद्दवान और शिक्षाविद हुए. साथ ही, संस्था के आजन्म संरक्षक डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पं. जवाहर लाल नेहरु, लालबहादुर शास्त्री थे.

सभा ने हिंदी विश्वकोश का 12 भागों में प्रकाशन किया जिसमें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कई हजार विद्वानों ने अपने निबंध प्रस्तुत किये. उनमें कुछ है : डॉ. सी. वी. रमण, गोपीनाथ कविराज, राजगोपालाचारी, आचार्य नरेन्द्रदेव, दौलतराम कोठारी, प्रो. वारान्निकोव, डॉ. संपूर्णानंद आदि.

नागरीप्रचारिणी सभा ने शब्द सागर के नवीन संस्करण का प्रकाशन कराया जिसमें सन् 1965 तक व्यवहृत शब्द आ गए है. यह 11 भागों में प्रकाशित हुआ जो हिंदी का सर्वाधिक प्रमाणित कोश संसारभर में माना जाता है. नागरीप्रचारिणी सभा ने हिंदी साहित्य का इतिहास 16 भागों में प्रकाशित किया जिसे सैकड़ो राष्ट्रीय स्तर के विद्वानों ने प्रस्तुत किया. संसार में किसी भी भाषा का इतिहास इतने विस्तृत रूप से प्रस्तुत नहीं किया गया .

नागरीप्रचारिणी सभा में स्वतंत्र भारत में बैठकर जिन विद्वानों ने इन सब कार्यों में योगदान दिया और उसकी सेवा में रहें है. उनमें से कुछ है- डॉ. रामप्रसाद त्रिपाठी, डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ. फूलदेवसहाय वर्मा, डॉ. गोरखप्रसाद, डॉ. भगवतशरण उपाध्याय, आचार्य किशोरीदास वाजपेयी आदि.

इस संस्था ने लगभग 5000 आकरग्रंथों का प्रकाशन किया जिसमें अपने मूल से हुमयुनामा, अकबरनामा, जहाँगीरनामा, मुग़ल दरबार, जंगनामा, हेन्संग, सलमान सौदाग, फरहान का यात्रा विवरण, प्राचीन मुद्रशाश्त्र जैसे ग्रंथों का अनुवाद प्रस्तुत किया. आचार्य किशोरीदास वाजपेयी द्वारा रचित अभिनव व्याकरण सभा के तत्वावधान में रचा गया और हिंदी शब्दानुशासन नाम से प्रकाशित हुआ.

सभा ने अपनी भूमि का विस्तार इधर व्यापक रूप से किया है. नागरीप्रचारिणी सभा के अर्द्धशताब्दी के संपत्ति दान दी और इधर सभा ने भूमि-भवन का विस्तार इतने व्यापक पैमाने पर किया है की लगभग 60000 वर्ग फीट अच्छादित एरिया में नए भवन आदि बने हैं.

हिंदी के और भारतीय भाषाओँ के उदभट विद्वान् और साहित्यकार इसके पदाधिकारी रहे, जैसे देवकीनंदन खत्री, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंद पन्त, हरिवंशराय बच्चन, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, उमाशंकर जोशी, अमृतलाल नागर, बाबुराव विष्णु पराड़कर, यशपाल, ए.पी.मैकडॉनल, प्रो.टूची, प्रो.नार्मन ब्राउन, डॉ भगवानदास, अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी, शिवपूजन सहाय, हरेकृष्ण मेहताब, नलिनीमोहन सान्याल, सुनीतिकुमार चटर्जी, जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’, डॉ वासुदेवशरण अग्रवाल, श्री नाग नागप्पा, श्री सत्यनारायण, श्रीनारायण चतुर्वेदी, पीताम्बरदत्त बडथ्वाल, हरिकेशव घोष, पं.लोचनप्रसाद पाण्डेय, प्रो ए. वारान्निकोव, राहुल सांकृत्यायन, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, पं परशुराम चतुर्वेदी, श्री द्वारकाप्रसाद मिश्र, सेठ गोविन्ददास, श्री नन्ददुलारे वाजपेयी, प्रो. गुरमुख निहाल सिंह, डॉ. मोतीचन्द्र, शिवप्रसाद गुप्त, डॉ नगेन्द्र, श्री रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, प्रो.हरेकृष्ण अवस्थी, केशवप्रसाद मिश्र, डॉ. रघुवीर प्रसाद,  सीतामऊ, योइची, जे.सौ.सेरेआको, सी. डब्ल्यू, डेवी, सी.जे.नेपियर, कुँवर सुरेश सिंह, त्रिलोचन शास्त्री, जॉन वाल्टन पीस, डॉ.ए.टी.अल्विन, आर.एस.मेक्ग्रेगर, आर.क्लाउडीन, प्रो.लिक्फिडलिन, साराकोलेन, टी.जिन.आटोमेवे, ग्रेजेव वी.जे.प्लासा आदि.

