आरएसएस के ‘अंबेडकर’ यानी मक्कार इरादों का पुलिंदा ! (1)



पाठकों को बताते हुए अतीव प्रसन्नता हो रही है कि अपनी सामाजिक और न्याय-दृष्टि के लिए मशहूर चिंतक कँवल भारती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्रियाकलापों पर , उसके ही प्रकाशनों के आधार पर, एक विस्तृत समीक्षा लिख रहे हैं जो मीडिया विजिल में हफ़्तावार प्रकाशित हो रही है। प्रस्तुत है इस सिलसिले की तेइसवीं कड़ी- संपादक


आरएसएस और राष्ट्रजागरण का छद्म–23

कँवल भारती  

 

 

‘सत्याग्रह के बावत हम गीता का आधार लेते हैं. कारण सत्याग्रह गीता का मुख्य प्रतिपादित विषय है. कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि बैठो मत. जिन कौरवों ने तुम्हारा राज्य हड़पा है, उनसे युद्ध करने को तैयार हो जाओ. तब अर्जुन ने प्रश्न किया, यह कैसा सत्याग्रह है? इस प्रश्न का जो उत्तर कृष्ण ने दिया, वही गीता है. गीता सत्याग्रह पर एक मीमांसा है. अछूत लोग सवर्णों से समान अधिकार पाने का जो आग्रह करते हैं, वह सत्याग्रह है.’(1)

ये पंक्तियाँ डा. आंबेडकर ने अपने पत्र ‘बहिष्कृत भारत’ के 25 नवम्बर 1927 के अंक में सम्पादकीय लेख में लिखी थीं. इन्हीं पंक्तियों के आधार पर आरएसएस यह प्रचार कर रहा है कि डा. आंबेडकर ने अपने सामाजिक संघर्ष की प्रेरणा भगवद्गीता से ली थी. एक और पक्ष देखिए :

‘यह दुखद है कि भारत के मुसलमानों में समाज-सुधार का ऐसा कोई संगठित आन्दोलन नहीं उभरा, जो इन बुराइयों का सफलतापूर्वक उन्मूलन कर सके. असल में मुसलमान यह महसूस ही नहीं करते कि वे बुराइयाँ हैं. परिणामत: वे उनको खत्म करने के लिए सक्रिय भी नहीं रहते. इसके विपरीत वे अपनी प्रथाओं में किसी भी परिवर्तन का विरोध करते हैं.’(2)

ये पंक्तियाँ डा. आंबेडकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘Pakistan Or The Partition Of India’ में लिखी हैं. इन्हीं पंक्तियों के आधार पर आरएसएस प्रचार कर रहा है कि डा. आंबेडकर मुस्लिम-विरोधी थे.

मंडल आन्दोलन के दौर में आरएसएस की ओर से लाखों की संख्या में एक पुस्तिका वितरित की गई थी, जिसका नाम ‘राष्ट्रपुरुष डा. भीमराव आंबेडकर’ है. उसने ऐसे कलेंडर भी प्रकाशित किए थे, जिनमें उनके ऊपर श्रीराम को दर्शाया कर यह सन्देश दिया गया कि वे श्रीराम के भक्त थे. इस सबका मकसद डा. आंबेडकर को हिंदुत्व से जोड़कर दलित समाज को हिंदूवादी बनाना है.

उसी दौर में आरएसएस की एक लेखमाला ‘डा. अम्बेडकर और इस्लाम’ नाम से ‘ब्लिट्ज’ में छपी थी, जिसके आधार पर 4 और 5 जून 1993 को हिंदी दैनिक ‘राष्ट्रीय सहारा’ में रामकृष्ण बजाज ने दो किश्तों में लेख लिखा था. उसमें उन्होंने अपने भ्रम का निवारण करते हुए लिखा था, ‘मेरा मानना था कि डा. आंबेडकर एक कटु हिन्दू विरोधी थे. इसी दलील के आधार पर हिन्दू विरोधी होने के कारण वह मुस्लिम-समर्थक थे. लेकिन अब मुझे विश्वास हो गया है कि मेरी समझ गलत थी.’ इसके बाद उन्होंने लिखा, ‘हिन्दूधर्म की जगह उन्हें कौन-सा धर्म अपनाना चाहिए, इसके लिए डा. आंबेडकर ने इस्लाम सहित संसार के सभी मुख्य धर्मों का गहरा अध्ययन किया था. अंत में उन्होंने और उनके अनुयायियों ने बौद्धधर्म अपनाया, जिसकी जड़ मूलत: वही थी, जहाँ से हिन्दूवाद का जन्म हुआ था.’

