‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’ की तर्ज़ पर मज़दूर-किसान बोले- कॉरपोरेट भगाओ-देश बचाओ!

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9 अगस्त 1942 के ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आंदोलन की वर्षगांठ के मौके पर किसान-मजदूर संगठन ‘कॉरपोरेट किसानी छोड़ो’ और ‘देश नहीं बिकने देंगे’ नारे के साथ देश भर में सड़कों पर उतरे। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (AIKSCC) और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के बैनर तले देशभर में किसान और मजदूरों संगठनों ने मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।

दिल्ली के जंतर मंतर पर भारी संख्या में किसान और मजदूर संगठनों के कार्यकर्ता जुटे और मोदी सरकार की किसान- मजदूरों विरोधी नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। इस प्रर्दशन में केंद्रीय श्रम संगठनों के राष्ट्रीय नेताओं ने भाग लिया। इंटक से अशोक सिंह और राजिन, एटक की अमरजीत कौर, विद्या सागर गिरि, एचएमएस से हरभजन सिद्धू, सीटू से तपन सेन, हेमलता और देवरॉय, एआईयूटीयूसी से आरके शर्मा और चौरसिया, एआईसीसीटीयू से राजीव डिमरी और संतोष राय, यूटीयूसी से शत्रुजीत के अलावा बैंक और बीमा क्षेत्र के नेता भी शामिल थे।

ट्रेड यूनियंस के राष्ट्रीय नेताओं ने जंतर-मंतर पर सभा को संबोधित करते हुए कहा कि लॉकडाउन के बाद कुछ औद्योगिक इकाइयों के खुलने के साथ, सभी श्रमिकों को वापस नहीं लिया जा रहा है, केवल एक छोटा प्रतिशत नौकरियों में अपनी जगह पा रहा है और वह भी कम मजदूरी पर। लॉकडाउन अवधि के वेतन से वंचित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि रोजगार और मजदूरी में कमी की इस चुनौती का सामना हमें एक-जुट संघर्ष के माध्यम से करना होगा। एमएसएमई स्वयं रिपोर्ट कर रहे हैं कि 30% से 35% इकाइयों के लिए अपनी गतिविधियों पुनः शुरू करना मुश्किल हो सकता है।

नेताओं ने कहा कि बेरोजगारी की दर उच्चतम स्तर पर है और रोजगार ख़त्म हो रहे हैं। उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के विनिवेशन और थोक निजीकरण पर अपना विरोध जताया। उन्होंने कहा कि भारतीय रेल, बीपीसीएल, भेल, ओएनजीसी जैसी बड़ी और देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण संस्थानों को मोदी सरकार नीलामी की ओर ले जा रही है। जिन संस्थानों और मजदूरों की बदौलत आज हमारा देश कई मायनों में आत्मनिर्भर हुआ है, उन संस्थानों को केंद्र सरकार पूंजीपतियों के हवाले कर देना चाहती है।

ऐक्टू के राष्ट्रीय महासचिव, राजीव डिमरी ने कहा कि “कोरोना काल में प्राइवेट अस्पतालों की मुनाफाखोरी सबने देखी है, अगर आगे चलकर भारतीय रेल व तमाम सार्वजनिक संस्थाओं का निजीकरण किया गया तो यह गरीब-मेहनतकश आबादी के लिए सबसे बड़ी त्रासदी होगी। उन्होंने कहा कि रेल कर्मचारियों में काफी असंतोष और गुस्सा है, कोयला क्षेत्र के मजदूरों ने हड़ताल का आह्वान किया है, आयुध निर्माणियों में भी हड़ताल की घोषणा हो चुकी है, देश के तमाम राज्यों में स्कीम वर्कर्स जुझारू संघर्ष कर रहे हैं। देश का मजदूर वर्ग मोदी सरकार को देश बेचने नहीं देगा। मोदी सरकार आत्मनिर्भर भारत के नाम पर देश को गिरवी रखने की तैयारी कर रही है।

