पेरू में पेड्रो कास्तियो की जीत: लाल लहर में डूबा अमेरिका का पिछवाड़ा!


कोलंबिया को छोड़ दें, तो पूरे लैटिन अमेरिका में सूरत यह है कि कहीं वामपंथ फिर से उठ कर खड़ा हो रहा है, तो कहीं उसका कारवां आगे बढ़ता दिख रहा है। जहां कारवां आगे बढ़ा है, उनमें सबसे प्रमुख नाम वेनेजुएला का है। दरअसल, वेनेजुएला से ही इस लहर की शुरुआत हुई थी। 1999 में वहां उगो चावेज के सत्ता में आने के साथ ये कहानी शुरू हुई, जो 2007 आते-आते एक बड़ी कथा बन गई। 2013 में चावेज की मृत्यु के बाद से वहां उनके उत्तराधिकारी राष्ट्रपति निकोलास मादुरो उनकी विरासत को संभाले हुए हैं। पिछले दिसंबर में हुए संसदीय चुनाव में मादुरो के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी- पीएसयूवी- ने बड़ी जीत हासिल की थी।


सत्येंद्र रंजन सत्येंद्र रंजन
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पेरू के राष्ट्रपति चुनाव में पेड्रो कास्तियो की जीत पिछले 10 साल में में दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप में वामपंथ की सबसे बड़ी कामयाबी है। इस सदी के आरंभिक दशक में जब लगभग पूरे दक्षिण अमेरिका में वामपंथ की लहर चल रही थी, तब पेरू और कोलंबिया ही दो बड़े देश थे, जो उससे बचे रहे। दरअसल, पेरू के पूरे इतिहास में कभी किसी वामपंथी नेता को वहां जनादेश नहीं मिला। 1968 से 1975 तक प्रधानमंत्री रहे हुआन वेलास्को अलवार के शासनकाल में जरूर कुछ वामपंथी नीतियां अपनाई गई थीं, लेकिन अलवार सैनिक तख्ता पलट के जरिए सत्ता में आए थे। इस तरह ये पहला मौका है, जब मार्क्सवादी सोच के नेता ने लोकतांत्रिक ढंग से (जिसकी औपचारिक घोषणा इन पंक्तियों के लिखे जाने तक नहीं हुई है) जनादेश हासिल किया है। पेशे से स्कूल शिक्षक रहे और अपनी सादगी भरी जिंदगी के लिए मशहूर पेरू लिब्रे पार्टी के नेता पेड्रो कास्तियो ने धन और मीडिया बल का मुकाबला करते हुए भले ही कम अंतर से, लेकिन स्पष्ट जीत दर्ज की है।

दक्षिण अमेरिका महाद्वीप में आने वाले 14 देशों में आबादी के लिहाज से पेरू चौथे नंबर पर आता है। ब्राजील, कोलंबिया और अर्जेंटीना की आबादी उससे ज्यादा है। उसके बाद पांचवें नंबर पर वेनेजुएला, छठे पर चिली, सातवें नंबर पर इक्वाडोर और आठवें नंबर बोलिविया हैं। उसके बाद पेराग्वे और उरुग्वे का स्थान आता है। बाकी चार देशों में कोई ऐसा नहीं है, जिसकी आबादी आठ लाख से ज्यादा हो।

तो सियासी लिहाज से अगर देखें, तो दक्षिण अमेरिका के टॉप दस देशों में सिर्फ कोलंबिया अब ऐसा बचा है, जहां इस सदी में लाल लहर नहीं पहुंची। फिलहाल, ब्राजील में धुर दक्षिणपंथी सरकार है। लेकिन भ्रष्टाचार के फर्जी मामले में फंसाए गए लोकप्रिय पूर्व राष्ट्रपति लूला- यानी लुइज इनेसियो लूला दा सिल्वा अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में सबसे मजबूत दावेदार हैं। अगर फिर किसी फर्जी मामले के जरिए उन्हें जबरन चुनाव लड़ने से नहीं रोका गया, तो वहां उनका सत्ता में लौटना लगभग तय समझा जा रहा है। अर्जेंटीना की जनता बीच में पांच साल दक्षिणपंथ के बुरे अनुभव को झेलने के बाद अल्बर्तो फर्नांदेज के रूप में फिर एक वामपंथी राष्ट्रपति का निर्वाचन कर चुकी है। उधर बोलिविया में 2019 में तख्ता पलट के जरिए हटाए गए सोशलिस्ट नेता इवो मोरालेस की पार्टी पिछले साल के आखिर में हुए आम चुनाव में फिर भारी बहुमत से सत्ता में लौटी।

