IIT से BAP का उभार कहीं बहुजनों के खिलाफ बड़ी साज़िश तो नहीं?



प्रमोद कुमार 

कुछ दिन पहले मीडिया के माध्यम से जानकारी मिलती है कि 50 आइआइटियन ‘बहुजन आजाद पार्टी’ (BAP) नामक एक राजनीतिक पार्टी बनाए हैं जो फिलहाल बिहार केंद्रित होगी और अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत बिहार विधानसभा चुनाव 2020 से शुरू करेगी। बहुजन आजाद पार्टी की नीति-नियत क्या है फिलहाल स्पष्ट नहीं है। विभिन्न सूत्रें के माध्यम से मिल रही जानकारी के आधार पर इसका मुख्य उद्देश्य ‘बहुजनों’ को उनका अधिकार, प्रतिनिधित्व और आरक्षण दिलाना है। पोस्टर पर अंबेडकर, फूले, पेरियार, लोहिया, कलाम, सुभाषचंद्र बोस और कांशीराम तक के चित्र लगे हुए हैं, जो कि आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय योद्धा के रूप में स्थापित नाम है।

इनके बहुजन की परिभाषा, पोस्टर और प्रमुख मुद्दे के आधार पर कुछ हद तक इनकी नीति-नियत को समझा जा सकता है। ‘बहुजन आजाद पार्टी’ के प्रमुख मुद्दे इस प्रकार हैं-

  1. जनसंख्या के अनुपात में बहुजनों (SC, ST, OBC) को निजी क्षेत्र, उच्चन्यालयों में पदोन्नति में आरक्षण।
  2. सभी क्षेत्रें में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण, श्रेणीबद्ध
  3. भूमि सुधार
  4. शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार, पर्यावरण तथा सामाजिक न्याय प्रणाली में व्यापक सुधार। प्रत्येक नागरिकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और ज्ञानार्जन की भावना का विकास।
  5. निजी क्षेत्र में तथाकथित उच्चजाति को आर्थिक आधार पर विशेष अवसर।

पहला, BAP ने अपने ‘बहुजन’ में अल्पसंख्यक वर्ग को शामिल नहीं किया है। बिहार में पिछले कुछ समय से एक विशेष राजनीतिक पार्टी/सांस्कृतिक संगठन के नेताओं, कार्यकर्ताओं के द्वारा खुलेआम रूप से धार्मिक उन्माद, साम्प्रदायिक तनाव/हिंसा फैलाने का प्रयास किया जाता रहा है। क्या सेकुलरिज्म, साम्प्रदायवाद की मुखालफत करना BAP के मुख्य मुद्दे में नहीं हैं क्योंकि आज देश के संविधान, साझी संस्कृति पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ‘बहुजन’ संस्कृति के जगह पर ‘एक’ संस्कृति लागू करने का प्रयास लगातार एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है। बहुजन में अल्पसंख्यक वर्ग को शामिल नहीं करना और साथ ही साथ सेकुरलिज्म, साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर ठ।च् का ‘मौन रूप’ इसकी नियति पर प्रश्न चिह्न लगाता है।

BAP अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत ‘बिहार विधानसभा चुनाव 2020’ से करना चाहती है जबकि इसके पहले देश के कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं, जैसे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली आदि और इन राज्यों में बहुजनों की राजनीतिक-सामाजिक स्थिति तुलनात्मक रूप से बिहार के बहुजनों की राजनीतिक-सामाजिक स्थिति चिंताजनक हालात में है और यहाँ बहुजन आंदोलन/ राजनीतिक की भी जरूरत है जबकि आज भी बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल, हिदुस्तान आवामी मोर्चा तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सामाजिक न्याय, बहुजनों के हितों के लिए पूरी ईमानदारी, कृत संकल्प, समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा के साथ काम कर रही है जिसकी स्वीकृति बिहार की जनता भी दे रही है। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण बिहार उपचुनाव में राष्ट्रीय जनता दल का अच्छा प्रदर्शन रहा है। इसके साथ-साथ तेजस्वी यादव की लोकप्रियता बिहार की जनता के बीच तेजी से फैल रही है, विशेष रूप से युवाओं के बीच में। राष्ट्रीय जनता दल के एक बड़े जननेता के जेल जाने के बाद मनुवादी-कारपोरेट मीडिया एवं कुछ सत्ताधारी दलों के नेताओं द्वारा कयास लगाए जा रहे थे कि RJD लालू की अनुपस्थिति में बिखर जाएगी और तेजस्वी पार्टी को नहीं संभाल पाएँगे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ बल्कि तेजस्वी के नेतृत्व में पार्टी पहले से स्पष्ट वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ भारतीय जनता पार्टी/ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मुखालफत कर रही है और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करती दिख रही है।