प्रदर्शन में मौजूद लोगों ने इस बात पर जोर दिया कि मोदी सरकार व संघ-भाजपा के लोग लगातार धर्म-सम्प्रदाय के नाम पर मेहनतकश जनता को बांटने की कोशिश कर रहे है। एक ओर नफरत-हिंसा फैलाकर शांति और सद्भाव को भंग किया जा रहा है,  तो दूसरी तरफ मजदूरों-किसानों के अधिकार छीने जा रहे हैं।

हरियाणा में किसानों के बीच रहे योगेंद्र यादव

वहीं अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के नेता व स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव आज हरियाणा के तोशाम में किसानों के बीच थे। उन्होंने किसानों के साथ ट्रैकर रैली निकाल कर सरकार की नीतियों पर अपना विरोध जताया। ट्रैक्टर रैली खरखड़ी माखवान गांव से शुरू होकर तोशाम के एसडीएम कार्यालय तक गई। विरोध प्रदर्शन के दौरान 5 जुलाई 2020 को केंद्र सरकार के द्वारा लाए गए 3 किसान विरोधी अध्यादेशों की प्रतिलिपियां जलाई गईं।

इस मौके पर योगेंद्र यादव ने कहा कि केंद्र सरकार ने कोरोना काल में तीन किसान विरोधी अध्यादेश लाई है। कृषि उपज, वाणिज्य एवं व्यापार (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश 2020, मूल्य आश्वासन पर (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता कृषि सेवा अध्यादेश 2020 और  आवश्यक वस्तु अधिनियम (संशोधन) 2020। लेकिन इनका असली नाम जमाखोरी चालू करो कानून, मंडी खत्म करो कानून और खेती कंपनियों को सौंपा कानून होना चाहिए क्योंकि इन अध्यादेशों का यही असली मकसद है।

योगेंद्र यादव ने कहा कि व्यापारी कृषि उत्पाद खरीद कर जमाखोरी करके अपनी मनमर्जी से रेट तय करके बेचता है। जिससे किसान और उपभोक्ता दोनों को नुकसान होता है। एपीएमसी की कमियों के कारण किसानों का शोषण होता है। उसे दूर किया जा सकता था, लेकिन कंपनियों को फायदा पंहुचाने के लिए खरीद का अधिकार निजी हाथों में दिया जा रहा है। जिसमें किसान अपनी उपज बेचने का अधिकार खो देगा। ठेका खेती कानून में कहने को किसान खेत का मालिक होगा लेकिन खेती करने और उत्पाद बेचने का अधिकार कंपनी का होगा। योगेंद्र यादव ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा खेती किसानी की बुनियादी व्यवस्था बदलने की साजिश की जा रही है। इसलिए AIKSCC और स्वराज इंडिया और जय किसान आंदोलन के साथी आज देश भर में 9 सुत्री माँग को लेकर विरोध कर रहें है।

‘कॉरपोरेट भगाओ-किसानी बचाओं’ नारे के हुए इस आंदोलन में किसान संगठनों की 9 प्रमुख मांगे हैं। (1) कर्जा मुक्ति– शुरुआत में सरकार इस साल कोरोना दौर के लिए सभी किसानों की रबी फसल का कर्ज माफ करे और खरीफ, फसल के लिए केसीसी जारी करे। (2) पूरा दाम– प्रत्येक फसल, सब्जी, फल और दूध का एमएसपी कम से कम सी-2 लागत से 50 फीसदी अधिक घोषित हो । (3) दिनांक 03 जून 2020 को जारी तीनों किसान विरोधी अध्यादेश रद्द हों। (4) डीजल का रेट आधा किया जाए। (5) विद्युत संशोधन विधेयक 2020 को वापस लिया जाए। (6) इस साल किसान को हुए नुकसान की भरपाई की जाए। (7) इस साल मनरेगा के तहत काम की गारंटी को बढ़ाकर 200 दिन की जाए। (8) कोरोना संकट के पूरे दौर में सरकार हर व्यक्ति को पूरा राशन उपलब्ध कराए। (9) देश में किसानों-आदिवासियों की खेती की जमीन कंपनियों को देने पर रोक लगायी जाए।