इस बीच वेनेजुएला अकेला ऐसा देश रहा है, जहां पिछले 23 साल से लगातार वामपंथी सरकार है। लेकिन इस सदी के आरंभिक दशक में वामपंथ को चुनने वाले अन्य तीन देशों इक्वाडोर, पराग्वे और उरुग्वे में पिछले तीन साल के भीतर फिर से दक्षिणपंथी पार्टियां जीती हैं, हालांकि हारने के बावजूद वामपंथी दल/ गठबंधन की ताकत वहां बरकरार दिखी है।

अब चिली भी इस कथा का एक अहम हिस्सा हो चुका है। चिली में पिछले महीने हुए संसदीय और संविधान सभा के चुनाव में वामपंथ की जबरदस्त जीत हुई। गौरतलब है कि दक्षिण अमेरिका में वामपंथ ने सबसे पहले यहीं 1970 के दशक में दस्तक दी थी, जब सल्वादोर एलेंदे पूरे लैटिन अमेरिका में ऐसे पहले मार्क्सवादी नेता बने थे, जो राष्ट्रपति चुने गए। लेकिन अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने चिली के दक्षिणपंथी ताकतों के मिलकर उनके तख्ता पलट की साजिश रची। सितंबर 1973 में उनकी हत्या कर तख्ता पलट दिया गया था। तब से लगभग दो दशक तक वहां क्रूर सैनिक तानाशाही का दौर चला। उस दौर में वहां नव-उदारवादी संविधान लागू किया गया, तो अब तक वजूद में है। लेकिन 2019 में चिली में शुरू हुए जन आंदोलन ने पिछले साल जाकर ऐतिहासिक सफलता हासिल की, जब देश के सत्ताधारी नया संविधान बनाने के लिए संविधान सभा का चुनाव कराने पर राजी हुए। ये चुनाव पिछले महीने हुआ। इसमें उन वामपंथी ताकतों को साफ बहुमत मिला, जिन्होंने चुनाव एक जनवादी संविधान बनाने का वादा किया था।

पेरू के ताजा चुनाव नतीजे को इस पूरे संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। इस कथा में मेक्सिको को भी शामिल किया जाना चाहिए, जो भौगोलिक रूप से उत्तर अमेरिका का हिस्सा है, लेकिन भाषा और संस्कृति के लिहाज से जिसे लैटिन अमेरिका में ही गिना जाता है। साढ़े 12 करोड़ की आबादी वाले इस देश में 2018 में एक बड़ा बदलाव आया, जब राष्ट्रपति चुनाव में वामपंथी नेता आंद्रेस मैनुएल लोपेज निर्वाचित हुए, जिन्हें आम तौर पर उनके नाम के पहले अक्षरों- एएमएलओ यानी एमलो के नाम से जाना जाता है। एमलो ने एक दिसंबर 2018 सत्ता में आने के बाद देश में बड़े बदलाव किए हैँ। उन्होंने अर्थव्यवस्था मे सरकारी दखल बढ़ाया है और जन कल्याण की कई नई योजनाएं लागू की हैं। बीते रविवार को जिस दिन पेरू में राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान हुआ, मेक्सिको में जैसाकि कहा गया है, इतिहास का सबसे विस्तृत चुनाव हुआ। उस रोज लगभग 20 हजार सीटों को भरने के लिए मतदान हुआ। संसद के निचले सदन और सभी राज्यों के गवर्नरों के अलावा प्रांतीय असेंबलियों और नगर निकायों के चुनाव के लिए एक साथ वोट डाले गए। घोषित नतीजों के मुताबिक संसदीय चुनाव में एमलो की पार्टी मोरेना के नेतृत्व वाले गठबंधन को हलका झटका लगा। 500 सदस्यों वाले निचले सदन में उसके सदस्यों की संख्या अब 334 से घट कर 279 रह गई। लेकिन गौरतलब यह है कि इसमें एमलो की अपनी मोरेना पार्टी की सीटें नहीं घटीं। मोरेना के सहयोगी दलों को जरूर नुकसान हुआ। बहरहाल, 15 राज्यों के गवर्नरों के लिए हुए चुनाव में मोरेना को 9 राज्यों में खुद और दो राज्यों में अपने सहयोगी दलों के साथ जीत हासिल हुई। ज्यादातर प्रांतीय असेंबलियों और स्थानीय निकायों में भी मोरेना पार्टी को जीत मिली है। चुनाव विश्लेषकों ने इन चुनाव नतीजों को एमलो की नीतियों पर जनता की मुहर के रूप में देखा है।