हाल में जागृति विहार, मेरठ से प्रकाशित आरएसएस के पाक्षिक पत्र ‘राष्ट्रदेव’ के 1 सितम्बर 2017 के अंक में ‘बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया गया है, जिसमें डा. आंबेडकर को हिन्दूवादी ही नहीं, बल्कि ब्राह्मणवादी भी बना दिया गया है. आरएसएस ने इस लेख में अपने एजेंडे—गाय, श्रीराम और ब्राह्मण-भक्ति को डा. आंबेडकर के दिमाग में घुसेड़ दिया है. कुछ प्रसंगों का अनर्थ करके वह डा. आंबेडकर को उसी तरह ठिकाने लगा रहा है, जिस तरह उसने बुद्ध, कबीर और रैदास को लगाया गया है. आरएसएस के इस लेख पर एक नजर डालते हैं—

‘बाबासाहेब का परिवार अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति का था. इसमें तीन सन्यासी हो गए. दादा जी श्री मालोजीराव ने रामानन्द सम्प्रदाय से दीक्षा ली थी. पिता श्री रामजी ने कबीरपंथ की दीक्षा ली. कबीर के ही गुरु रामानंद थे. रामजी के बड़े भाई, यानी बाबासाहेब के ताऊ जी, भी सन्यास लेकर घर छोड़कर गए थे. बाबासाहेब ने भी पत्नी रमाबाई (आई साहेब) के देहांत के बाद, (1935) में कुछ दिन सन्यासियों वाली भगवा कफनी पहिन ली थी. बचपन में पिताजी के आग्रह के कारण भीमराव व भाई-बहिनों को भोजन से पहले हिन्दू संतों की रचनाएँ—दोहे, कविता, अभंग आदि कोई-न-कोई याद कर सुनानी पड़ती थी. बाबासाहेब कहते हैं , इसी कारण संत तुकाराम, मुक्तेश्वर, एक नाथ, कबीर आदि की रचनाएं मुझे कंठस्थ हुईं.’ (3)

आरएसएस अतीत के आधार पर वर्तमान को व्यक्त करने का काम करता है. यही उसका झूठ है, जो वह बड़ी कुशलता से खड़ा करता है. क्या संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति होगा, जिसमें बचपन से मृत्यु-पर्यन्त कोई परिवर्तन न आया होगा? क्या गाँधी वही व्यक्ति थे, जो वह बचपन में थे? बचपन में सभी में परिवार के संस्कार होते हैं. संस्कारों से विद्रोह या उनमें परिवर्तन परिस्थितियों और वातावरण के अनुसार होता है. इस्लाम के पैगम्बर हजरत मोहम्मद के बाप-दादे मूर्तिपूजक थे, तो क्या इस आधार पर मोहम्मद साहेब को मूर्तिपूजक कहा जा सकता है? आरएसएस के कितने ही समर्थक उसकी हिंदूवादी विचारधारा से विद्रोह करके बाहर आए. देशराज गोयल के बाद एक उदाहरण हिंदी के आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी का है. उन्होंने स्वीकार किया है कि वह आरएसएस में थे. गाँधी की हत्या के बाद जेल भी गए थे. पर राहुल सांकृत्यायन की ‘मानव समाज’ पुस्तक पढ़कर वह मार्क्सवादी बने. वह कहते हैं, ‘मैंने महसूस किया कि देश में और भी लोग हैं, जो देश से उतना ही प्रेम करते हैं, जितना हम करते हैं. और भी लोग हैं, जो अपने धर्म को इतना प्रेम करते हैं, जितना हम करते हैं. मैं गरीब घर का था. संघ हिन्दू संगठन है और वहाँ भी पैसे वालों का दबदबा था. जातपात, छुआछूत जैसी विसंगतियां देखने को मिलीं. इसी वर्गभेद की वजह से मैं वामपंथ की तरफ चला गया.’ (4) उन्होंने बड़े पते की बात कही है कि ‘मैं गरीब घर का था.’ बात भी सही है, गरीब परिवारों के लोग ही ज्यादा धर्म-धर्म करते हैं. आरएसएस की सैकड़ों संस्थाओं के लाखों कार्यकर्ता गरीब घरों से हैं, जो हिंदुत्व के लिए हर समय मरने-मारने को तैयार रहते हैं. वह उन्हें हिंदुत्व की अफीम खिला कर मुसलमानों और ईसाईयों के विरुद्ध हिंसा में इस्तेमाल करता है.