 

पटना में ट्रेड यूनियन का संयुक्त प्रदर्शन

बिहार की राजधानी पटना में गोलम्बर से डाकबंगला चौक तक केंद्रीय ट्रेड यूनियन से जुड़े श्रमिक संघ ऐक्टू एटक, सीटू, इंटक, एआईयूटीयूसी, यूटीयूसी, टीयूसीसी और एआईएमयू के संयुक्त बैनर तले विरोध प्रदर्शन निकाला गया जो डाकबंगला चौक तक गया, जहां नेताओं ने सभा का संबोधित किया।

राजधानी पटना में हुए प्रदर्शन का नेतृत्व ट्रेड यूनियन नेता आरएन ठाकुर, रणविजय कुमार, धीरेंद्र झा, शशि यादव, रामबली प्रसाद, गजनफर नवाब, गणेश शंकर सिंह, अरुण मिश्र, चंद्रप्रकाश सिंह, सूर्यकर जितेंद्र, अनामिका, वीरेंद्र ठाकुर, अनिल शर्मा, नृपेन कृष्ण महतो आदि नेता कर रहे थे।

डाकबंगला चौक पर हुई सभा का सम्बोधित करते हुए मजदूर नेताओं ने मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ को धोखा और भारत को बेचने का नुस्खा बताया। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार द्वारा देश में कॉरपोरेट राज और तानाशाही थोपे जाने के खिलाफ आज आजादी की विरासत को यानी देश को बचाने का सबसे महत्वपूर्ण कार्यभार मजदूरों के समक्ष दरपेश है। नेताओं ने जनता का भारत बनाने के लिये संघर्ष के लिये सभी को एक होने का आह्वान किया।

मजदूर नेताओं ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण और राष्ट्रीय परिसंपत्तियों को कार्पोरेटों को सौंपने की मुहिम पर रोक लगाई जाए, आदिवासी समुदायों को जल-जंगल-जमीन-खनिज पर हक़ दिया जाए और विकास के नाम पर उन्हें विस्थापित करना बंद किया जाए, मनरेगा की मजदूरी 600 रुपये मजदूरी दी जाए, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को सार्वभौमिक बनाया जाए।

ऐक्टू के राष्ट्रीय सचिव रणविजय कुमार ने बताया कि आशा कार्यकर्ता संघ, विद्यालय रसोइया संघ, स्थानीय निकाय कर्मचारी महासंघ, बिहार राज्य निर्माण मजदूर यूनियन व अन्य स्थानीय संघों ने राज्य भर में खासकर दरभंगा, मोतिहारी, बेतिया, मुजफ्फरपुर, हाजीपुर, समस्तीपुर, गोपालगंज, सहरसा, सुपौल, सीतामढ़ी, मधेपुरा, बेगूसराय, भगलपुर, मुंगेर, जमुई, नालन्दा, नवादा, जहानाबाद, गया, डेहरी-ऑन-सोन, भोजपुर, बक्सर आदि जिलों में मोदी राज में जारी ‘देश बेचो अभियान’ के खिलाफ जेल भरो अभियान चलाया गया।

वहीं इंडियन रेलवे एम्प्लोयी फेडरेशन से जुड़े ईस्टर्न रेलवे एम्प्लोयी यूनियन (ईसीआरयू) के दर्जनों सदस्यों ने अलग से पटना जंक्शन परिसर में रेल इंजन के पास रेलवे को बेचने के खिलाफ ‘रेल बचाओ’ नारे के  साथ प्रदर्शन किया ।

 