इस तरह अगर कोलंबिया को छोड़ दें, तो पूरे लैटिन अमेरिका में सूरत यह है कि कहीं वामपंथ फिर से उठ कर खड़ा हो रहा है, तो कहीं उसका कारवां आगे बढ़ता दिख रहा है। जहां कारवां आगे बढ़ा है, उनमें सबसे प्रमुख नाम वेनेजुएला का है। दरअसल, वेनेजुएला से ही इस लहर की शुरुआत हुई थी। 1999 में वहां उगो चावेज के सत्ता में आने के साथ ये कहानी शुरू हुई, जो 2007 आते-आते एक बड़ी कथा बन गई। 2013 में चावेज की मृत्यु के बाद से वहां उनके उत्तराधिकारी राष्ट्रपति निकोलास मादुरो उनकी विरासत को संभाले हुए हैं। पिछले दिसंबर में हुए संसदीय चुनाव में मादुरो के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी- पीएसयूवी- ने बड़ी जीत हासिल की थी।

चावेज के सत्ता में आने के साथ लैटिन अमेरिका में वामपंथ की लहर की उस वक्त आई थी, जब सोवियत संघ के बिखराव के बाद से इस विचारधारा को खत्म घोषित कर दिया गया था। लेकिन लैटिन अमेरिका ने इस सदी के पहले दशक में ‘इतिहास के अंत’ के उस एलान को जोरदार चुनौती दी। हाल के घटनाक्रमों ने साबित किया है कि ये चुनौती क्षणिक नहीं थी। बल्कि बीच में लगे झटकों के बावजूद चावेज, लूला, इवो मोरालेस, नेस्तर और क्रिस्टीना दा फर्नांडेज (अर्जेंटीना), रफायल कोरिया (इक्वाडोर) आदि से जो शुरुआत हुई, उसकी मजबूत जमीन कायम है। अब ये सोच चिली और मेक्सिको तक अपने को फैला चुकी है।

लैटिन अमेरिका में हुए इस प्रयोग और उसके पहले दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में समाजवादी प्रयोगों से कुछ अंतर रहा है। इसे अलग करने वाला सबसे अहम पहलू तो यही है कि इन तमाम देशों में वामपंथी सरकारें जनता के वोट से निर्वाचित होकर बनीं। उन सरकारों का नेतृत्व करने वाले तमाम नेता समाजवादी (ज्यादातर मार्क्सवादी विचारधारा) से प्रेरित रहे हैं, फिर भी चावेज और मोरालेस को छोड़ कर बाकी नेताओं ने अपने प्रयोग को सोशलिस्ट नाम नहीं दिया। गौरतलब है कि जब इस सदी के पहले दशक में वामपंथी सरकारों का दौर आया, तो उन सबमें एक संवाद और सहयोग की कड़ी स्थापित की गई थी। चावेज ने उस प्रयास में क्यूबा को भी शामिल किया था। इन देशों ने दक्षिण अमेरिका आर्थिक सहयोग के संगठन- मेर्कोसुर- के तहत आपसी सहयोग, संवाद और अपने अनुभव को साझा करने की नियमित शुरुआत की थी।

उस दौरान ये विचार सामने आया था कि लैटिन अमेरिका में हो रहा प्रयोग सोशिलिज्म नहीं, बल्कि मूवमेंट टुवार्ड्स सोशलिज्म- यानी समाजवाद की तरफ कदम है। इसका अर्थ यह था कि लैटिन अमेरिकी नेताओं ने समाजवाद को एक सिस्टम के बजाय एक आदर्श या सोच के रूप में लिया था। आदर्श जनता के कमजोर हिस्सों को सबल करते हुए सामाजिक और आर्थिक समानता की तरफ बढ़ना माना गया था। इस मकसद को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग देशों में वहां की परिस्थितियों के मुताबिक नीतियां अपनाई गईं। उसमें सिर्फ वेनेजुएला था, जहां संपत्तियों के राष्ट्रीयकरण को तरजीह दी गई। बाकी देशों में अर्थव्यवस्था में सरकारी दखल को बढ़ाते हुए टैक्स रेवन्यू को बढ़ाने और उससे जन कल्याण की नीतियां लागू करने को प्राथमिकता दी गई। मसलन, ब्राजील में लूला की सरकार ने बोल्सा फैमिला नाम की मशहूर सशर्त कैश ट्रांसफर की नीति लागू की, जिससे विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक देश की एक तिहाई जनता को गरीबी रेखा से ऊपर लाया जा सका।

