बीजेपी में जितिन प्रसाद: अखिलेश से नहीं बनी बात या ई.डी का घात?


जितिन प्रसाद आम कांग्रेसियों की नज़र में लंबे  समय से संदिग्ध चल रहे थे। उनका जाना बीजेपी को कितना फायदा पहुँचायेगा, ये तो भविष्य की बात है, लेकिन कांग्रेस के नेताओं की भंगिमा बताती है कि उन्हें इसका कोई नुकसान नज़र नहीं आता।


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आख़िर जितिन प्रसाद ने बीजेपी ज्वाइन कर ही ली। यह ऐसी ख़बर है जिसका पिछले लोकसभा चुनाव से ही इंतज़ार हो रहा था। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले चर्चा थी कि वे बीजेपी का दामन थाम सकते हैं, लेकिन उस समय बात नहीं बनी लेकिन उनका रुख संदिग्ध हो गया था। हाल ही में उनके अखिलेश यादव से भी मिलने की चर्चा राजनीतिक गलियारों में थी।

जितिन प्रसाद की कांग्रेस में हैसियत का ये आलम हो गया था कि बीते दिनों जब उन्होंने कांग्रेस के असंतुष्ट जी-23 नेताओं के सोनिया गांधी को लिखे पत्र पर हस्ताक्षर किये थे तो लखीमपुर खीरी की कांग्रेस जिला इकाई ने बाकायदा उनके खिलाफ़ प्रस्ताव पारित किया था कि उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जाये।

सूत्रों के मुताबिक जितिन प्रसाद ने तब कुछ बड़े नेताओं को मध्यस्थ बनाकर नेतृत्व से माफ़ी मांगी थी और कहा था कि वे कांग्रेस संगठन में जिम्मेदारी चाहते हैं। इसके बाद जितिन प्रसाद बंगाल के प्रभारी बनाए गए जहाँ का रिजल्ट पार्टी के लिए जीरो रहा। ज़ाहिर है, वे बंगाल में कांग्रेस को मज़बूत करने के बजाय बीजेपी के नेताओं को साधने में जुटे थे।

लखनऊ के सत्ता के गलियारों में यह चर्चा आम है कि पिछले दिनों जितिन प्रसाद  ने अखिलेश यादव से मुलाकात की थी, लेकिन अखिलेश यादव ने उन्हें समाजवादी पार्टी में लेने के पक्ष में नहीं थे। खुद कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमाल लल्लू ने यह बात मीडिया से कही थी।  जितिन पिछले दिनों ब्राह्मण चेतना परिषद के जरिये अपनी नयी हैसियत बनाने में जुटे थे, लेकिन अखिलेश की नज़र में इसका कोई मोल नहीं थी।

जितिन प्रसाद, कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जीतेंद्र प्रसाद के बेटे हैं जिन पर यूपी में कांग्रेस को बर्बाद करने की तोहमत है। उन्होंने बीएसपी से समझौता करके विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए सिर्फ 125 सीटें ली थीं, जिसके बाद कांग्रेस का पतन होता चला गया। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में सोनिया गाँधी का खुलकर विरोध किया था। इसके बावजूद कांग्रेस ने उन्हें केंद्र में मंत्री बनाया। बहरहाल,  2014 से लगातार जितिन प्रसाद को अपनी लखीमपुर खीरी की धौरहरा सीट पर हारते आ रहे हैं।  2014 में जितिन प्रसाद लोकसभा का चुनाव हारे। फिर 2017 का विधानसभा। पिछली लोकसभा में बीजेपी से बात नहीं बनी तो वे कांग्रेसी उम्मीदवार के बतौर चुनावी मैदान में उतरे और तीसरे नम्बर पर रहे। इतने सब कुछ के बाद कांग्रेस ने उन्हें बंगाल का प्रभारी बनाया था। जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि बीते पंचायत में जितिन प्रसाद अपने क्षेत्र में अपने उम्मीदवार को हज़ार वोट भी नहीं दिला पाए।

इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के नेता रहे विश्वनाथ चतुर्वेदी उर्फ मोहन ने एक दिलचस्प बात फेसबुक पर अपनी टिप्पणी में लिखी है। उन्होंने लिखा है कि इसके पीछे प्रवर्तन निदेशालय की जाँच भी है। पढ़िये क्या लिखा है विश्वनाथ चतुर्वेदी ने-

ज़ितिन प्रसाद के @BJP4India ज्वाइनिंग में @dir_ed ने निभाई अहम भूमिका,मोईन कुरेशी हवाला केस में अनेको बार डायरी में ज़ितिन से लेन देन का ज़िक्र मीडिया की सुर्खियों में रहा है,इसी दबाव में @BJP4India की वाशिग मशीन से क्लीन होना आवश्यक हो गया था, रही बात ब्राह्मण की तो इन्हेंराज्य में कोई ब्राह्मण नही मानता,इनकी चार पुश्तों में कोई रिश्तेदारी ब्राह्मण परिवार में नही हुई,इनके स्व: पिता जितेंद्र प्रसाद के कारण ही UP में @BJP4India को पाव पसारने का मौक़ा मिला ९० में मुलायम की सरकार से भाजपा द्वारा समर्थनवापिस लेने के बाद तत्कालीन नेता विरोधी दल NDतिवारी को बिना विश्वास में लिए दिल्ली में साज़िस कर मुलायम को समर्थन दिलाने का कार्य इन्ही के पिता ने किया 95 में 300सीटें BSP को देकर मात्र 125 सीटों पर समझौता और SP-BSP सरकार से समर्थन वापसी का PCC द्वारा सामूहिक प्रस्ताव पास किए जाने के बाद षड्यन्त्र कर समर्थन वापसी न होने देना इन्ही की देन रही 2000 में सोनिया जी के ख़िलाफ़ अध्यक्ष का नामांकन कर चुनाव लड़ना और PCC मुख्यालय में वोट डालने गयीं सोनिया जी पर पथराव और मुरादाबाद के नारे लगवाना,इनकी ही करतूत थी,लखनऊ के नेशनल हेरल्ड का संपत्तियाँ कौड़ियों के भाव बेचने के बाद PCC का सौदा सहारा के साथ हो गया था,उसे मोहसिना किदवई जी ने मुझे अनसन पर बिठा ND तिवारी को लेकर दिल्ली आइ और सोनिया जी से मिलकर उस सौदे को रद्द कराया,आलाकमान इन गुस्ताखियो के बाद भी इस परिवार को प्रमोट करता रहा,आज इनके जाने से कांग्रेस की गंदगी साफ़ हुई है।
साफ़ है, कि जितिन प्रसाद आम कांग्रेसियों की नज़र में लंबे  समय से संदिग्ध चल रहे थे। उनका जाना बीजेपी को कितना फायदा पहुँचायेगा, ये तो भविष्य की बात है, लेकिन कांग्रेस के नेताओं की भंगिमा बताती है कि उन्हें इसका कोई नुकसान नज़र नहीं आता।

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