सभा ने अपनी स्थापना से लेकर पचास के दशक तक हिंदी के प्रचार एवं प्रसार के लिए उत्सव किये और हिंदी की महान विभूतियों की शताब्दी उसने राष्ट्रीय स्तर पर मनाई जिनमें कुछ के नाम इस प्रकार हैं :

जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’, आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, बाबू श्यामसुन्दरदास, पद्मसिंह शर्मा, आचार्य नरेन्द्रदेव, डॉ. संपूर्णानंद, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर ‘प्रसाद’, कृष्णदेवप्रसाद गौड़, बेढब बनारसी आदि.

 

कौन हैं व्योमेश शुक्ल

नागरी प्रचारिणी सभा को एक परिवार की निजी संपत्ति हो जाना पूरे हिंदी जगत के लिए चिंता की बात होनी चाहिए थी। लेकिन हिंदी का दुर्भाग्य कि बाक़ी देश में तो छोड़िये, बनारस में भी इसे लेकर अरसे तक कोई सुगबुगाहट न थी। ऐसे में युवा कवि और रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल ने ये बीड़ा उठाया। उनके प्रयासों का नतीजा है कि सभा का वैभव लौट आने की संभावना बन गयी है।

कवि-आलोचक-अनुवादक-रंगनिर्देशक व्योमेश शुक्ल का जन्म 25 जून, 1980 को बनारस में हुआ. उनका बचपन यहीं बीता और यहीं पढ़ाई-लिखाई भी हुई. शहर के जीवन, अतीत, भूगोल और दिक्क़तों पर एकाग्र लेखों और प्रतिक्रियाओं के साथ 2004 में लिखने की शुरूआत. 2005 में व्योमेश ने ईराक़ पर हुई अमेरिकी ज़्यादतियों के बारे में मशहूर अमेरिकी पत्रकार इलियट वाइनबर्गर की किताब व्हाट आई हर्ड अबाउट ईराक़ का हिंदी अनुवाद किया, जिसे हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिका पहल ने एक पुस्तिका के तौर पर प्रकाशित किया. इस अनुवाद ने व्यापक लोकप्रियता और सराहना अर्जित की.

व्योमेश ने विश्व-साहित्य से नॉम चोमस्की, हार्वर्ड ज़िन, रेमंड विलियम्स, टेरी इगल्टन, एडवर्ड सईद और भारतीय वांग्मय से महाश्वेता देवी और के. सच्चिदानंदन के लेखन का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद किया है. अनुवाद और संस्कृति-संबंधी टिप्पणियों के साथ-साथ व्योमेश कविताएँ भी लिखते रहे हैं. कविताओं के लिए इन्हें 2008 में ‘अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार’ और 2009 में ‘भारत भूषण अग्रवाल स्मृति सम्मान’, आलोचनात्मक लेखन के लिए 2011 में ‘रज़ा फाउंडेशन फ़ेलोशिप’ और संस्कृति-कर्म के लिए ‘भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता का जनकल्याण सम्मान’ मिला है. हाल ही में नाटकों के निर्देशन के लिए इन्हें केन्द्रीय संगीत नाटक अकादेमी का ‘उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार’ दिया गया है.

