टूट नहीं रही कश्मीर की बर्फ़, राज्य बहाली तक चुनाव नहीं लड़ेंगे उमर

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जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के ख़ात्मे के एक साल बाद भी स्थिति सामान्य न होने से परेशान केंद्र सरकार के लिए सुकून भरे दिन दूर की कौड़ी लगते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला ने ऐलान किया है कि जब तक जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल नहीं होता, वे चुनाव नहीं लड़ेंगे। जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश में बदले जाने से नाराज़ उमर और उनके पिता फारुख अब्दुल्ला को लंबे समय तक नज़रबंद रखने के बाद हाल ही में रिहा किया गया है। उमर अब्दुल्ला वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। तब उनकी नेशनल कान्फ्रेंस एनडीए का हिस्सा थी।

उमर अब्दुल्ला ने कहा कि वे राज्य विधानसभा के नेता रहे हैं जो अपने समय की सबसे मजबूत विधानसभा थी। अब यह देश की सबसे कमज़ोर विधानसभा बन चुकी है तो वे इसके सदस्य नहीं बनेंगे। उन्होंने कहा-” यह कोई धमकी या ब्लैकमेल नहीं है, न ही निराशा का इजहारहै। यह एक सामान्य स्वीकारोक्ति है कि मैं इस तरह की कमजोर विधानसभा, केंद्रशासित प्रदेश की विधानसभा का नेतृत्व करने के लिए चुनाव नहीं लड़ूँगा।”

उमर ने अफ़सोस जताया कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म करने के ख़िलाफ़ दिये गये किसी तर्क पर बात ही नहीं की जा रही है। नेशन कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने पिछले साल 5 अगस्त को विशेष दर्जा देने वाले प्रावधानों को निरस्त किए जाने की आलोचना की थी और कहा था कि उनकी पार्टी सुप्रीम कोर्ट में इसका विरोध करेगी।

लेकिन उमर अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कान्फ्रेंस ने इस बाबत अभी कोई फ़ैसला नहीं लिया है। उमर ने कहा कि “यह मेरी निजी राय है और यह मेरा फैसला है। मेरी इच्छा के विरूद्ध कोई भी चुनाव लड़ने के लिए मुझपर जोर नहीं डाल सकता।”

जम्मू कश्मीर प्रशासन द्वारा परिसीमन को लेकर किये जा रहे प्रयासों के संबंध में उमर ने कहा, “नेशनल कॉन्फ्रेंस पिछली 5 अगस्त के बाद के घटनाक्रम और फैसलों को चुनौती देने के लिए सभी कानूनी विकल्पों को खंगाल रही है और आगे भी यही करेगी । हम लोकतंत्र और शांतपूर्ण विपक्ष में विश्वास रखते हैं।”

ज़ाहिर है, उमर अब्दुल्ला का रुख स्थिति को सामान्य बनाने के प्रयासों को झटका है। हाल ही में मनोज सिन्हा को उपराज्यपाल बनाकर केंद्र ने राजनीतिक प्रक्रिया को गति देने की कोशिशों का संकेत दिया था, लेकिन अगर नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी जैसी पार्टियाँ चुनाव में हिस्सा नहीं लेतीं तो यह कोशिश बेकार ही समझी जाएगी। पीडीपी चीफ़ और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती अभी भी हिरासत में हैं। कश्मीर के लोगों का मानसिक अलगाव कैसे दूर हो, यह एक बड़ी समस्या है। साल भर से ज़्यादा वक़्त से वहाँ लोगों ने ख़ुद को क़ैद करते हुए जिस तरह विरोध जताया है उसे दुनिया का सबसे लंबा सत्याग्रह भी कहा जा रहा है। उधर, केंद्र के तमाम दावों के बावजूद आतंकी गतिविधियाँ भी बदस्तूर जारी हैं। ऐसे में यह सवाल पूछा जा रहा है कि अनुच्छेद 370 हटाने से स्थिति बेहतर हुई कि बदतर ?

 



 


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