लैटिन अमेरिकी देशों ने अपने यहां आई वामपंथी परिघटना को बोलिवेरियन क्रांति का हिस्सा माना। सिमोन बोलिवर इतिहास के वे शख्सियत हैं, जिन्हें लैटिन अमेरिका में मुक्तिदाता के रूप में देखा जाता है। 18वीं सदी के आखिर और 19वीं सदी के आरंभ में उनके नेतृत्व में ही लैटिन अमेरिका में उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष की शुरुआत हुई थी। सिमोन बोलिवर का जन्म वेनेजुएला में हुआ था, लेकिन उनकी लड़ाई पूरे लैटिन अमेरिका में पहुंची। अपने जीवनकाल में उन्होंने वेनेजुएला, कोलंबिया और इक्वाडोर को मिला कर ग्रैन (ग्रैंड) कोलंबिया की स्थापना की और स्पेन की गुलामी से उस पूरे क्षेत्र को मुक्ति दिलाई थी। सिमोन बोलिवर ने साम्राज्यवाद, गैर-बराबरी और भ्रष्टाचार के विरोध को अपनी विचारधारा बनाया था। जाहिर है, समाजवादी विचारधारा के कई पहलू बोलिवर की सोच का हिस्सा थे। इसीलिए चावेज ने खुद को बोलिवेरियन क्रांति का अनुयायी घोषित किया था और लैटिन अमेरिका के दूसरे वामपंथी नेताओं ने भी इस धारा से खुद संबंधित कर रखा है।

बहरहाल, ये ध्यान देने की बात है कि सोवियत संघ और उसके खेमे के देशों, चीन, क्यूबा, वियतनाम आदि देशों में घोषित रूप से समाजवादी सरकारें रही हैं। लेकिन वे सरकारें क्रांति या विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों की वजह से सत्ता में आईं। उनके सामने पश्चिमी ढंग की लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत एक तय अवधि पर लगातार जनादेश प्राप्त करने की चुनौती नहीं रही है। सोवियत संघ के विखंडन के बाद बचे समाजवादी देशों में बड़े पैमाने पर आर्थिक सुधार हुए। कुल मिलाकर वे देश पूरी तरह राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़ते हुए मिश्रित अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़े। चीन अब इसे मार्केट सोशलिज्म कहता है। लैटिन अमेरिका की मूवमेंट टुवार्ड्स सोशलिज्म की सोच पर चली सरकारों ने भी इसी रास्ते को अपनाया। लेकिन पश्चिम ढंग की चुनावी व्यवस्था में काम करने की वजह से उन्हें अलग तरह की समस्या का सामना करना पड़ा है।

अनुभव यह रहा है कि सरकारें बदलने के बावजूद परंपरागत रूप से शासक वर्ग रहे धनी-मानी तबकों की सत्ता के विभिन्न केंद्रों पर पकड़ बनी रहती है। इनमें मीडिया, संस्कृति को प्रभावित करने वाले अन्य माध्यम तथा पारंपरिक पूर्वाग्रहों के मुताबिक चलने वाली सामाजिक व्यवस्था भी शामिल है। जब किसी सरकार की वामपंथी नीतियों के कारण शासक वर्ग के हितो पर चोट पहुंचती है, तो वह अपने इसी प्रभाव का इस्तेमाल कर उस सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में अपनी ताकत झोंक देता है। अक्सर इसमें उसे कामयाबी भी मिल जाती है। इस मुहिम में भ्रष्टाचार एक प्रमुख मुद्दा बनता है। पहले से चल रही व्यवस्था के तहत बनी सरकारों पर किसी ना किसी स्तर पर किसी ना किसी अधिकारी के भ्रष्टाचार के कारण ये लांछन लग जाता है। फिर मीडिया के जरिए इस मुद्दे को उछाल कर संबंधित नेता या पार्टी की साख पर जोरदार हमला बोला जाता है। ऐसा होने का सबसे खास उदाहरण ब्राजील में देखने को मिला। वहां एक बिल्कुल झूठे आरोप में (अब वो मामला कोर्ट में खारिज हो चुका है) लूला को जेल भेज दिया गया। उनकी उत्तराधिकारी सोशलिस्ट राष्ट्रपति डिलिमा रुसेफ को महाभियोग लगाकर राष्ट्रपति पद से हटा दिया गया। उससे धुर दक्षिणपंथ की सत्ता में वापसी हुई, जिसका नेतृत्व अब मौजूदा राष्ट्रपति जायर बोलसोनारो कर रहे हैं। ये परिघटना कमोबेस उन सभी देशों में दोहराई गई, जहां इस सदी के आरंभ में वामपंथी सरकारें बनी थीं। अगर उसके प्रभाव से कोई सरकार बची रह पाई, तो वह सिर्फ वेनेजुएला की है।

