ऑपरेशन लोटस : राजनीतिक नैतिकता के क्षरण का नया अध्‍याय


मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह भी येदिरुप्पा से काफी प्रभावित हैं और ऑपरेशन लोटस का मध्यप्रदेश संस्करण आजमाने को लेकर उतावले हो रहे हैं




गणपत तेली

कर्नाटक चुनावों में कांग्रेस और जनता दल (सेकुलर) गठबंधन द्वारा सरकार बनाने के बाद भारतीय जनता पार्टी निरंतर इसे तोड़-फोड़ कर अपनी सरकार बनाने का प्रयास कर रही है। पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के नेतृत्त्व में किए जा रहे इन प्रयासों को भाजपा ने ‘ऑपरेशन लोटस’ नाम दिया है। अब तक यह ऑपरेशन लोटस तीन बार असफल हो चुका है। इसका हालिया संस्करण बेहद दिलचस्प है। भाजपा ने कर्नाटक के अपने सभी विधायकों को गुड़गाँव के एक होटल में लाकर रख दिया था और कांग्रेस के विधायकों की खरीद-फरोख़्त शुरू कर दी। दो-तीन कांग्रेसी विधायक मुंबई में भाजपा के खेमे में आकर टिक गए थे। इससे पहले कि भाजपा कुछ आगे कुछ करती अपने रणनीतिकार डी.के. शिवकुमार और सिद्धारमैया के नेतृत्व मे कर्नाटक कांग्रेस सक्रिय हो गई और इस बार भी अंतत: वहीं हुआ, जो हर बार हुआ अर्थात कांग्रेसी विधायक वापस कांग्रेसी खेमे में पहुंच गए और जेडीएस के कुछ विधायकों ने भाजपा द्वारा करोड़ों रुपये और मंत्री पद के ऑफर को सार्वजनिक किया गया। अंतत: ऑपरेशन लोटस विफल घोषित हो गया।

त्रिशंकु विधानसभा होने की स्थिति में अपने विधायकों को राज्य या राज्य के बाहर किसी एक जगह रखने की खबरें नई नहीं हैं। भाजपा-कांग्रेस दोनों ने यह किया है लेकिन साल भर से कर्नाटक में यह परिघटना बार-बार घट रही है। इसकी शुरुआत तब हुई थी, जब गुजरात में अपने विधायकों को बचाने के लिए कांग्रेस ने उन्हें कांग्रेस प्रशासित कर्नाटक के एक रिसोर्ट में भेज दिया। कर्नाटक के कांग्रेस नेता डी.के. शिवकुमार ने उस अभियान को संभाला था।  इस घटना के बाद डी.के. शिवकुमार कांग्रेस के चाणक्य बनकर उभरें और अगले विधानसभा चुनावों में जब त्रिशंकु विधानसभा बनी तो कांग्रेस-जेडीएस सरकार बनाने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।

मई 2018 में चुनावों के बाद कर्नाटक में हुई राजनीतिक घटनाओं ने ड्रामे की स्थिति पैदा कर दी थी, जहाँ कांग्रेस-जेडीएस के दावे के बावजूद 104 विधायकों वाली भाजपा को सिंगल लार्जेस्ट पार्टी के नाम पर सरकार बनाने के लिए बुलाकर येदिरुप्पा को मुख्यमंत्री बना दिया गया। वे बहुत सिद्ध नहीं कर पाए और विश्वासमत से पहले ही सदन से निकलकर इस्तीफा दे दिया। इसके बाद जेडीएस के एच.डी. कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने। इस दौरान लगातार विधायकों को खरीदें जाने का प्रयास करने की खबरें आती रही। कांग्रेस-जेडीएस के नेताओं ने इस तरह के दावे भी किए।  

इस पूरे मामले में दिलचस्प भाजपा का पक्ष रहा, जिसने इन आरोपों का खंडन नहीं किया बल्कि इसे ऑपरेशन लोटस नाम दिया। भारतीय राजनीति में विधायकों की खरीद-फरोख़्त के आरोप नए नहीं हैं, लोकसभा तक में नोटों के बंडल लहराए जा चुके हैं लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि इस खरीद-फरोख़्त को सामान्य बात बताकर पेश किया जा रहा है। येदिरुप्पा के बयानों से ऐसा लगता है कि इसमें कुछ गलत या अनैतिक नहीं है बल्कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से ऑपरेशन लोटस को डिफेंड करते हुए इसे आवश्यक बताते हैं। भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों के कारण जिस येदिरुप्पा को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था, उससे और उम्मीद भी क्या की जा सकती है। मुश्किल बस यह है कि कर्नाटक कांग्रेस के नेता सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार इन पर भारी पड़ जाते हैं। फिर एक-दो विधायकों की बात होती तो ऑपरेशन आसान होता, जबकि यहाँ सरकार और विपक्ष के बीच 11 विधायकों का फर्क है। इसलिए कर्नाटक में भाजपा चाहती है कि कांग्रेस या जेडीएस के 12-14 विधायक इस्तीफा दे दें ताकि बहुमत का आंकड़ा नीचे आ जाए और भाजपा सरकार बना लें। यही कोशिश भाजपा मई 2018 से करती आ रही है।

कर्नाटक में येदिरुप्पा के नेतृत्त्व में किए जा रहे ये प्रयास कोई अलग-थलग प्रयास नहीं हैं। कर्नाटक से पहले भाजपा कई राज्यों में इसी तरह से विधायकों को तोड़-फोड़कर सरकार बना चुकी है। कर्नाटक का पड़ौसी राज्य गोवा, उत्तराखंड और उत्तर-पूर्व के कई राज्य इसके उदाहरण है। भाजपा के इस अभियान में राज्यपाल नामक संस्था का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, चाहे बिहार का मामला हो, या कश्मीर का, या उत्तर-पूर्व के राज्यों का इन राज्यों के राज्यपालों ने नियमों-परंपराओं को ताक पर रखकर भाजपा के ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ अभियान में अपना योगदान दिया है। जब इस दौर का राजनैतिक इतिहास लिखा जाएगा, तब इस पद को कोई नज़रअंदाज़ नहीं कर पाएगा। एक-दो राज्यों में तो उच्चतम न्यायालय ने राज्यपाल के फैसलों को बदल कर सरकार को बहाल किया था।

यह सही है कि अभी कर्नाटक में भाजपा का ऑपरेशन लोटस का तीसरा प्रयास नाकामयाब हो गया है लेकिन येदिरुप्पा की फितरत देखकर लगता नहीं कि जल्दी ही वह ऐसा प्रयास दोबारा नहीं करेंगे। भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्त्व इसमें यह फायदा देख रहा है कि यदि यह सरकार गिर जाती है और कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन टूट जाता है तो ये दोनों पार्टियाँ अलग-अलग चुनाव लड़ेंगी जिससे आने वाले लोकसभा चुनावों में भाजपा को ज्यादा सीटे जीतने की उम्मीदें हैं। वर्तमान परिस्थिति में गठबंधन के साथ लड़ने पर भाजपा के सामने करारी हार का खतरा है। ऐसी चर्चाएं भी सुनने भी आ रही है कि मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह भी येदिरुप्पा से काफी प्रभावित हैं और ऑपरेशन लोटस का मध्यप्रदेश संस्करण आजमाने को लेकर उतावले हो रहे हैं। मध्यप्रदेश में तो सीटों का अंतर भी कर्नाटक से कम है। ऐसे में, आने वाले दिनों में हमें राजनीतिक क्षरण के नए-नए स्तर देखने को मिल सकते हैं।

लेख जामिया मिलिया में प्राध्‍यापक हैं


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