UP के B.PEd. बेरोज़गार: 7200 की नौकरी का सपना, आठ साल का बेमियादी संघर्ष और धोखा



सत्येन्द्र सार्थक

मात्र 4 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन पर निजी स्कूल में पढ़ा रहे प्रदीप 40 की उम्र पार करने के कारण सरकारी नौकरियों में आवेदन की योग्यता खो चुके हैं। हताशा में वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर इच्छा मृत्यु की मांग कर चुके हैं। प्रदीप बीपीएड संघर्ष मोर्चा के सदस्य हैं जो पिछले आठ साल से खेल शिक्षकों की नौकरी के लिए संघर्षरत है। मोर्चे की अपील पर 3 नवम्बर 2017 को हाईकोर्ट ने सरकार द्वारा 23 मार्च 2017 को नियुक्ति प्रक्रियाओं पर लगाई गई रोक को हटाकर दो माह में नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया। सरकार ने हाईकोर्ट का आदेश मानने के बजाय फैसले को डबल बेंच में चुनौती दे दी। सरकार द्वारा दो माह में हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं करने पर बीपीएड अभ्यर्थियों ने कोर्ट की अवमानना बताते हुए एक याचिका दायर कर दी। बीती 5 फरवरी को इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा है।

प्रदीप अकेले नहीं हैं। इसी हताशा के शिकार बीपीएड संघर्ष मोर्चा के जिलाध्यक्ष (उरई) पवन कुमार ने आत्महत्या कर ली थी। मोर्चा के गोरखपुर जिलाध्यक्ष देवेन्द्र पांडेय बताते हैं कि वे बीपीएड का कोर्स कर रहे थे तब परीक्षा परिणाम, प्रमाण पत्र और मान्यता के लिए संघर्ष करना पड़ा। रिजल्ट हाथ में आया तो रिक्त पदों के सृजन के लिए संघर्ष करना पड़ा। यह भी हो गया तो अब भर्ती प्रक्रिया के लिए संघर्ष कर रहे हैं। 15 सालों के लगातार संघर्षों में नौकरी तो नहीं मिली, उल्टे उम्र बीत जाने के कारण सरकारी नौकरियों में आवेदन की योग्यता खत्म हो गई। जो लाठियां खाई, मुकदमे झेले और इनसे जो आर्थिक बोझ पड़ा उससे केवल तनाव ही हासिल हुआ है।

बहुजन समाज पार्टी के शासनकाल में 23 अगस्त 2010 को एक आदेश जारी करके सरकार ने शारीरिक शिक्षा को अनिवार्य विषय और टीईटी से बाहर कर दिया था। बीपीएड डिग्रीधारकों ने इसके खिलाफ 21 नवम्बर को 2010 को लखनऊ के दारूलशफा में प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों को चारों तरफ से घेर कर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया और 5 लोगों के खिलाफ नामजद मुकदमा करके उन्हें गिरफ्तार कर लिया। घटना के बाद मुख्यमंत्री का कहना था कि हमें बच्चों को पढ़ाना है न कि पहलवान बनाना है।

सरकार से निराश बीपीएड अभ्यर्थियों ने मुख्य विपक्षी पार्टी सपा के नेताओं से मुलाकात कर अपनी समस्या बताई। यह पता चलने पर उनकी उम्मीद बढ़ गई कि समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव भी बीपीएड कोर्स की पढ़ाई कर चुके हैं। उन्हें पूरा यकीन था कि शिवपाल उनके दर्द को जरूर समझेंगे। विपक्ष की भूमिका अदा करते हुए सपा के वरिष्ठ नेताओं ने सरकार के नीतियों की आलोचना करते हुए सत्ता में आने पर खेल शिक्षक का पद सृजन और नौकरी देने का वादा किया। नौकरी की उम्मीद में बीपीएड अभ्यर्थियों ने समाजवादी पार्टी के पक्ष में प्रचार किया और सरकार बनवाने में अपनी सक्रिय भूमिका अदा की।