लेकिन वेनेजुएला की सरकार को अमेरिका और उसके साथी देशों के सख्त प्रतिबंधों के बीच काम करना पड़ा है। यह भी एक ट्रेंड है कि वामपंथी सरकारों पर अक्सर अमेरिकी खेमे के देश प्रतिबंध लगाकर उनका जीना मुहाल कर देते हैं। मकसद यही होता है कि प्रतिबंधों के कारण लोगों की जिंदगी मुश्किल होगी, जिससे नाराज होकर वे सरकार को पलट देंगे। क्यूबा और वेनेजुएला को छोड़ दें, तो लैटिन अमेरिका में भी अक्सर ये रणनीति सफल रही है। लेकिन मुश्किल यह है कि हर वामपंथी सरकार के बाद एक धुर दक्षिणपंथी सरकार आई है, जिसकी नव-उदारवादी नीतियों ने लोगों से वे सामाजिक सुरक्षाएं भी छीन लीं, जो वामपंथी सरकारों के दौर में कायम की गई थीं। तो फिर लोग घूम-फिर कर वामपंथ की तरफ लौटें हैं। यही परिघटना फिलहाल लैटिन अमेरिका में दोहाराई जा रही है।

इसके बीच पेरू में लिब्रे पार्टी की जीत को इस कड़ी के और मजबूत होने की मिसाल माना जाएगा। इस चुनाव ने पेरू को वर्ग और इलाकों के आधार पर बांट दिया है। कॉरपोरेट सेक्टर और धनी तबकों ने इस चुनाव में कास्तियो को हराने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। उसका असर भी हुआ। धनी तबकों के निवास वाले इलाकों, खदान वाले अपेक्षाकृत धनी राज्यों और शहरों में पेड्रो कास्तियो अपनी दक्षिणपंथी प्रतिद्वंद्वी केइको फुजीमोरी से पिछड़ गए थे। लेकिन जब गांवों और गरीब इलाकों से मतगणना की खबरें आने लगीं, तब उन्हें बढ़त मिलने लगी। लेकिन ये अंतर एक प्रतिशत के आसपास ही रहा। ऐसे में ये साफ है कि कास्तियो के विरोध में हुई गोलबंदी भी काफी मजबूत है। इसके बीच लोकतांत्रिक ढंग से शासन करना और अपने वादे के मुताबिक नया संविधान बनाना उनके लिए आसान नहीं होगा। इसके बावजूद ये अहम है कि आम जनता ने उनकी नीतियों और उनके व्यक्तित्व पर भरोसा जताया है।

वैसे भी समाजवाद जब कभी पूरी तरह साकार होगा, तो उसकी सत्ता का स्वरूप वर्गीय आधार पर ही तय होगा। दरअसल, इसीलिए सोवियत संघ में बोल्शेविक क्रांति के बाद उस क्रांति के नेता व्लादीमीर लेनिन ने मार्क्सवादी विचारधारा में सर्वहारा की तानाशाही का विचार जोड़ा था। उसका जो भी अनुभव रहा हो, लेकिन सच यह है कि वोट से सत्ता में आए नेताओं के पास इस उपाय को अपनाने की सुविधा नहीं हैं। इसलिए उनका काम कहीं ज्यादा चुनौती भरा है। हर मुकाम पर जनता के बहुमत का जनादेश हासिल करना तब और भी बड़ी चुनौती हो जाता है, जब परंपरागत रूप से शासक रहा वर्ग ऐसी सरकार की जड़ें खोदने में जुटा रहता है। चूंकि यह एक दीर्घकालिक, बल्कि ऐतिहासिक महत्त्व का राजनीतिक संघर्ष है, इसलिए पेड्रो कास्तियो जैसे नेताओं की जीत से लड़ाई एक कदम आगे बढ़ती है। इसीलिए ऐसी जीत की खबरों से पूरी दुनिया में बराबरी के लिए संघर्षरत और न्याय के समर्थक लोगों में उत्साह पैदा करती है। कास्तियो की जीत ने एक बार फिर ऐसे लोगों को उत्साहित और खुश होने का मौका प्रदान किया है।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


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