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दिल्ली: नो बेड! नो बेड! नो बेड!…और बग़ैर इलाज दम तोड़ दिया बुज़ुर्ग ने!

जब कहीं से भी मदद की कोई गुंजाइश नहीं दिख रही थी तो मेरी पत्नी ने ट्विटर का सहारा लिया. उसने ट्विटर पर अपने पिता को किसी भी अस्पताल में दाखिल करवाने के लिए मदद की गुहार लगाई. एक राजनेता के अतिरिक्त कई और लोगों ने भी उनके ट्वीट के जवाब दिए. अधिकांश लोगों की यही सलाह थी कि क्योंकि मेरे श्वसुर का बुखार 101 से कम चल रहा है इसलिए उन्हें अस्पताल में दाखिल करवाने की कोई ज़रुरत नहीं है. इन जवाबों से हमें कोई तसल्ली नहीं मिली मगर हम लाचार थे. कोई अस्पताल उन्हें दाखिल नहीं कर रहा था. 

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बृहस्पतिवार, दिनांक 4 जून को दिल्ली की अमरप्रीत ने अपने ट्विटर पर लिखा, “मेरे पिता को तेज़ बुखार है. हमें उन्हें अस्पताल में दाखिल करवाना है. मैं दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल के बाहर खड़ी हूँ. उन्हें कोरोना, तेज़ बुखार और सांस लेने में तकलीफ है. बिना मदद के वे जिंदा न बचेगें. कृपया मदद करें.” थोड़ी ही देर में उनके पिता की मृत्यु हो गई.

इससे पहले भी अमरप्रीत लगातार मदद के लिए ट्वीट कर रहीं थी. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, स्वास्थ्यमंत्री सत्येंद्र जैन को टैग भी कर रही थीं।

इस सारे घटनाक्रम को पति अमरप्रीत के पति मंदीप सिंह ने मीडिया से साझा किया है. उनका बयान सरकार और अस्पतालों की कोरोना-संकट और संक्रमित मरीजों के प्रति संवेदनशीलता की कलई खोल रहा है.

“26 मई को 67 वर्षीय मेरे श्वसुर को हल्का बुखार हुआ. जब अगले दो दिनों तक भी उनका बुखार कम नहीं हुआ तो किसी अस्पताल में जाने का जोखिम उठाने की बजाय हमने ऑनलाइन परामर्श लेना उचित समझा. मेरे श्वसुर अस्थमा के मरीज़ थे. 29 मई को हमने एक प्रतिष्ठित ऑनलाइन चिकित्सा एजेंसी से बातचीत की. डॉक्टर ने तीन दिन के लिए कुछ दवाइयां बताईं और सलाह दी कि इन दवाइयों को लेने के बाद भी अगर बुखार कम नहीं होता तो हमें उनका कोरोना टेस्ट भी करवा लेना चाहिए. 

हालांकि बुखार सिर्फ 100 डिग्री फारेनहाईट ही था, पर दवा लेने के बावजूद भी कम नहीं हो रहा था. 31 मई को हम उन्हें गंगाराम अस्पताल ले गए. एक्सरे-जांच से पता लगा कि उनकी छाती में इन्फेक्शन है. कोविड टेस्ट के लिए भी सेम्पल ले लिया गया. अस्पताल प्रशासन ने कहा कि परीक्षण का परिणाम ऑनलाइन ज्ञात हो जाएगा. हमें यह भी कहा गया कि अगर परीक्षण का परिणाम पोज़िटिव आया तो अस्पताल हमसे सम्पर्क करेगा. 

जिस दिन हम टेस्ट करवाने गए उस दिन भारी बारिश हो रही थी. प्रतीक्षा के लिए साफ़-सुथरी ओट वाली जगह भी नहीं थी और हमारा मरीज़ भी भीग कर तरबतर हो गया.  

1 जून को जब हमने उनकी रिपोर्ट डाउनलोड की तो हमें पता लगा कि वे कोरोना पोज़िटिव हैं. बस उसके बाद हमारा मुश्किल वक़्त शुरू हो गया. गंगाराम अस्पताल ने रिपोर्ट पोज़िटिव आने पर खुद से ही सम्पर्क करने को कहा था पर उनकी तरफ से हमें कोई सन्देश नहीं मिला. अब हमें क्या करना है, यह जानने के लिए जब हमने अस्पताल में फ़ोन किये तो कोई जवाब नहीं मिला.  

