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‘वाइफ प्रेग्नेंट है, हमको बस घर जाना है’- महाराष्ट्र में फंसे, छत्तीसगढ़िया श्रमिक की गुहार

अशोक दास की पत्नी अलकाबाई अब 6 महीने से ज़्यादा की गर्भवती हैं। एक महीना और ऐसे ही बीता, तो वह ऐसी नाज़ुक स्थिति में होंगी, जिसमें कभी भी कुछ भी हो सकता होगा। लेकिन अशोक और अलका, महाराष्ट्र के एक ज़िले के अनजान से सुदूर गांव में फंसे हैं। पढ़िए एक और प्रवासी श्रमिक के अनंत कष्ट और विपदा की सच्ची कहानी

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‘हम लोग घर जाना चाहते हैं और मेरी 6 महीने की पत्नी प्रेग्नेंट हैं..हमको प्लीज़ घर पहुंचवा दीजिए..’ छत्तीसगढ़ के जांजागीर-चांपा ज़िले से महाराष्ट्र में मज़दूरी करने आए अशोक दास हमसे ये एक बातचीत में कई बार कहते हैं। वे ये कहते हुए भावुक हो जाते हैं, ‘हम लोगों को और कुछ नहीं चाहिए…बस हमको घर पहुंचवा दीजिए…हम पैदल भी नहीं जा सकते कि हमारी मिसेज प्रेग्नेंट हैं..’ फोन पर मैं बस ये कह पाता हूं कि मुझसे जो बन पड़ेगा, मैं करूंगा।

अशोक दास मानिकपुरी, छत्तीसगढ़ से हर साल, महाराष्ट्र आकर मज़दूरी करने वाले उन मज़दूरों में से हैं – जिनको आजकल हमने प्रवासी श्रमिक कहना शुरु कर दिया है। वे इस साल फरवरी में ही, अपने गांव से नासिक ज़िले में मज़दूरी करने आए थे और साथ में उनकी पत्नी अलकाबाई थी, जो उस समय 3 माह की गर्भवती थी। आने के डेढ़ महीने से भी कम वक़्त में देशव्यापी लॉकडाउन लागू हो गया और वे पत्नी समेत नासिक की ही एक तहसील डिंडोरी के जानौरी गांव में फंस गए। न उनके पास कुछ पैसे थे, न ही राशन और न ही आसपास में पत्नी की स्वास्थ्य देखभाल के लिए कोई सुविधा।

अशोक दास की किन्ही ‘अच्छे दिनों’ की तस्वीर

ऐसी स्थिति में वे अपने गांव लौट जाना चाहते थे कि उनकी गर्भवती पत्नी को कम से कम ठीक-ठाक आहार और देखरेख ही मिल सके। उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार की हेल्पलाइन पर संपर्क किया। पहले लॉकडाउन के बाद, जब प्रवासी मज़दूरों की स्थिति सामने आई और तमाम मज़दूर सड़कों पर पैदल निकलने लगे तो सरकारों को थोड़ी शर्म आई। अशोक दास और उनके साथियों को महाराष्ट्र सरकार के ज़रिए, 35 किलो चावल उपलब्ध करवाया गया। लेकिन उनके पास न तो काम था और न ही कोई नकदी। ऐसे में 35 किलो चावल क्या उनकी पत्नी की गर्भावस्था के पुष्टाहार का थोड़ा भी किरदार निभा सकते हैं?

इस बीच अशोक की पत्नी गर्भावस्था के छठे महीने में प्रवेश कर रही थी। अशोक में छत्तीसगढ़ राज्य सरकार से गुहार लगाई कि उनको वापस छत्तीसगढ़ बुला लिया जाए। वो बताते हैं, “मैंने 12 अप्रैल के आसपास, राज्य सरकार के पास आवेदन दिया था। मेरे पास 12 मई को एसएमएस आया कि मेरा आवेदन स्वीकृत हो गया है और रजिस्ट्रेशन हो गया है।” लेकिन इसके बाद क्या हुआ? इसके बाद लगातार दिन पर दिन बीतते गए, उनके पास कोई कमाई का ज़रिया नहीं रहा और न ही उनके पास नासिक के इस गांव से कहीं भी जाने का कोई साधन ही है। वे कहते हैं, “डेढ़ महीना बीत गया है और हम अधिकारी से लेकर हेल्पलाइन पर फोन करते रहे लेकिन कुछ नहीं पता चला।”