छत्तीसगढ़ में 25 किसान संगठनों ने किया विरोध प्रदर्शन

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति, भूमि अधिकार आंदोलन और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के देशव्यापी आह्वान पर छत्तीसगढ़ में भी राजनांदगांव, बस्तर, धमतरी, बिलासपुर, दुर्ग, कोरबा, सरगुजा, बलरामपुर, रायपुर, महासमुंद, रायगढ़, चांपा-जांजगीर, सूरजपुर, मरवाही, कांकेर और गरियाबंद जिलों के अनेकों गांवों, खेत-खलिहानों और मनरेगा स्थलों में केंद्र में मोदी सरकार की मजदूर-किसान विरोधी और कॉर्पोरेटपरस्त नीतियों के खिलाफ जबरदस्त विरोध प्रदर्शन आयोजित किये गए।

विरोध प्रदर्शन में छत्तीसगढ़ किसान सभा, आदिवासी एकता महासभा, छग प्रगतिशील किसान संगठन, राजनांदगांव जिला किसान संघ, क्रांतिकारी किसान सभा, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन, छमुमो मजदूर कार्यकर्ता समिति, हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति, छग किसान-मजदूर महासंघ, दलित-आदिवासी मंच, छग किसान महासभा, छग प्रदेश किसान सभा, किसान जन जागरण मंच, किसान-मजदूर संघर्ष समिति, जनजाति अधिकार मंच, आंचलिक किसान संगठन, परलकोट किसान संघ, राष्ट्रीय किसान मोर्चा और किसान महापंचायत आदि संगठनों शामिल थे।

किसान नेता संजय पराते, विजय भाई, आई के वर्मा, सुदेश टीकम, आलोक शुक्ला, केशव सोरी, ऋषि गुप्ता, राजकुमार गुप्ता, प्रशांत झा, कृष्णकुमार, संतोष यादव, पारसनाथ साहू, हरकेश दुबे, लंबोदर साव, बालसिंह, अयोध्या प्रसाद रजवाड़े, सुखरंजन नंदी, जवाहर सिंह कंवर, राजिम केतवास, अनिल शर्मा, नरोत्तम शर्मा, तेजराम विद्रोही, सुरेश यादव, कपिल पैकरा, पवित्र घोष, सोनकुंवर और नंद किशोर बिस्वाल के नेतृत्व ने जगह जगह किसानों- मजदूरों ने विरोध प्रदर्शन किया।

किसान नेताओं ने कहा कि कृषि क्षेत्र में जो परिवर्तन किए गए हैं, उसने कृषि व्यापार करने वाली देशी-विदेशी कॉर्पोरेट कंपनियों और बड़े आढ़तियों द्वारा किसानों को लूटे जाने का रास्ता साफ कर दिया है और वे समर्थन मूल्य की व्यवस्था से भी बाहर हो जाएंगे। बीज और खाद्यान्न सुरक्षा व आत्मनिर्भरता भी खत्म हो जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार आत्मनिर्भरता के नाम पर देश के प्राकृतिक संसाधनों और धरोहरों को चंद कारपोरेट घरानों को बेच रही है। उनका कहना है कि ग्राम सभा के अधिकारों की पूरी नज़रअंदाजी से देश में और विस्थापन बढ़ेगा, स्वास्थ्य पर गहरा असर होगा और पर्यावरण और जंगलों की क्षति भी होगी।

किसान आंदोलन के नेताओं ने प्रदेश में बढ़ती भुखमरी की समस्या पर भी अपनी आवाज़ बुलंद की है। उनका आरोप है कि प्रवासी मजदूरों मुफ्त चावल वितरण के लिए केंद्र द्वारा आबंटित अपर्याप्त आबंटन का भी उठाव राज्य सरकार ने नहीं किया है। कोरोना बहुत तेजी से फैल रहा है, लेकिन इसी अनुपात में स्वास्थ्य सुविधाएं लोगों तक नहीं पहुंच रही है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस सरकार भी बोधघाट परियोजना और कोयला खदानों के व्यावसायिक खनन की स्वकृति देकर आदिवासियों के विस्थापन की राह खोल रही है।

