BBC को किसने बताया कि सैफ़-करीना के बच्चे का नाम तैमूर लंग पर है ?



पत्रकारों को यह अधिकार है कि वे अपनी सूचना का स्रोत चाहें तो ज़ाहिर न करें, लेकिन उन्हें यह अधिकार नहीं है कि वे अपुष्ट सूचना पर ताल ठोंके।

तो फिर इस ख़बर का आधार क्या है कि सैफ़ अली ख़ान और करीना कपूर ने अपने बेटे का तैमूर नाम, 14 वीं सदी के कुख्यात लुटेरे या लगभग पूरे एशिया को अपने अनवरत सैन्य अभियानों से रौंदकर साम्राज्य स्थापित करने वाले तैमूर लंग के नाम पर रखा। कहा जा रहा है कि चूँकि तैमूर ने दिल्ली में घुसकर लाखों हिंदुओं का क़त्ल किया था, इसलिए यह नाम रखना हिंदुओं को चिढ़ाना है। (गोया उसने मुसलमानों को बख़्श दिया था।) सोशल मीडिया इस सांप्रदायिक विमर्श से भरा है।

ज़ाहिर है, यह माहौल बनाने में मीडिया का बड़ा हाथ है। उसने इस ख़बर के साथ तैमूर लंग की क्रूरता की कहानियाँ पेश करनी शुरू कर दीं। बहरहाल, सेठों या कॉरपोरेट मीडिया कि सांप्रदायिक राजनीति के साथ चल रहे गठबंधन में ऐसा होना स्वाभाविक था, लेकिन अगर पुष्ट ख़बरें देने और हर हाल में तटस्थ रहने का दावा करने वाला बीबीसी भी इसी रौ में बह जाए तो अफ़सोस ही नहीं प्रतिवाद करना भी ज़रूरी हो जाता है।

तमाम दूसर मीडिया संस्थानों की तरह बीबीसी हिंदी वेबसाइट में भी बताया गया है कि सैफ़-करीना ने बेटे का नाम तैमूर लंग पर रखा जिस पर प्रतिक्रिया हो रही है।सवाल यह है कि इस सूचना का स्रोत क्या है ? क्या सैफ़-करीना ने ऐसा कोई बयान जारी किया है ? फिर लोगों के कहने भर से बीबीसी जैसे प्रतिष्ठत मीडिया संस्थान ने मान कैसे लिया?  या फिर उनके घर में बीबीसी का कोई भेदिया है जिसने यह राज़ खोला है ?

देश में तमाम अशोक घूमते मिल जाएँगे जिनका नाम देवानाम प्रियदर्शी अशोक पर नहीं, फ़िल्म अभिनेता अशोक कुमार पर रखा गया क्योंकि बाप उस ज़माने के रुपहले पर्दे के राजा अशोक कुमार का दीवाना था। हो सकता है कि सैफ़-करीना भी किसी और तैमूर से प्रभावित हों या फिर उन्होंने इस बारे में सोचा ही न हो। केवल औलाद को फ़ौलाद (तैमूर का शाब्दिक अर्थ) देखना चाहते हों ? क्या यह गुनाह है ? क्या उन्हें अपने बच्चे का नाम चुनने की स्वतंत्रता नही है?

सबसे बड़ी बात कि क्या तैमूर नाम, उस लंगड़े शासक के बाद ही भाषा में आया या उसके पहले और बाद भी हज़ारों तैमूर हुए हैं ? फ़ारसी और तुर्की भाषी शहरों में तैमूर, तिमूर या इससे मिलते जुलते नामों की भरमार है। पाकिस्तान के मशहूर लालबैंड में भी तैमूर है और एक नामी पत्रकार भी इसी नाम का है। क्या सब तैमूर लंग की तरह ही क्रूर हैं। या उनके बाप भी औलाद को बस फ़ौलाद बनाना चाहते थे। हालाँकि बाप के चाहने से क्या होता है, मंसूर अली ख़ान पटौदी ने बेटे का नाम सैफ़ (तलवार) रखा तो कौन सा उसने क़त्ल किया। इस नाम के साथ गाने-बजाने ( कृपया इसे असम्मान न समझें) में ही तो जुटा है !

ऐसे में अगर करीना के चाचा ऋषि कपूर यह सवाल उठाते हैं कि दूसरों से क्या मतलब कि सैफ़-करीना अपने बच्चों का क्या नाम रखते हैं तो वह उस स्वतंत्रता की ही दुहाई देते हैं जो भारतीय नागरिकों को संविधान से मिली है। बीबीसी ने उनके ट्वीट भी छापे हैं जो उनके ग़म और ग़ुस्से का इज़हार करते हैं। यह अख़बारों में भी आया है। पिछले दिनों मोदीभक्ति की वजह से जिन्होंने उन्हें सिर चढ़ाया था, वही अब उन्हें ट्रोल कर रहे हैं। वे ब्लॉक करने की धमकी के साथ दलील दे रहे हैं कि अलेक्जेंडर या सिकंदर कोई संत नहीं था जिस पर तमाम लोग नाम रखते हैं।

 

पर इस कोलाहल में ऋषि कपूर की बात कौन सुनेगा, जब बीबीसी ही नहीं सुन रहा है !

 

 

 


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