निराश होकर हमने उन अस्पतालों से सम्पर्क करना आरम्भ किया जिनके बारे में हमें पता था कि वहां कोरोना से संक्रमित मरीजों को भर्ती किया जा रहा है. हमने मैक्स, अपोलो, एम्स, सफदरजंग में फोन किये – सभी ने हमें यही जवाब दिया कि मरीज़ को यहाँ मत लाइये क्योंकि बेड उपलब्ध नहीं है. 

जब कोई भी अस्पताल मेरे श्वसुर को भर्ती करने के लिए तैयार नहीं हुआ तो हमने अपने परिचित डॉक्टरों से सम्पर्क करना शुरू किया. इनमे से एक डॉक्टर किसी अस्पताल में कोरोना मरीजों का इलाज़ भी कर रहे थे. जब उन्हें हमारी हालत के बारे में पता लगा तो वह बेहद हैरान हुए. उनके मुताबिक रिपोर्ट पोज़िटिव आने के बाद अगर गंगाराम अस्पताल के पास बेड उपलब्ध भी नहीं थे तो उन्हें तुरंत मरीज़ को किसी दूसरे अस्पताल में रेफर करना चाहिए था. 

खैर, कोविड के मरीजों का इलाज़ करने वाले डॉक्टरों से सलाह कर हमने मेरे श्वसुर को दवा देना शुरू कर दिया. गंगाराम अस्पताल, जहाँ हमने सभी प्रकार के प्रारंभिक टेस्ट कराये थे, ने हमारे फोन का जवाब देना ही बिल्कुल बंद कर दिया था. 

जब हमें लगा कि अस्पतालों से कोई मदद नहीं मिलने वाली तो हमने सरकारी हेल्पलाइनों से सम्पर्क करना शुरू किया. सबसे पहले हमने केंद्र सरकार की कोविड हेल्पलाइन को फोन लगाया. इस नंबर पर जिस व्यक्ति ने फोन उठाया तो उसने हमें कहा कि हमें दिल्ली की हेल्पलाइन से सम्पर्क करना होगा. उसने हमें कुछ फोन नंबर देते हुए कहा कि इससे ज्यादा वह हमारी कोई और मदद नहीं कर सकता. हमने दिल्ली सरकार की हेल्पलाइन से सम्पर्क करना शुरू किया. जब-जब हमने फोन किया लाइन व्यस्त मिली. 

जब कहीं से भी मदद की कोई गुंजाइश नहीं दिख रही थी तो मेरी पत्नी ने ट्विटर का सहारा लिया. उसने ट्विटर पर अपने पिता को किसी भी अस्पताल में दाखिल करवाने के लिए मदद की गुहार लगाई. एक राजनेता के अतिरिक्त कई और लोगों ने भी उनके ट्वीट के जवाब दिए. अधिकांश लोगों की यही सलाह थी कि क्योंकि मेरे श्वसुर का बुखार 101 से कम चल रहा है इसलिए उन्हें अस्पताल में दाखिल करवाने की कोई ज़रुरत नहीं है. इन जवाबों से हमें कोई तसल्ली नहीं मिली मगर हम लाचार थे. कोई अस्पताल उन्हें दाखिल नहीं कर रहा था. 

बार-बार ट्वीट करने के बावजूद किसी अस्पताल ने कोई उत्तर नहीं दिया. 

न सरकार की ओर से और न ही किसी क्वार्नटीन केंद्र से कोई सलाह मिल पा रही थी. आरोग्य-सेतु एप आसपास से किसी भी प्रकार के एक्सपोजर की सम्भावना को नकार रहा था. हमें बिल्कुल भी समझ नहीं आ रहा था तो हम आखिर करें तो क्या करें. 

3 जून को उनका बुखार बढ़ना शुरू हो गया. अब यह 102 तक पहुँच गया था. एक बार फिर हमने अस्पतालों में फोन लगाने शुरू किये. एक बार फिर वहीँ उत्तर: “यहाँ मत लाइये. हमारे पास बेड नहीं है. हमें आपको वापस भेजना पड़ेगा.”

बृहस्पतिवार को सुबह 5 बजे एक बार फिर उनका बुखार 102 हो गया. हमने डॉक्टरों द्वारा सुझाई दवाइयां उन्हें दीं और फिर अस्पतालों में फोन करना शुरू किया. परिणाम, वही जवाब: बेड नहीं है, बेड नहीं है, बेड नहीं है.