व्योमेश शुक्ल के दो कविता-संग्रह 2009 और 2020 में राजकमल प्रकाशन से छपे हैं, जिनके नाम हैं ‘फिर भी कुछ लोग’ और ‘काजल लगाना भूलना’. इसके साथ-साथ ललित कला अकादेमी से भी पारंपरिक और आधुनिक भारतीय कला पर एकाग्र उनकी एक किताब ‘कला विमर्श’ शीर्षक से प्रकाशित है. इसके अलावा अव्वलीन बांग्ला-हिंदी अनुवादिका – दिवंगत मुनमुन सरकार के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित एक पुस्तक – ‘शब्दार्थ को समर्पित जीवन’ का इन्होंने संपादन किया है. हाल ही में व्योमेश शुक्ल के आलोचनात्मक निबंधों की किताब ‘कठिन का अखाड़ेबाज़’ राजकमल प्रकाशन से ही आयी है.

यों, व्योमेश शुक्ल के निबंध देश के अग्रणी समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, संगीत और थिएटर के जर्नल्स में प्रकाशित होते रहे हैं. मशहूर अंग्रेज़ी अख़बार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपने एक सर्वेक्षण में उन्हें देश के दस श्रेष्ठ लेखकों में शामिल किया है तो जानेमाने साप्ताहिक ‘इंडिया टुडे’ ने उन्हें भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक दृश्यालेख में परिवर्तन करने वाली पैंतीस शख्सियतों में जगह दी है.

व्योमेश शुक्ल बनारस में रहकर रूपवाणी शीर्षक एक रंगमंडल का संचालन करते हैं और रूपवाणी के नाटकों का निर्देशन करते हैं. रूपवाणी के नाटक देश के प्रायः सभी महत्वपूर्ण समारोहों, उत्सवों और संस्थानों में खेले जाते हैं.

व्योमेश के नाटकों के सवा सौ भी ज़्यादा मंचन देश के प्रमुख कला केन्द्रों, उत्सवों, समारोहों और अवसरों पर हुए हैं. व्योमेश ने बनारस की रामलीला का विधिवत अध्ययन किया है और स्वयं बनारस की रामलीला में राम की भूमिका की है. रामायण और महाभारत के आख्यानों को नये आशयों और पारंपरिक शिल्प में पेश करना उनके कामकाज की केंद्रीय वस्तु है.

व्योमेश ने मध्यप्रदेश शासन के साथ बाँस की उत्पत्ति की एक पुराकथा पर एकाग्र एक नाटक वहीं के लगभग दो सौ आदिवासी कलाकारों के साथ परिकल्पित और निर्देशित किया है, जिसका नाम है बाँसिन कन्या; वहीं बनारस की रामलीला के विविध प्रसंगों पर एकाग्र उनके नृत्यनाटक ‘चित्रकूट’ को अपनी वाराणसी-यात्रा के अवसर पर भारत के प्रधानमंत्री और फ्रांस के राष्ट्रपति ने साथ-साथ देखा और सराहा है. केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा मार्च 2018 में नियोजित उस सांस्कृतिक यात्रा के सलाहकार के तौर पर व्योमेश शुरुआत से ही उसमें शामिल थे. इसके अलावा व्योमेश द्वारा निर्देशित नाटक हैं – कामायनी, राम की शक्तिपूजा, रश्मिरथी, पंचरात्रम और मैकबेथ. व्योमेश संस्कृति मंत्रालय की अलग-अलग योजनाओं में बतौर सलाहकार शामिल रहे हैं. संप्रति, व्योमेश, संगीत, नाटक और नृत्य के क्षेत्र में काम करने वाली देश की सर्वोच्च संस्था – संगीत नाटक अकादेमी की महासभा में उत्तर प्रदेश के प्रतिनिधि सदस्य हैं.

 

संपर्क : 9519138988, 7007946472

ईमेल : vyomeshshukla@gmail.com

 

 


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