जब हम पिछले तीन साल की बिहार के राजनीतिक घटनाक्रम का विश्लेषण करते हैं तो कुछ बातें स्पष्ट हो जाती हैं। जैसे बिहार विधानसभा चुनाव 2015 से ही लगातार BJP/RSS को बिहार की जनता द्वारा करारी शिकस्त मिलती रही है। ये बिहार में सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश करते रहे यदि कुछ घटनाओं को छोड़ दें तो ये अभी तक कामयाब नहीं हो पाए है। RJD द्वारा संविधान बचाओ एवं देश की गंगा-जमुनी तहजीब बचाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्तर पर सभी विपक्षी दलों को एकजुट करने का प्रयास किया जाता रहा है। ‘संविधान बचाओ न्याय यात्रा’ भी निकाली गयी है जिसके कारण BJP/RSS अपने को असुरक्षित महसूस करने लगी है।

RJD ‘कुर्सी की चिंता’ किए बगैर मजबूती के साथ बिहार में आगे बढ़ रही है, जो कुछ राजनीतिक/सांस्कृतिक संगठ्नों के लिए चिंता का विषय बना हुआ कि कैसे तेजस्वी यादव केे नेतृत्व को कमजोर किया जाए। इसे कमजोर करनेे, बहुजनों के बाँटने के उद्देश्य से 50 IIT विद्यार्थीयों द्वारा ‘बहुजन’ के नाम पर बिहार की जनता को गुमराह करने की कहीं साजिश तो नहीं की जा रही? क्योंकि सामान्यत IIT में ‘दलित-बहुजन’ विचारधारा के आधार पर राजनीति देखने को बहुत ही कम मिलती है और RJD की मुख्य विचारधारा सामाजिक न्याय, सेकुरलिज्म ही रही है। बिहार की अन्य क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टीयों के राजनीतिक का आधार सामाजिक न्याय ही हैं जैसे- राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी, हिन्दुस्तान आवामी मोर्चा, लोकजनशक्ति पार्टी आदि। अर्थात् यहाँ ‘बहुजन’ राजनीति शून्यता की स्थिति में नहीं है।

अधिकांश बहुजन पार्टियों का जन्म एक लंबे संघर्ष/आंदोलन के परिणामस्वरूप हुआ। जैसे बहुजन समाज पार्टी- बहुजन समाज पार्टी बनाने के पहले कांशीराम के नेतृत्व में लंबे समय तक जनआंदोलन चलाया गया था। लेकिन BAP एक ऐसी राजनीतिक पार्टी है, जो पहले राजनीतिक पार्टी के रूप में निबंधन करती है और संघर्ष करने की रूप-रेखा स्पष्ट नहीं करती है। न ही कोई आंदोलन खड़ा करती दिख रही है जबकि देश आज विषम परिस्थितियों का सामना कर रहा है। अर्थात् आंदोलन की सख्त आवश्यकता है। राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षणिक संस्थाओं, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका आदि स्वतंत्र संस्थाओं का पतन हुआ है। आज भारतीय संविधान के मूलभूत ढाँचे को सुरक्षित बचाए रखना एक चुनौती भरा कार्य है।

2 अप्रैल 2018 को बहुजन समाज के द्वारा SC/ST निवारण अधिनियम 1989 के कमजोर किए जाने के विरुद्ध देशव्यापी आंदोलन होता है लेकिन इस नये बहुजन पार्टी की सक्रियता नहीं दिखी। 5 मार्च 2018 को MHRD/UGC द्वारा एक अधिसूचना जारी कर उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की नियुक्ति में सामाजिक न्याय/आरक्षण का गला घोंट दिया गया लेकिन इस पर भी कोई प्रतिक्रिया BAP की नहीं दिखी जबकि ‘बहुजन आजाद पार्टी’ अपना मुख्य उद्देश्य बहुजनों को अधिकार दिलाना बता रही है।

उपरोक्त घटना, तथ्य, संदर्भ, समय, स्थान के आधार पर जब हम BAP की नीयत को समझने का प्रयास करते हैं, तो कुछ महत्वपूर्ण बातें स्पष्ट हो जाती हैं। अभी विस्तृत टिप्पणी करना थोड़ी जल्दबाज़ी होगी लेकिन हमें बहुजनों के नाम पर राजनीति करने वालों से सतर्क रहने की ज़रूरत है ।


लेखक दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के शोधार्थी हैं 

 


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