मीडिया ने कूपमंडूक बनाया ! कैसे जानेंगे वोले सोयिंका के नाइजीरिया को ?



इन दिनों दिल्ली से सटा अत्याधुनिक शहर ग्रेटर नोएडा अफ़्रीकी देशों के छात्र-युवाओं के ख़िलाफ़ मारपीट की की वजह से चर्चा में है। वहाँ ज़्यादातर छात्र नाइजीरिया के हैं जो स्थानीय लोगों के मुताबिक़ ‘कुत्तों से लेकर इंसान तक’ खा जाते हैं। जिन अख़बारों को लोगों को हक़ीक़त बतानी चाहिए, वे ख़ुद ऐसी अफ़वाहें फैलाने में जुटे हैं। मीडिया विजिल ने कल ही स्थानीय पत्रकारो के एक व्हाट्स ऐप ग्रुप में हो रही चर्चा को सामने लाकर बताया था कि पत्रकार किस क़दर नस्लवादी भावनाओं के शिकार हैं। वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा का कहना है कि कभी देश का मीडिया दुनिया भर के घटनाक्रमों पर नज़र रखता था और पाठकों को उनसे जोड़ता था। उदारीकरण के बाद जिस तरह से ‘स्थानीय’ होने को रोग लगा है, उसने पाठकों को कूपमंडूक बना दिया है। पढ़ें एक ज़रूरी हस्तक्षेप की तरह आनंद स्वरूप वर्मा का यह लेख–

नाइजीरिया के बारे में हम कितना जानते हैं !

 

हम नाइजीरिया के बारे में क्या जानते हैं? यही न कि वहां के लोग नशीली दवाओं की तस्करी करते हैं, कुत्ते-बिल्ली खाते हैं, अपसंस्कृति फैलाते हैं और हर तरह के समाजविरोधी कामों में लिप्त रहते हैं। हमारे अंदर सदियों से जड़ जमा कर बैठे नस्लवाद को, जो कभी जातीय विद्वेष तो कभी छूत-अछूत के रूप में प्रकट होता रहा है, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक हालात ने जो खाद-पानी मुहैया कराया है उसके विस्फोटक नतीजे सामने आ रहे हैं। हमारे मीडिया ने इस जहर को और मारक बनाने में भरपूर मदद की है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान नाइजीरिया के नागरिकों के साथ दिल्ली, नोएडा या देश के अन्य स्थानों में जो कुछ हुआ है उसे रंगभेद और नस्लवाद का वीभत्सतम रूप कहा जाना चाहिए।

1970 और 1980 के दशक के अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं को उठाकर देखें तो कोई सप्ताह ऐसा नहीं मिलेगा जब इनमें अफ्रीकी और लातिन अमेरिकी देशों के राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य पर लेख न हों। इन दो दशकों में खुद मैंने ही अफ्रीकी राजनीति और संस्कृति पर सैकड़ों लेख लिखे थे और ‘दिनमान’ में तो इन देशों के लिए नियमित स्तंभ ही होता था। राजेन्द्र माथुर ने ‘नवभारत टाइम्स’ में और प्रभाष जोशी ने ‘जनसत्ता’ में तीसरी दुनिया के देशों पर समय समय पर काफी सामग्री दी लेकिन 1990 के बाद की स्थिति पर गौर करें। हालत इतनी बदतर हुई कि 342 साल की गोराशाही के बाद दक्षिण अफ्रीका में 1994 में जब अश्वेत बहुमत को आजादी मिली तो वहां रिपोर्टिंग के लिए भारत से केवल दो पत्रकार गये थे-एक ‘मलयालम मनोरमा’ से और दूसरा हिन्दी से मैं जो अपनी पहल पर ‘जनसत्ता’ के लिए रिपोर्टिंग कर रहा था। बाद में ‘दि हिन्दू’ से आनंद सहाय भी पहुंचे थे।

पिछले दो दशकों के दौरान जब से भारत में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जबर्दस्त उछाल आया, मीडिया से इन देशों की खबरें गायब होती गयीं। इस लिहाज से युवा पीढ़ी का इन देशों के बारे में ज्ञान वहीं तक सीमित रह गया जो 1950 या 1960 के दशक में था। अपनी पहल से आज कोई इंटरनेट के जरिए कुछ जानकारी पा ले तो अलग बात है। मीडिया ने लोगों को, एक तरह से कहा जाय तो, कूप मंडूक वाली स्थिति में ला खड़ा किया है।