सत्ता में आते ही सपा नेताओं के बोल बदलने लगे। कई मुलाकातों के बावजूद बीपीएड संघर्ष मोर्चा के सदस्यों को कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। हर बार एक ही जवाब मिलता कि काम हो रहा है, थोड़ा इंतजार कीजिए। चार पांच मुलाक़ात के बाद भी सरकार के जिम्मेदारों का रवैया नहीं बदला तो अभ्यर्थियों ने एक बार फिर संघर्ष का रास्ता चुना और छोटे-बड़े प्रदर्शनों के बाद 1 सितम्बर 2015 को विधानसभा का घेराव किया। दस हजार से अधिक की संख्या में बीपीएड अभ्यर्थियों ने विधानसभा को घेर लिया। पुलिस ने अभ्यर्थियों पर जमकर लाठिया भाँजी। किसी के हाथ टूटे किसी का पैर, जो जैसे मिला पीटा गया। यहां तक कि महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया। रही सही कसर 101 लोगों को नामजद और 8 हजार अज्ञात के खिलाफ गम्भीर धाराओं में (307 भी) केस दर्ज कर पूरी कर दी गई।

इस दमन के बावजूद हार नहीं मानते हुए बीपीएड अभ्यर्थयों ने लक्ष्मण मेला मैदान में 49 दिनों तक लगातार धरना प्रदर्शन किया। इस बीच कुछ अभ्यर्थियों ने गोमती नदी में अर्धनग्न होकर भी प्रदर्शन किया था जिससे ठंड के कारण एक की हालत नाजुक हो गई थी।

सपा के कई वरिष्ठ नेताओं के कई बार वादों के बावजूद जब सरकार मुकर गई तो बीपीएड अभ्यर्थियों ने एक बार भाजपा पर दांव आजमाया। भाजपा के नेताओं ने भी इन्हें नौकरी दिलाने का आश्वासन दिया। अबकी बार अभ्यर्थियों ने भाजपा के पक्ष में सक्रिय होकर चुनाव प्रचार किया। इसी बीच सपा सरकार ने 19 सितम्बर 2016 को उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 32022 अंशकालिक शारीरिक शिक्षा एवं खेलकूद अनुदेशकों की संविदा नियुक्ति के लिए अनुमति प्रदान की और 21 अक्टूबर को विज्ञप्ति जारी की गई। 25 दिनों की अवधि में 154216 आवेदन प्राप्त हुए, बेरोजगारी के अतिरिक्त आवेदन ज्यादा होने का एक कारण यह भी है कि एक अभ्यर्थी ने अन्य जिलों के लिए भी आवेदन किया था। 32022 पदों पर नौकरियों का लॉलीपॉप दिखाकर सरकार ने 154216 फार्म बेच तीन करोड़ से अधिक कमा लिए।

11 फरवरी से 8 मार्च तक सात चरणों में विधानसभा चुनावों की घोषणा भी हो गई। 312 सीटें जीतकर भारतीय जनता पार्टी ने बहुमत की सरकार बनाई और 19 मार्च को योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के 21वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। देवेन्द्र पांडेय के अनुसार योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद इन लोगों ने उनसे दर्जनों बार मुलाकात की। जब भी वह गोरखपुर आते और जनता दरबार लगता तो वे लाइन में खड़े होकर नियुक्ति प्रक्रिया को शुरू करने की मांग करते लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिलता।

इधर काउंसलिंग के बाद मेरिट के आधार पर बीपीएड अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी जानी थी। पहली काउंसलिंग 4 अप्रैल 2017 से शुरू होनी थी लेकिन मुख्यमंत्री ने नियुक्तियों की समीक्षा के नाम पर बड़ा फैसला लेते हुए सभी नौकरियों की नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगा दी। सरकार के इस फैसले से अभ्यर्थियों के पैरों तले से जमीन खिसक गई। फैसले के खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में अपील की। अभ्यर्थियों ने तर्क दिया कि नियुक्ति में किसी तरह का कोई विवाद नहीं था। कोर्ट ने सरकार का आदेश रद्द करते हुए दो माह के अंदर नियुक्ति प्रक्रिया को पूरा करने का आदेश दिया। सरकार को यह नागवार लगा और उसने फैसले को डबल बेंच में चुनौती दे दी।

