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स्मृति ईरानी और जावडेकर ने के.वी. में कोटे से 25 गुना ज़्यादा एडमीशन की सिफ़ारिश की !

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रवीश कुमार

मानव संसाधन मंत्री रहते हुए स्मृति ईरानी और उनके बाद प्रकाश जावडेकर ने अपने कोटा से 25 गुना ज़्यादा एडमिशन के लिए सिफ़ारिश किया है। 25 गुना।

केंद्रीय विद्यालयों में मंत्रालय एक साल में 450 एडमिशन की सिफ़ारिश कर सकता है। मगर स्मृति ईरानी ने 2015-16 में  15,065 सिफ़ारिशें कीं और प्रकाश जी ने 2017-18 के लिए 15,492। पैरवी की दुकान खुली है क्या जी। इनकी सिफ़ारिश पर विद्यालय संगठन बोर्ड हर साल 8000 एडमिशन ही कर सका।

कपिल सिब्बल ने मंत्रालय का कोटा सरेंडर कर दिया था ताकि मेरिट को मौका मिले। सिब्ब्ल ने सिफ़ारिश की दुकान बंद कर दी थी। उनके बाद मंत्री बने पल्लम राजू ने भी कोटा बहाल नहीं किया। स्मृति ईरानी बनी और कोटा राज आ गया। कहा कि साल में 450 कोटा होगा। पारदर्शिता का दावा करने वाले प्रधानमंत्री मोदी के मंत्रियों का यह रिकार्ड आपके सामने हैं।

मूल रिपोर्ट आप दि प्रिंट पर पढ़ सकते हैं। अनुभूति विश्नोई ने यह रिपोर्ट की है।

अंग्रेज़ी और हिन्दी चैनलों के थर्ड क्लास होने और इनके यहाँ रिपोर्टिंग बंद होने के बाद ख़बरों की कुछ वेबसाइट से आप जिज्ञासा पूरी कर सकते हैं। चैनलों के न्यूज़ वेबसाइट भी कबाड़ हैं। दरअसल आप ठीक से तय नहीं करते कि किसी वेबसाइट को क्यों फोलो करते हैं और उनसे प्रधानमंत्री की मुलाक़ातें और ट्रक-ट्राली की टक्कर टाइप की ख़बरों से ज़्यादा क्या मिलता है।

एक्सप्रेस के पूर्व संपादक शेखर गुप्ता ने एक अच्छी न्यूज़ वेबसाइट बनाई है जिसका नाम है दि प्रिंट। इस वेबसाइट से कुछ अच्छे रिपोर्टर जुड़े हैं जो रक्षा और शिक्षा जैसे मंत्रालयों की ख़बरें देते हैं। मनु पबी ने राफ़ेल जहाज़ की ख़रीद को लेकर अच्छी रिपोर्टिग पेश की है। कुमार केतकर भी यहाँ जमकर लिख रहे हैं। प्रिंट धीरे धीरे मंत्रालयों की अच्छी ख़बर दे रहा है।

दि वायर, स्क्रोल की कड़ी में प्रिंट का आना सुखद है। सबके हिन्दी हैं और वहाँ अच्छा काम हो रहा है। मगर हिन्दी की मुख्यधारा मीडिया वालों का अपना एक भी सॉलिड न्यूज़ वेबसाइट नहीं है। हिन्दी के पत्रकारों की ट्रेनिंग मंत्रालयों में पकड़ बनाने की कम होती जा रही है। कुछ ही हैं मगर उनके अख़बार के मालिकों को मंत्रियों से उन्हीं के ज़रिए मिलना भी होता है।आप कूड़ा अख़बार लेना बंद कीजिए। ख़बरों की खोज में निकलिए।

(मशहूर टीवी पत्रकार रवीश कुमार के फ़ेसबुक पेज से साभार। तस्वीर द प्रिंट से साभार।)



 

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