जहां तक नाइजीरिया की बात है वह अफ्रीकी महाद्वीप के उन गिने चुने देशों में से है जो सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत संपन्न हैं और जहां के साहित्य ने सारी दुनिया में धूम मचायी। यहां के उपन्यास और कविताएं विश्व साहित्य के समकक्ष रखी जाती हैं। नाइजीरिया के ही कवि कथाकार वोले सोयिंका को 1986 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सोयिंका, चिनुआ एचेबे, क्रिस्टॉफर ओकिग्बो, केन सारो वीवा जैसे लेखकों ने देश की राजनीतिक-सामाजिक स्थितियों में सक्रिय हस्तक्षेप किया। इस देश में भी भारत की ही तरह अनेक सामाजिक समस्याएं हैं लेकिन उनसे रूबरू होने में यहां के लेखक हमेशा राजनीतिज्ञों के मुकाबले अगली कतार में पाए गए।

वोले सोयिंका 1965 में अपने देश में हुए फर्जी चुनाव और उस चुनाव की रिपोर्टिंग से क्षुब्ध होकर राजधानी लागोस के एक रेडियो स्टेशन में बंदूक लेकर घुस गये थे और समाचार वाचक को हटाकर खुद प्रसारण किया कि यह चुनाव फर्जी है। नतीजतन गिरफ्तार हुए। इसके 30 साल बाद 1994-95 में जब सैनिक तानाशाह सानी अबाचा की सरकार देश के अंदर भीषण दमन कर रही थी उस समय उन्होंने एक गुप्त रेडियो स्टेशन की स्थापना की और सरकार के खिलाफ प्रचार में लग गए।

कहने का आशय यह है कि 30 वर्षों के दौरान और ढेर सारे राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित होने के बावजूद उनकी प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं देखने को मिली। नाइजीरिया के ही विख्यात उपन्यासकार चिनुआ ऐचेबे ने 2004 में मिले देश के सबसे बड़े सम्मान को लेने से यह कह कर इनकार कर दिया कि “मैं उस सरकार से कोई सम्मान नहीं ले सकता जो जनता की समस्याओं के प्रति इस कदर संवेदनहीन हो।”

1995 में नाइजीरिया के प्रमुख पत्रकार, कवि और नाटककार केन सारो-वीवा को इसलिए फाँसी पर लटका दिया गया कि क्योंकि उन्होंने बहुराष्ट्रीयतेल कंपनी ‘शेल’ द्वारा देश में फैला रहे प्रदूषण और दमन के खिलाफ जनता को संगठित किया और आंदोलन चलाया।

इस आंदोलन के दौरान एक हिंसात्मक वारदात में चार लोग मारे गए। केन सारो-वीवा का उस घटना से कोई संबंध नहीं था लेकिन उनसे नाराज सैनिक सरकार ने उन्हें आंदोलन करके हिंसात्मक मानसिकता पैदा करने और लोगों को उकसाने के आरोप में गिरफ्तार किया, मुकदमा चलाने का ढोंग किया और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की गयी तमाम अपीलों की अनदेखी करते हुए उन्हें फांसी दे दी।

सोयिंका के बाद की पीढ़ी में फेस्टस इयायी जैसे कथाकारों, फेमी ओसोफिसान जैसे नाटककारों और ओडिआ ओफेमन, नियी ओसुन्दरे जैसे कवियों ने हमेशा सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लिखा और जनता के पक्ष में आवाज बुलंद की।

जो लोग नाइजीरिया या केन्या जैसे देशों के बारे में मीडिया द्वारा प्रचारित और सत्ता द्वारा पोषित इन विचारों तक ही सीमित हैं कि यहां के लोग केवल समाज विरोधी गतिविधियों में शामिल रहते हैं उन्हें अपने दिमाग की खिड़की खोलनी चाहिए और जानने की कोशिश करनी चाहिए कि वास्तविकता क्या है।

दरअसल 1990 के बाद जब से आर्थिक उदारवाद की नीतियों ने सत्ता और मीडिया को अपने शिकंजे में लिया, तीसरी दुनिया के देशों के बारे में वही खबरें ज्यादा स्थान पाने लगीं जो इन देशों की जनता को एक दूसरे के नजदीक लाने की बजाय दूर ले जायं। पहले हमारा मीडिया पूरी तरह पश्चिमोन्मुखी था और अब पूरी तरह आत्मलीन हो गया है। उसे इस कैद से निकालने की जरूरत है। सोशल मीडिया के जरिए एक हद तक इसे दूर किया जा सकता है लेकिन उसके लिए भी जरूरी है कि जो लोग सोशल मीडिया पर बहुत सक्रिय हैं उनके भी दिमाग की खिड़कियां खुली हों।

आनंद स्वरूप वर्मा

(लेखक देश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। तीसरी दुनिया के देशों में चल रहे जनसंघर्षों के बारे में लगातार लिखने के लिए प्रसिद्ध।)


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