गोरखपुर में लड़ाई EVM बनाम योगी की है, इसलिए फूलपुर में केशव मौर्य की प्रतिष्ठा ज्यादा सस्ती है



राजेश वर्मा 

देश पर लम्बे समय तक और अबाध आधिपत्य के लिये महत्वपूर्ण हर चुनाव भाजपा जीतेगी -साम, दाम, दंड और भेद से ही नहीं, ई.वी.एम. मैनीपुलेशन कर के भी- यह नियम है और अपवाद यह कि उपचुनाव वह हारेगी, ताकि ई.वी.एम. इतना डिस्क्रेडिट न हो जाये कि सभी पार्टियां और कांग्रेस भी, ई.वी.एम. से चुनाव का बहिष्कार ही करने लग जायें। चुनावों में जीत की आदत डाल लेने की प्रधान सेवक की नसीहत का मतलब यही था।

सो, त्रिपुरा विधानसभा के असंभव से लगते चुनाव में भाजपा की जीत के बाद उसके लिये बारी अब हार कर ई.वी.एम. को क्रेडिबल बनाने की है। इसलिये मानना चाहिये कि उत्तर प्रदेश की गोरखपुर तथा फूलपुर संसदीय सीटों और बिहार में अररिया लोकसभा सीट तथा भभुआ एवं जहानाबाद विधानसभा सीटों के लिये कल हो रहे चुनावों में भाजपा को कुछ सीटें हारनी ही पडेगी।

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से खाली हुई गोरखपुर सीट हारना परधान जी के लिये मुफीद होगा। इस सीट पर पार्टी ने उनकी पसंद के खिलाफ एक फर्स्ट-टाइमर और वह भी ब्राह्मण को मैदान में उतारकर अपने इरादे जता भी दिये हैं, लेकिन इसी कारण से इस सीट पर कश्मकश यह है कि 14 मार्च को जब नतीजे आयेंगे तो विश्वसनीयता योगी की सिद्ध होगी या ई.वी.एम. की। जाहिर है इस स्पर्धा में योगी हारना पसंद नहीं करेंगे, सो फूलपुर में भाजपा की पराजय तय मानिये, चाहे उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की प्रतिष्ठा का जो भी हो।

अपने जो परम और चरम अवसरवादी सुशासन बाबू हैं, वह अपनी राजनीतिक पूंजी के संकुचन से तो वाकिफ होंगे ही, ई.वी.एम. की ‘क्रेडिबिलिटी’ की खातिर उपचुनावों में हारते रहने की भाजपा की रणनीति भी जानते ही होंगे। आखिर यह उनकी अंतरात्मा जो ठहरी। अकारण नहीं है कि वह इन उपचुनावों में अपनी जद-यू का प्रत्याशी उतारना ही नही चाहते थे। बहरहाल उन्हें अंतरात्मा के दबाव में जहानाबाद में अपना उम्मीदवार उतारना ही पडा और अब उतारा है तो शायद हारना भी पडेगा। इससे एक तो अंतरात्मा उन्हें औकात में रख सकेगी और ई.वी.एम. पर उमडते-घुमडते संदेह के बादलों के खिलाफ तर्क तो बनेगा ही। अररिया संसदीय सीट और भभुआ विधानसभा सीट पर भाजपा के प्रत्याशी मैदान में हैं, सो इनमें से भी एक भाजपा को हारना ही पडेगा। ई.वी.एम. की विश्वसनीयता का तर्क तभी मजबूत होगा।

फरवरी 2016 में माकपा ने त्रिपुरा की अमरपुर और नवम्बर 2016 में खोवई तथा बरजला सुरक्षित सीटों के उपचुनावों में जीत दर्ज की थी। बरजला को छोड बाकी दो क्षेत्रों में तो भाजपा तीसरे नम्बर पर रही थी। इसी के साथ मध्यप्रदेश की दो विधानसभा सीटों – शहडोल और नेपानगर में भाजपा और कांग्रेस ने एक-एक सीट जीती थी। लेकिन इसी महीने संपन्न त्रिपुरा की 60 सदस्यों वाली विधानसभा के चुनावों में अपनी सहयोगी आई.पी.एफ.टी. के साथ मिलकर भाजपा ने जो 43 सीटें जीतीं, उनमें अमरपुर, खोवई और बरजला- तीनों सीटें शामिल हैं।

मई-जून 2016 में हुये उपचुनावों में मध्यप्रदेश की घोडाडोंगरी सीट 13,000 वोटों के अंतर से भाजपा ने, उत्तर प्रदेश की बिलारी 7,000 वोटों से और जंगीपुर 22,000 वोटों से समाजवादी पार्टी ने जीती, जबकि उन उपचुनावों में कांग्रेस और सपा के बीच कोई गठबंधन नहीं था और कांग्रेस के उम्मीदवारों ने बिलारी में करीब 3,500 और जंगीपुर में करीब 6,500 वोट पाये थे। लेकिन केवल साल भर बाद राज्य विधानसभा के पिछले चुनाव में जब कांग्रेस सपा गठबंधन कर मैदान में उतरे तो भाजपा ने जंगीपुर में उसे 3,000 वोटों से हरा दिया।

इसी तरह भाजपा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में एक लाख वोट लेकर देवबंद सीट और 94,000 वोट लेकर बीकापुर सीट जीत ली जबकि फरवरी 2016 के उपचुनावों में कांग्रेस और सपा ने अलग-अलग लडकर देवबंद और बीकापुर में एक-एक सीट बांट ली थी। बीकापुर में भाजपा केवल 11,000 वोटों के साथ और देवबंद में 45,000 वोट हासिल कर तीसरे स्थान पर रही थी।

अगस्त 2017 में फिर यही हुआ कि भाजपा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में बवाना के उपचुनाव में बुरी तरह हारी। कह सकते हैं कि यह हार, 2015 में 60 सदस्यों वाली विधानसभा में हुई पराजय से भी बुरी थी, क्योंकि तब कांग्रेस का पूरा जनाधार आम आदमी पार्टी के खाते में चला गया था, जबकि उपचुनाव में कांग्रेस ने भाजपा के लगभग वोट पाये और भाजपा तब भी करीब 25,000 वोटों के अंतर से हारी। और यह तब हुआ, जब केवल तीन महीने पहले नगर निगम के चुनाव में भाजपा ने 271 में से 184 सीटें जीत ली थीं।

तो होना फिर यही है। उपचुनाव हैं और ई.वी.एम. पर उठते संदेहों-सवालों को गलत साबित करना है।


लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह विश्लेषण फेसबुक से साभार प्रकाशित है. 


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