हमने एक बार फिर दिल्ली की कोविड हेल्प लाइन पर फोन किया. इस बार किसी ने फोन उठाया और बताया कि लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में 100 बेड हैं और हमें मरीज़ को वहां ले जाना चाहिए 

हमने मेरे श्वसुर को अपनी कार में बैठाया और करीब 6.:50 बजे हम एल एन जे पी अस्पताल के लिए निकल पड़े. जब हम कोविड ब्लोक में पहुंचे तो डॉक्टर ने हमसे पूछा कि हमने मरीज़ का टेस्ट कब और कहाँ करवाया था. हमने उन्हें सारी जानकारी देते हुए यह भी बताया कि वे अस्थमा के मरीज़ हैं. डॉक्टर बार-बार यही कहता रहा कि क्योंकि उनका टेस्ट गंगाराम में हुआ है इसलिए हम उन्हें वहीँ ले जायें. पहले से ही बेहद बीमार मेरे श्वसुर अस्पताल के आपातकालीन वार्ड के ठीक सामने कार में बैठे रहे.

जब हम कार तक वापस पहुंचे तो मेरे श्वसुर बैठ नहीं पा रहे थे और सीट पर गिरकर बेहोश हो गये. हम वापस डॉक्टरों के पास दौड़े और उनसे प्रार्थना की कि मरीज़ बेहोश हो गया है और उसे दाखिल कर लें. डॉक्टर बस यही कहते रहे, “मरीज़ गंगाराम का है, इसे वहीँ ले जाइए.” 

हममें से कोई एक स्ट्रेचर ले आया ताकि उन्हें आराम से लेटाया तो जा सके. इस पर भी एक डॉक्टर ने कहा, “हमारा स्ट्रेचर मत लीजिये और इन्हें उसी अस्पताल में ले जाइये जहाँ इनके सभी टेस्ट हुए थे.” 

हमने पास से गुज़र रहे एक व्यक्ति की मदद से बेहोश मरीज़ को कार से उठाकर स्ट्रेचर पर लेटाया. इस बीच सभी डॉक्टर यही कहते रहे कि इन्हें दूसरे अस्पताल में ले जाइए. हम स्ट्रेचर को खुद ही धकेल कर इमरजेंसी में ले गये. हमारे मरीज़ को किसी ने भी अटेंड नहीं किया.  

हमें जो भी पहला डॉक्टर सामने दिखा हम उसके पांवों में गिर पड़े. हमने हाथ जोड़कर हुए उनसे प्रार्थना की कि वह उन्हें देख लें. उसने कहा कि वह 10 मिनट बाद उन्हें देख लेगा पर इन्हें गंगाराम अस्पताल में ही ले जाना चाहिए था. दस मिनट बाद वही डॉक्टर लौटे और मेरे श्वसुर का परीक्षण किया और कहा कि इन्हें तुरंत ऑक्सीजन की आवश्यकता है. उन्हें ऑक्सीजन पर रखा गया. पन्द्रह मिनट के बाद उनकी मौत हो गई. 

जब हम अस्पताल जा रहे थे तो वे हमसे ठीक-ठाक तरीके से बातचीत कर रहे थे और इस बात से भी थोड़ा सा परेशान नज़र आ रहे थे कि आखिर अस्पताल  पहुंचकर अब कौन सी नई समस्या आने वाली है. इसके कुछ ही घंटों में उनकी मौत हो गई. 

अब एक और इंतज़ार शुरू हुआ. एम्बुलेंस किसी अकेले शव को दाह-संस्कार स्थल पर नहीं ले जाती. नियम यह है कि एक बार में एक साथ चार शवों को ले जाया जाएगा. लग रहा था जैसे शमशान में ले जाने के लिए उनकी देह को कोटा भरने का इंतज़ार करना होगा.   

जिस जीवित व्यक्ति को हम उसके घर से अपनी कार में बैठा कर ले गये थे, आखिरकार कुछ घंटों बाद उसका दाह-संस्कार कर हम सब घर वापस लौट आये.”  

 

यह स्टोरी हफ़पोस्ट में छपी है। साभार प्रकाशित। अनुवाद कुमार मुकेश का है।



 

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