AIPF ने मनाया लोकतंत्र बचाओ दिवस

ऑल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट व सहमना संगठनों द्वारा उत्तर प्रदेश, तमिलनाडू, झारखंड़, उडीसा, कर्नाटक व महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में लोकतंत्र बचाओ दिवस मनाया गया। कनार्टक में आइपीएफ नेता राधवेन्द्र कुस्तगी, झारखण्ड़ में हफीर्जुरहमानव मधु सोरेन, तमिलनाडु में पाडियन के नेतृत्व में कार्यक्रम हुआ।

ऑल इंण्डिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता व पूर्व आईजी एस. आर. दारापुरी ने बताया कि लोकतंत्र बचाओ दिवस के इस कार्यक्रम में मूलतः रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य के अधिकार की गारंटी, राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं की रिहाई व उनके उत्पीड़न पर रोक लगाने, काले कानूनों का खत्मा, इनकम टैक्स न देने वाले हर परिवार को पांच हजार रूपए नगद, कोविड मरीजों का मुफ्त इलाज, 181 महिला वूमेन हेल्पलाइन व महिला समाख्या के बकाए वेतन का भुगतान व कार्यक्रमों की बहाली, वनाधिकार के तहत पट्टा, कोल व धांगर को आदिवासी का दर्जा, पर्यावरण की रक्षा, निजीकरण और श्रमिक अधिकारों के खात्मे पर रोक, किसानों को डेढ गुना दाम व कर्जा मुक्ति के लिए कानून, सहकारी खेती की मजबूती, आंगनबाड़ी, आशा, ठेका मजदूरों समेत सभी मजदूरों को सम्ममानजनक वेतन आदि सवालों को उठाया गया।

एसआर दारापुरी ने बताया कि उत्तर प्रदेश के सीतापुर में मजदूर किसान मंच के महासचिव डा0 बृज बिहारी व आइपीएफ नेता सुनीला रावत, लखीमपुर खीरी में पूर्व सीएमओ डा0 बी. आर. गौतम, वाराणसी में आइपीएफ जिला संयोजक योगीराज सिंह पटेल, सोनभद्र में आइपीएफ जिला संयोजक कांता कोल, मजदूर किसान मंच के जिला महासचिव चर्चित उभ्भा गांव निवासी राजेन्द्र सिंह गोंड़, ठेका मजदूर यूनियन के जिलाध्यक्ष कृपाशंकर पनिका, मजदूर किसान मंच जिलाध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद गोंड़, चंदौली में मजदूर किसान मंच नेता अजय राय, इलाहाबाद में युवा मंच संयोजक राजेश सचान, आगरा में वर्कर्स फ्रंट उपाध्यक्ष ई0 दुर्गा प्रसाद, गोण्डा में मोहम्मद शाबिर अजीजी व आरिफ, बस्ती में राजनारायण मिश्रा के नेतृत्व में लोकतंत्र बचाओ दिवस मनाया गया।

लखनऊ में कर्मचारी संघ महिला समाख्या की प्रदेश अध्यक्ष प्रीती श्रीवास्तव व शगुफ्ता यासमीन, चित्रकूट में संघ की महामंत्री सुनीता, श्रवास्ती में इंदु गौतम, 181 वूमेन हेल्पलाइन की नेता पूजा पांड़ेय, बदायूं की नीतू सिंह, गाजीपुर की दीपशीखा व नेहा राय, महाराजगंज अनीता, बहराइच उमी सिंह, वंदना, कुशीनगर में विजय लक्ष्मी सिंह, मऊ में सारिका दूबे, सीतापुर में रामलल्ली पटेल, संत कबीर नगर में रंजना मिश्रा, सुल्तानपुर में सीमा श्रीवास्तव, कोशाम्बी में ज्ञाना यादव, झांसी में वर्षा यादव, मिर्जापुर में प्रियंका तिवारी, देवरिया में मालामनी त्रिपाठी, बिजनौर में खुशबु, बलरामपुर में मंशा देवी ने कार्यक्रमों का नेतृत्व किया।