मोदी राज में घट गई अल्पसंख्यक छात्रवृत्ति पाने वालों की संख्या!

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वर्तमान मोदी सरकार सबका साथ सबका विकास नारे के साथ खुद के प्रचार पर जमकर पैसा व्यय कर रही है, जबकि एक विस्तृत जांच रिपोर्ट के मुताबिक अल्पसंख्यक छात्रवृत्ति योजना की निधि और लाभार्थियों की संख्या दोनों के लिए आवंटन में लगातार गिरावट आई है। 2014-15 से पहले पिछले सरकार में अल्पसंख्यक छात्रवृत्ति योजना एक महत्वकांक्षी योजना थी। इस योजना को सच्चर कमेटी की निष्कर्षों के बाद लागू किया गया था जिसमें भारत में अल्पसंख्यकों की दयनीय सामाजिक आर्थिक स्थितियों का विश्लेषण किया गया था।

सच्चर रिपोर्ट के पंद्रह 15 कार्यक्रमों में अल्पसंख्यक समुदाय के मेधावी छात्रों के लिए छात्रवृत्ति 5वां महत्वपूर्ण बिंदु है। जो अल्पसंख्यकों को समान अवसर प्रदान करने के बड़े लक्ष्य के तहत आता है। इसके साथ-साथ प्री-मैट्रिक, पोस्ट-मैट्रिक, मेरिट कम मीन्स और मौलाना आजाद नेशनल फेलोशिप अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के द्वारा वितरित की जाती है।

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के मुताबिक मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, जैन और बौद्ध आते हैं। इन योजनाओं इसलिए लागू किया गया था ताकि सभी अल्पसंख्यकों आर्थिक और शैक्षिक स्थिति में सुधार किया जा सके। जबकि साल 2014-15 के बाद से इन योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या में लगातार गिरावट आई है।

गरीब धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों के लिए समावेशी विकास और अवसरों की उपलब्धता प्रदान के लिए प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना है। जिसके तहत कक्षा एक से दस तक के उन योग्य उम्मीदवारों को स्कॉलरशिप दी जाती है जिन्होने फाइनल एग्जाम में पचास फीसदी से अधिक अंक हासिल किए हों और उनके माता-पिता की वार्षिक आय एक लाख रुपये से अधिक न हो।

जबकि पोस्ट मैट्रिक योजना भारत सरकार द्वारा संचालित तकनीकी और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए लागू है। इसके तहत योग्यता का मानदंड यह है कि छात्र ने अपने फाइनल एग्जाम में पचास प्रतिशत से अधिक अंक हासिल किए हो और उसके माता-पिता की सालाना आय 2 लाख रुपये से अधिक न हो।

इसके अलावा मेरिट-कम-मीन्स (एमसीएम) स्कॉलरशिप गरीब अल्पसंख्यक समुदाय के स्नातक और स्नाकोत्तर स्तर तक की पढ़ाई करने वाले छात्रों को दी जाती है। इसके तहत योग्य छात्र को पचास फीसदी से अधिक अंक हासिल करने अनिवार्य हैं और उसके माता पिता या अभिभावक की सालाना आय ढाई लाख रुपये से अधिक न हो।

इसके अलावा मौलाना आजाद नेशनल फेलोशिप अल्पसंख्यक डॉक्टरेट उम्मीदवार को पांच साल तक के लिए दी जाती है। जिससे वह उच्च शिक्षा, शैक्षणिक संस्थान और अकादमी में रोजगार हासिल करने में सक्षम हो सके। इसके तहत केवल सीबीएसई-नेट या सीएसआईआर-नेट की परीक्षा पास कर चुके उम्मीदवार ही योग्य हैं। इस फेलोशिप को प्राप्त करने वाला अभ्यर्थी अन्य सरकारी सहायता के लिए योग्य नहीं होगा।

उपरोक्त सभी योजनाओं में महिला उम्मीदवारों के लिए सीटों का 30% आरक्षण है। सभी स्कॉलरशिप की योजनाओं में गरीब और सीनियर स्टुडेंट्स को वरीयता दी जाती है और इसमें मेरिट मुख्य भूमिका नहीं निभाती है।

ग्राफ-1 में प्री मैट्रिक, पोस्ट मैट्रिक और मेरिट कम मीन्स स्कॉलरशिप में कुल गिरावट को दिखाया गया है। सभी स्कॉलरशिप के लाभार्थियों की संख्या में साल 2014-15 के बाद से गिरावट आई है।

प्री मैट्रिक और पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप के लिए वित्तीय आवंटन साल 2011-12 में बिल्कुल निचले स्तर पर पहुंचा। यह विचाराधीन अवधि के दौरान देश में बढ़ती आबादी और गरीबी के चलते हुआ।

मेरिट-कम-मीन्स स्कॉलरशिप  के लिए आम तौर पर वित्तीय आवंटन में वृद्धि हुई है। लेकिन मेरिट कम मीन्स स्कॉलरशिप केवल स्नातक और स्नाकोत्तर स्तर तक योग्य अभ्यर्थियों के लिए है और बाद में पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप के वितरण और योग्य छात्रों में कमी आई है, उस अंतराल को दिखाया गया है। इसलिए भले ही मेरिट कम मीन्स स्कॉलरशिप के वितरण में गिरावट नहीं देखी गई है फिर भी भविष्य में यह गिरावट दिखेगी क्योंकि उच्च शिक्षा को हासिल करने वाले गरीब अल्पसंख्यक समुदाय के की संख्या बहुत कम होगी क्योंकि उनकी पहुंच पहले से ही प्री मैट्रिक और पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप हासिल करने में बाधा पहुंच गई है।

 

अंकिता रस्तोगी की रिपोर्ट। सबरंग से साभार प्रकाशित। 


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