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पोदिया-गुड्डी पेड़ काटने का विरोध कर रहे थे, पुलिस ने नक्‍सली कह कर मार दिया!

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महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में एक मुठभेड़ में दो ‘नक्सलियों’ के मारे जाने की खबर को सभी अख़बारों और मीडिया ने प्रमुखता से प्रकाशित किया. किन्तु मारे गये युवक कौन थे इसकी पड़ताल किसी ने नहीं की. इस खबर की पड़ताल करते हुए दो फेसबुक प्रतिक्रियाएं महत्वपूर्ण हैं. 

इस खबर के प्रकाशित होने के बाद सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है:

“कल रात पोदिया और उसके साथी को पुलिस ने गोली से उड़ा दिया. यह दोनों आदिवासी युवा छत्तीसगढ़ के बैलाडीला में अडाणी का विरोध कर रहे थे. इससे पहले इनके साथी गुड्डी को भी पुलिस ने गोली से उड़ा दिया था. गुड्डी ने अडाणी के लोगों द्वारा पेड़ काटना बंद करवा दिया था.अडाणी ने बैलाडीला की नंद राज पहाड़ी पर 2000 पेड़ काट डाले थे. गुड्डी ने पेड़ काटने वाले लोगों को वहां से भगा दिया था. इसके बाद पुलिस ने जाकर गुड्डी को गोली से उड़ा दिया. सोनी सोरी जब दंतेवाड़ा के एसपी अभिषेक पल्लव से मिलने गई तभी अभिषेक पल्लव ने कह दिया था कि मैं गुड्डी के साथी पोदिया को भी गोली से उड़ा दूंगा. सोनी सोरी ने फ्रंटलाइन की महिला पत्रकार को पहले ही बता दिया था कि एसपी अब पोदिया की हत्या करेगा और कल रात एसपी ने पोदिया को गोली से उड़वा दिया.”

वहीं वरिष्ठ पत्रकार जितेन्द्र कुमार ने भी इस खबर पर अपनी प्रतिक्रिया दी है:

वे नक्सली नहीं, अडाणी से अपना जंगल, जमीन बचा रहे थे, नक्सली कहकर मार डाले गए

इंडियन एक्सप्रेस अखबार के खबर के अनुसार ये माओवादी गढ़चिरौली जिले के धनौरा तहसील में कैंप किए हुए थे। जब पुलिस ने उन्‍हें ललकारा तो माओवादियों ने पुलिस पर हमला कर दिया। बाद में पुलिस को जवाबी कार्यवाही करनी पड़ी जिसमें एक पुरुष व एक महिला माओवादी घटना स्थल पर ही मारे गए।

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लेकिन सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। सच्चाई यह है कि मारे जाने वाले पुरुष ’नक्सली’ का नाम पोदिया था और महिला ‘नक्सली’ गुड्डी थी। ये दोनों आदिवासी छत्तीसगढ़ के बैलाडीला में अडाणी के परियोजना का विरोध कर रहे थे। इन लोगों ने स्थानीय आदिवासियों के साथ मिलकर अडाणी को पेड़ काटने से रोक दिया था। अडाणी ग्रुप ने बैलाडीला की नंदराज पहाड़ी पर हजारों पेड़ कटवा डाले थे।

हम कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में अब कांग्रेस की सरकार है, आदिवासियों के प्रति उनकी सहानुभूति है। लेकिन देखिए विकास के नाम पर कौन मारे जा रहे हैं! इसी तरह उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार लगातार दलितों और पिछड़ों का फर्जी मुठभेड़ कर रही है। फर्जी मुठभेड़ में सबसे ज्यादा अतिपिछड़े, कुर्मियों और पालों की हत्या हुई है जो आज के दिन बीजेपी का कोर वोटर बन गया है लेकिन इन जातियों के नेता योगी सरकार में मंत्री हैं, उन्हें अपनी जाति के लोगों से कुछ लेना-देना ही नहीं है।

याद कीजिए आज से तीस,चालीस,पचास साल पहले इस तरह की जब भी कोई घटना होती थी बिहार में कर्पूरी ठाकुर या फिर उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव जैसे नेता इस तरह के फर्जी हत्याओं को जोर-शोर से उठाते थे। इसी तरह के मामलों को उठाकर वे दलितों-पिछड़ों के नेता बने थे। यह किसी से छुपा नहीं है कि कोई भी इंसान बागी क्यों बनता है! या तो उनके उपर सामंती जुल्म हुए होते हैं, सामन्तों ने पुलिस प्रशासन ये मिलकर गरीबों-मजलूमों व दलित-पिछड़ों पर जुल्म ढ़ाते हैं और न्याय न मिलने पर अधिकांश स्वाभिमानी व्यक्ति ‘विद्रोही’ बन जाते हैं।

कर्पूरी ठाकुर तो अब नहीं रहे लेकिन वर्षों तक सत्ता सुख भोग चुके मुलायम सिंह यादव खामोश हैं, मुलायम सिंह का बेटा अखिलेश भी खामोश है, मायावती के बारे में तो पता नहीं कि वह अब किसकी राजनीति कर रही हैं, इसलिए वह भी खामोश है। आम जनता का कहीं नक्सली के नाम पर, कहीं गौ तस्कर के नाम पर, कहीं बच्चा चोर के नाम पर,कहीं डायन के नाम पर तो हर पल हत्या की जा रही है।

प्रतिपक्षी नेता खुद के या अपने बाप-दादाओं द्वारा किए गए भ्रष्टाचार में अकूत बनाए पैसे गिन रहे हैं, या इस डर से चुप बैठे हैं कि कहीं आईडी या सीबीआई को उसके पीछे न लगा दे। भ्रष्ट व मरे हुए विपक्ष से जनता को राहत नहीं मिलने वाली है। डर इस बात का है कि अगर जनता बगावत पर उतर आए तब क्या होगा? क्या हुक्मरान व प्रशासन तब कुछ करने की स्थिति में होगा।

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