अशोक दास की पत्नी अलका बाई, जो 6 माह से अधिक की गर्भवती हैं

इसके बाद अशोक दास ने जब 24 मई को छत्तीसगढ़ प्रशासन को फोन किया, तो उनको प्रशासन की ओर से जानकारी मिली कि एक ट्रेन थी, जो एक दिन पहले ही रवाना हो चुकी है। अशोक दास के मुताबिक, “हमारे पास न तो कोई मैसेज आया और न ही फोन कि कोई ट्रेन है, जो मुंबई से छत्तीसगढ़ जा रही है। यहां से कोई साधन नहीं है, तत्काल मुंबई निकल जाने का…ऐसे में हम कैसे ट्रेन की सूचना के बिना, अपनी गर्भवती पत्नी को लेकर भटक सकते हैं?” वे बहुत मर्मांतक भाव से कहते हैं, “हम पैदल नहीं जा सकते है सर…हमारी वाइफ प्रेग्नेंट है..” हम इस ख़बर के बारे में और शिकायतें और हालात खंगालने में लगे ही थे कि 2 दिन बाद, अशोक दास का हमारे पास व्हॉट्सएप पर संदेश आता है कि किसी तरह हम उनकी मदद करें और उनको कैसे भी घर पहुंचा दें।

अशोक दास से जब हमारी फिर बात हुई तो पता चलता है कि अभी तक, उनके पास किसी तरह की कोई मदद नहीं पहुंची है। न ही उनको ये बताया गया है कि कोई ट्रेन छत्तीसगढ़ जाएगी। उनके पास कोई मैसेज, कोई फोन कॉल प्रशासन की तरफ से नहीं पहुंचा है। अब उनके पास कोई ख़ास पैसे नहीं बचे हैं। किसी दिन काम होता है, तो वो 150-200 रुपए कमा लेते हैं, वरना 35 किलो चावल में से बचे हुए चावल से गुज़ारा कर लेते हैं। वो कहते हैं, “हमको कहीं नहीं जाना है सर, हमको बस अपने घर जाना है…वहां कम से कम रह-खा लेंगे और किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना होगा…”

अशोक दास की पत्नी अलकाबाई अब 6 महीने से ज़्यादा की गर्भवती हैं। एक महीना और ऐसे ही बीता, तो वह ऐसी नाज़ुक स्थिति में होंगी, जिसमें कभी भी कुछ भी हो सकता होगा। लेकिन अशोक और अलका, महाराष्ट्र के एक ज़िले के अनजान से सुदूर गांव में फंसे हैं। क्या लगता है आपको? कि क्या लॉकडाउन के बीच उनको मुंबई तक समय पर पहुंचने के लिए कोई वाहन मिल जाएगा? अगला सवाल सरकार से और हम सब से है कि क्या अशोक दास के पास, इतने पैसे होंगे कि वो मुंबई तक पहुंचने के लिए कोई वाहन किराए पर ले सकेंगे? आख़िरी सवाल छत्तीसगढ़ सरकार से है कि आख़िर कब, अशोक दास और उनकी गर्भवती पत्नी के मोबाइल पर वो मैसेज आएगा, जिसमें उनके घर जाने की तारीख लिखी होगी?

नोट – अगर आप अशोक दास की मदद कर सकते हैं…तो आप सरकार हों, प्रशासन हों या नागरिक – आप हमसे mediavigilindia@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

मयंक सक्सेना, मीडिया विजिल की संपादकीय टीम का हिस्सा हैं। पूर्व टीवी पत्रकार हैं, वर्तमान में मुंबई में फिल्म लेखन करते हैं। लगातार सड़क पर चल रहे और अलग-अलग जगह फंसे श्रमिकों से बात कर के, उन पर स्टोरी कर रहे हैं।

 


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