सुशांत केस: बॉम्बे हाईकोर्ट ने अर्णव रिपब्लिक को लताड़ा, कहा-फ़ैसला चैनल करेगा तो जज क्या करेंगे?


रिपब्लिक ने ट्विटर पर #ArrestRhea अभियान चलाया था और रिया गिरफ़्तार भी हुई थीं जबकि वह हफ्ते भर पहले ही सुशांत का घर छोड़ चुकी थीं। एम्स की फॉरेंसिक जाँच में भी सुशांत की मौत को आत्महत्या बताया गया है। इसी के संदर्भ में खंडपीठ ने चैनल से पूछा- “क्या जनता से किसी की गिरफ़्तारी के बारे में पूछना, खोजी पत्रकारिता का हिस्सा है? जब हत्या या आत्महत्या को लेकर जाँच चल रही है चैनल का इसे हत्या बताना कैसे खोजी पत्रकारिता है?”


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न्यूज़ चैनलों पर बढ़ते मीडिया ट्रायल की प्रवृत्ति पर गहरी बॉम्बे हाईकोर्ट ने गहरी चिंता जतायी है। सुशांत सिंह राजपूत की मौत की कवरेज से जुड़ी एक याचिका पर सुनवायी करते हुए हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने कहा कि अगर फ़ैसला टीवी चैनल ही करने लगे तो फिर अदालतों की ज़रूरत क्या है।

सुशांत सिंह राजपूत मामले की रिपोर्टिंग को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने अर्णव गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी को जमकर लताड़ लगायी है। हाईकोर्ट ने पूछा है कि किसी को बिना जाँच के हत्यारा घोषित करना कैसी खोजी पत्रकारिता है? अगर चैनल ही फै़सला करेंगे तो फिर अदालत की ज़रूरत ही क्या है।

ग़ौरतलब है कि रिपब्लिक टीवी ने सुशांत सिंह राजपूत की मौत को हत्या बताते हुए उनकी अभिनेत्री दोस्त रिया चक्रवर्ती की गिरफ़्तारी का अभियान चलाया था। इस सिलसिले में चैनल ने बॉलीवुड की तमाम अन्य हस्तियों को भी निशाने पर लिया था। अदालत ने मीडिया ट्रायल की इस बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ी आपत्ति जतायी है।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को इस संबंध में दायर जनहित याचिका की सुनवाई की। बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जी.एस.कुलकर्णी की खंडपीठ ने रिपब्लिक टीवी की वकील मालविका त्रिवेदी से कई असहज करने वाले सवाल पूछे। अदालत ने पूछा- यदि आप जाँचकर्ता, अभियोजक और न्यायाधीश बन गये हैं तो हमारा क्या उपयोग है? हम यहाँ क्यों हैं?

वकील मालविका त्रिवेदी की दलील थी कि चैनल खोजी पत्रकारिता कर रहा था और जाँच में बरती जा रही गड़बड़ियो की ओर इशारा कर रहा था। मालविका ने कहा कि अदालत यह नहीं कह सकती कि मीडिया को जाँच में दोष को इंगित नहीं करना चाहिए या सच्चाई को रिपोर्ट नहीं करना चाहिए। लेकिन अदालत सहमत नहीं हुई। खंडपीठ ने कहा- “अगर आपको सच जानने में इतनी दिलचस्पी है तो “आपको सीआरपीसी पर ध्यान देना चाहिए। क़ानून की अनदेखी कोई बहाना नहीं है।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि वो मीडिया कि आज़ादी का सम्मान करती है और मीडिया का गला दबाने का सुझाव नहीं दे रही है। अदालत केवल वह केवल यह देख रही है कि रिपोर्टिंग के दौरान प्रोग्राम कोड का उल्लंघन तो नहीं किया गया? रिपोर्टिंग निर्धारित मानदंडों में किसी का उल्लंघन करती है या नहीं? रिपोर्टिंग के संबंध में तय सीमाओं को लाँघा नहीं जा सकता।

रिपब्लिक ने ट्विटर पर #ArrestRhea अभियान चलाया था और रिया गिरफ़्तार भी हुई थीं जबकि वह हफ्ते भर पहले ही सुशांत का घर छोड़ चुकी थीं। एम्स की फॉरेंसिक जाँच में भी सुशांत की मौत को आत्महत्या बताया गया है। इसी के संदर्भ में खंडपीठ ने चैनल से पूछा- “क्या जनता से किसी की गिरफ़्तारी के बारे में पूछना, खोजी पत्रकारिता का हिस्सा है? जब हत्या या आत्महत्या को लेकर जाँच चल रही है चैनल का इसे हत्या बताना कैसे खोजी पत्रकारिता है?”

पीठ ने चैनल के वकील को याद दिलाया कि सीआरपीसी के तहत पुलिस को जाँच की शक्तियाँ दी गयी हैं। “आत्महत्या की रिपोर्टिंग के कुछ दिशानिर्देश हैं। कोई सनसनीखे़ज़ सुर्खियाँ नहीं बनायी जानी चाहिए। क्या आपके मन में मृतकों के लिए कोई सम्मान नहीं है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है”- अदालत ने कहा।

उधर, टाइम्स नाऊ की ओर से पेश वकील कुणाल टंडन ने आग्रय किया कि अदालत मीडिया के लिए तय स्व-नियमन के मॉडल में हस्तक्षेप न करे। कोर्ट ने आज तक, इंडिया टीवी, ज़ी न्यूज़ और एबीपी न्यूज़ के वकीलों को भी सुना। अदालत ने कहा कि “व्यथित व्यक्ति को निवारण तंत्र के पास जाने का विकल्प तभी मिलता है जब नुकसान हो चुका होता है। क्षति होने के बाद न्याय कैसे मिलेगा?”

इस मामले की अगली सुनवाई 23 अक्टूबर को होगी।

 


 


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