राफ़ेल का खुलता खेल: क्या मोदी को चुनाव के पहले ही जाना पड़ सकता है?



अरुण महेश्वरी


सुप्रीम कोर्ट में रफाल सौदे पर कल लगभग साढ़े तीन घंटे की असामान्य जिरह से जो बातें साफ तौर पर सामने आईं, वे थी –

1. इस सौदे पर फ्रांसीसी सरकार की तरफ से कोई गारंटी नहीं दी गई है । अर्थात, सरकार के इस कथन में कोई सार नहीं है कि यह दो सरकारों के बीच का सौदा है ।

2. दसॉं के साथ समझौते में आफसेट पार्टनर के बारे में कोई शर्तावली शामिल नहीं है । अगर दिवालिया अनिल अंबानी बीच में ही रुपये उड़ा कर भाग जाता है तो उस पर कार्रवाई करने का भारत सरकार को कोई अख्तियार नहीं होगा ।

3. ऑफसेट पार्टनर को शामिल करने के बारे में यूपीए के जमाने में तैयार हुए समझौते में जो शर्तें थी, उन्हें मोदी ने बिना किसी कैबिनेट फैसले के ही मनमाने ढंग से बदल दिया ताकि अनिल अंबानी को इस सौदे में शामिल किया जा सके । यहां तक कि रक्षा मंत्रालय से भी कोई सलाह नहीं की । इस विषय में आज तक सरकार के किसी दस्तावेज में कोई निर्णय दर्ज नहीं है ।

4. सुप्रीम कोर्ट ने वायु सेना के उच्च अधिकारियों से सवाल करके यह जाना कि 1985 में वायु सेना में मिराज विमान को शामिल करने के बाद इन 33 सालों में एक भी नया विमान शामिल नहीं किया गया है । इसके साथ ही यह भी जाना कि अभी वायु सेना को चौथी-पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की कई स्क्वैडर्न्स की सख्त जरूरत है । अर्थात्, सवाल पैदा होता है कि 126 विमानों के लिये पहले के सौदे को बदल कर उसे सिर्फ 36 विमानों के लिये सौदा किसके हित में किया गया और ऐसा करने का क्या तुक था ?

सुप्रीम कोर्ट ने रफाल की खरीद की कीमत को अभी विचार का विषय ही नहीं बनाया है ।

अब तक सामने आए इन सारे तथ्यों की रोशनी में ही मोदी के द्वारा अनिल अंबानी को लाभ पहुंचाने के लिये राष्ट्र की प्रतिरक्षा से खेलने के इस महापराध की आगे और जांच जरूरी हो गई है ।

और, सुप्रीम कोर्ट के द्वारा इस जांच की घोषणा के बाद मोदी का प्रधानमंत्री पद पर बने रहना क्या असंभव नहीं लगता है ?

रफाल सौदे पर सुप्रीम कोर्ट में चली बहस का परिणाम क्या निकलने वाला है, नहीं कह सकते । लेकिन यह साफ है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले की अभी जांच का आदेश दे या न दे, इस सौदे में हुए भ्रष्टाचार का विषय दिन के उजाले की तरह साधारण लोगों के सामने साफ है । इस सौदे में अनिल अंबानी को लाभ करा के देने में मोदी की निजी भूमिका को कोई ढक नहीं सकता है । यह बात दीगर है कि सुप्रीम कोर्ट इस सच को पूरी तरह से प्रकाश में लाना चाहता है या इसे संदेह के घेरे में छोड़ना ही बेहतर समझता है । इस पर राय से काफी हद तक खुद सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनियता भी जु़ड़ गई है ।

 

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। यह उनकी फ़ेसबुक पोस्ट है। आभार सहित प्रकाशित।)

 



 


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