हरियाणा में ‘गोरखधंधा’ बैन, पर यह तो नाथपंथियों का चक्र ‘धंधारी’ है !


‘नाथपंथ: गढ़वाल के परिप्रेक्ष्य में ’ नाम की किताब लिखने वाले विष्णुदत्त कुकरेती ने किताब के एक अध्याय में गोरखपंथी योगियों की वेशभूषा और आहार-विहार पर विस्तार से लिखा है। इसी अध्याय में वह ‘गोरखधंधा’ के बारे में लिखते हैं कि ‘धंधारी एक प्रकार का चक्र है। गोरखपंथी साधू लोहे या लकड़ी की सलाकाओं के हेर-फेर से चक्र बना कर उसके बीच में छेद करते हैं। इस छेद में कौड़ी या मालाकार धागे को डाल देते हैं और फिर मंत्र पढ़कर उसे निकाला करते हैं।


मनोज कुमार सिंह मनोज कुमार सिंह
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हरियाणा सरकार ने अपने आधिकारिक संचार में शब्द ‘गोरख धंधा’ के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है जिसका इस्तेमाल आमतौर पर अनैतिक कृत्यों का वर्णन करने के लिए किया जाता है बुधवार को जारी एक आधिकारिक बयान के अनुसार, गोरखनाथ समुदाय के एक प्रतिनिधिमंडल द्वारा मुलाकात किये जाने के बाद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने इस संबंध में निर्णय लिया

इससे पहले भाजपा ने राजस्थान विधानसभा चुनाव के अपने घोषणा पत्र में तमाम वादों के साथ यह भी वादा किया था कि यदि वह सत्ता में आई तो ‘ गोरखधंधा ’ शब्द को प्रतिबंधित कर दिया जाएगा। घोषणापत्र में यह भी कहा गया था कि ‘ गोरखधंधा ’ शब्द के इस्तेमाल को दंडनीय अपराध बनाया जाएगा।

‘ गोरखधंधा ’ शब्द का आशय लोग आजकल ठगी, जालसाजी से लेते हैं लेकिन कम लोगों को पता है कि गोरखधंधा, नाथ योगियों से जुड़ा हुआ है। दरअसल गोरखपंथी साधू लोहे या लकड़ी एक एक चक्र लिए रहते हैं जिसे धंधारी कहा जाता है। गोरखपंथी साधू इसी धंधारी में कौड़ी या धागे को डालते व बाहर निकालते हैं। लोग उन्हें हैरानी से देखते हैं। इस क्रिया को करने के पीछे यह विश्वास है कि गोरखधंधे से डोरा निकालने से गोरखनाथ की कृपा होती है और वह संसार-चक्र में उलझे प्राणियों को डोरे की भांति भव-जाल से मुक्त कर देते हैं।

‘नाथपंथ: गढ़वाल के परिप्रेक्ष्य में ’ नाम की किताब लिखने वाले विष्णुदत्त कुकरेती ने किताब के एक अध्याय में गोरखपंथी योगियों की वेशभूषा और आहार-विहार पर विस्तार से लिखा है। इसी अध्याय में वह ‘गोरखधंधा’ के बारे में लिखते हैं कि ‘धंधारी एक प्रकार का चक्र है। गोरखपंथी साधू लोहे या लकड़ी की सलाकाओं के हेर-फेर से चक्र बना कर उसके बीच में छेद करते हैं। इस छेद में कौड़ी या मालाकार धागे को डाल देते हैं और फिर मंत्र पढ़कर उसे निकाला करते हैं। बिना क्रिया जाने उस चक्र में से सहसा किसी से डोरा या कौड़ी नहीं निकल पाती। ये चीजें चक्र की सलाकाओं में इस प्रकार उलझ जाती है कि निकलना कठिन पड़ जाता है। जो निकालने की क्रिया जानता है, वह इसे सहज ही निकाल सकता है। यही धंधारी है। लोकभाषा में इसे ‘ गोरखधंधा ’ भी कहते हैं। ’

 

(मनोज सिंह गोरखपुर न्यूज़ लाइन के संपादक और मीडिया विजिल के सलाहकार मंडल के सम्मानित सदस्य हैं।)

 

 


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