आठ साल से नौकरी के लिए संघर्ष करने वाले बीपीएड संघर्ष मोर्चा के कई सदस्य 40 से अधिक की उम्र के हो चुके हैं। जिसके लिए यह संघर्ष कर रहे हैं यदि उन्हें यह नौकरी मिल भी जाए तो वेतन के नाम पर प्रतिमाह केवल 7200 रुपए ही हाथ में आएंगे। संघर्ष मोर्चा से जुड़े कई सदस्य दिहाड़ी मजदूरी कर अपनी जिंदगी काट रहे हैं पर फिर भी अभी हार मानने को तैयार नहीं हैं। प्रदेश सचिव आकाश गुप्ता का कहना है कि सरकार यदि सुप्रीम कोर्ट जाएगी तब भी हम केस लड़ेंगे। सभी जनपदों के साथ ही लखनऊ में जाकर प्रदर्शन करने में बैनर, पोस्टर, किराया-भाड़ा का खर्चा, हाईकोर्ट के महंगे वकीलों का खर्चा उठाने के लिए इन नौजवानों ने जो दुश्वारियां झेली उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है। मसलन प्रदीप ने अभी तक केवल इसीलिए शादी नहीं की क्योंकि 4 हजार में आंदोलन के लिए चंदा देने के बाद वह अपना भी खर्चा नहीं निकाल पाता है, तो परिवार का खर्च क्या चलेगा।

हमारी सरकार, मंत्री, अधिकारियों और तथाकथित जनप्रतिनिधियों को हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके लिए इनकी पहचान महज एक वोट तक सीमित है। चुनावों के दौरान इस एक वोट को कैसे हासिल करना है इसका उनके पास लम्बा और समृद्ध अनुभव है। वह जानते हैं कि वोट तो जाति, धर्म, क्षेत्र, तीन तलाक, लव जिहाद, घर वापसी, पद्मावत, गोरक्षा जैसे मुद्दों के नाम पर मिल ही जाएंगे।

सपा, बसपा और भाजपा के नेताओं में वैसे तो हर मुद्दे पर मतभेद होते हैं लेकिन बीपीएड अभ्यर्थियों के प्रति सभी का व्यवहार एक जैसा रहा है। कम से कम सत्ता में रहते तो सभी ने उनके मांगों की एक समान अवहेलना की। अभी तक तीनों पार्टियों के शीर्षस्थ नेताओं से बीपीएड अभ्यर्थियों ने 2 दर्जन से अधिक मुलाकातें की हैं पर आश्वासनों के सिवा कुछ और हासिल नहीं हो सका है। खेल शिक्षक बनने का सपना आंखों में लिए इन नौजवानों से 8 साल में प्रदेश की सभी राजनीतिक पार्टियों की सरकारों को देख लिया। किसी भी पार्टी के एजेंडे में इनका दुख, बेरोजगारी, परिवार के हालात और जीवन के वह महत्वपूर्ण साल नहीं हैं जिसे उन्होंने 7200 की अंशकालिक नौकरी को हासिल करने में गुजार दिए। बसपा ने अपनी मंशा डंडे से जाहिर की तो सपा ने मनचाहा इस्तेमाल किया। सरकार बनने के बाद सपा ने रिक्तियां भी तब जारी की जब विधानसभा चुनाव नजदीक आ चुके थे। भाजपा सरकार ने हद ही कर दी। संकल्पपत्र में 5 साल में 70 लाख रोजगार देने का वादा किया था लेकिन रोजगार देना तो दूर, सरकार बेरोजगारों को कोर्ट कचहरी के चक्कर में उलझाकर उनके भविष्य के साथ खेल रही है।


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