यहाँ तक बाबासाहेब डा. आंबेडकर के दादा जी श्री मालोजीराव का ब्राह्मण रामानंद सम्प्रदाय में दीक्षा लेने का प्रश्न है, और यह बताने का प्रश्न है कि रामानन्द कबीर के गुरु थे, तो दलित लेखकों के द्वारा इस धारणा का अकाट्य तर्कों और प्रमाणों से खंडन किया जा चुका है कि कबीर ब्राह्मण रामानन्द के शिष्य थे. कबीर ही नहीं, रैदास भी ब्राह्मण रामानन्द के शिष्य नहीं थे. कबीर और ब्राह्मण रामानन्द की विचारधारा में जमीन-आसमान का अंतर है. कबीर और रैदास दोनों ही वेदों के निंदक थे, जबकि ब्राह्मण रामानन्द  का धर्म ही वेदधर्म था. कबीर ने तो घोषणा ही कर दी थी—‘ब्राह्मण गुरु जगत का, साध का गुरु नाहिं/ उरझि-पुरझि कर मरि रह्या चारो वेदा माहिं.’ (5) वेदों में उरझ-पुरझ कर मरने वाले एक कर्मकांडी ब्राह्मण को कबीर अपना गुरु क्यों बनायेंगे? लेकिन आरएसएस ब्राह्मण रामानन्द को कबीर का गुरु बताकर बाबासाहेब डा. आंबेडकर को भी उनके दादा जी के बहाने ब्राह्मण रामानन्द का शिष्य बनाने पर तुला हुआ है. दूसरी ओर वह यह भी स्थापित कर रहा है कि बाबासाहेब ब्राह्मणधर्म की वैष्णवी पृष्ठभूमि से आते हैं. हो सकता है आरएसएस ने कहीं पूर्वजन्म का यह सिद्धांत भी गढ़ लिया हो कि बाबासाहेब डा. आंबेडकर पूर्वजन्म के ब्राह्मण थे. ब्राह्मण इस तरह की  गल्पें कबीर और रैदास के बारे में गढ़ ही चुके हैं. वे इस भ्रम में जीते हैं कि ज्ञान सिर्फ ब्राह्मण के पास ही होता है. और अगर कोई अब्राह्मण, खासकर कोई शूद्र ज्ञानी हो गया है, तो वह ब्राह्मण पृष्ठभूमि से ही हो सकता है. यही शर्मनाक खेल आरएसएस डा. आंबेडकर के साथ खेल रहा है. इस खेल के पीछे उसकी भावना सिर्फ दलित समुदाय को हिंदुत्व से जोड़े रखना मात्र है. चूँकि डा. आंबेडकर दलित जातियों के नायक हैं,  इसलिए उनके नायक को हिन्दू बनाना उनके मिशन का एजेंडा है. लेकिन डा. आंबेडकर और दलितों के विरुद्ध यह एक बड़ी खतरनाक साजिश भी है.

आरएसएस ने बाबासाहेब के दादा जी को ब्राह्मणवादी बना दिया है, जो वह नहीं थे, परन्तु उसने यह नहीं लिखा है कि तत्कालीन सवर्ण समाज उन्हें हिन्दू मानता भी था? उनके पिता रामजी  के समय में क्या सामाजिक स्थिति थी, इस पर भी उसने कोई टिप्पणी नहीं की है. बाबासाहेब डा. आंबेडकर के प्रामाणिक जीवनी लेखक चांगदेव भवानराव खैरमोडे ने, जिन्होंने उनके साथ अंतिम समय तक काम किया था, उस समय की परिस्थति पर इस प्रकार प्रकाश डाला है—

‘उस समय रामजी सूबेदार पर हिन्दू संस्कारों का बड़ा प्रभाव था. हिन्दू संस्कारों के प्रति उनके मन में बड़ी आस्था और श्रद्धा थी. हिन्दू धर्म के असली रूप और उसके परिणामों को जानने-समझने के लिए उनके पास समय ही कहाँ था? उस समय दलित समाज की स्थिति पूरी तरह गतिहीन और लाचार थी. अधर्म भी उनके लिए धर्म था. दलित तो अपने आप को हिन्दू समझता था, किन्तु सवर्ण लोग उन्हें हिन्दू समझने के लिए तैयार नहीं थे.’ (6)

इससे स्पष्ट समझा जा सकता है कि दलितों के लिए उन्नीसवीं शताब्दी का दौर धर्म और अधर्म के अंतर को समझने का नहीं था. अशिक्षा के उस दौर में जैसा ब्राह्मण समझाते थे, बस वही उनके लिए धर्म होता था. और यह अच्छी तरह समझा जा सकता है कि ब्राह्मणों ने उन्हें क्या समझाया होगा? उन्होंने दलितों को स्वतंत्रता, समानता और समान मानव-अधिकारों का पाठ तो पढ़ाया नहीं होगा. उन्होंने उन्हें ब्राह्मण-भक्ति का ज्ञान ही समझाया  होगा. इस ब्राह्मणवाद के निहितार्थ को समझने का उनके पास कोई विज्ञान नहीं था. खैरमोडे ने सही कहा है कि ‘उस समय दलित समाज की स्थिति पूरी तरह गतिहीन और लाचार थी.’ और ‘अधर्म ही उनके लिए धर्म था.’ उसी अधर्म को, जिसमें रामजी हिन्दू संतों की रचनाएँ गुनगुनाते रहते थे, आरएसएस उसे धर्म बता रहा है, और कह रहा है कि उसी ने बाबासाहेब के मनुष्य का गठन किया था. अगर उन अभंगों ने उनके व्यक्तित्व का गठन किया भी था, तो एक ब्राह्मणवादी हिन्दू के रूप में नहीं, बल्कि उसके विरोध में उन अभंगों ने बाबासाहेब के ज्ञानचक्षु खोले थे.

कटु सत्य यह है कि बाबासाहेब को धर्म और अधर्मं की पहिचान बुद्ध के दर्शन से हुई थी. स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का ज्ञान उन्हें बुद्ध से प्राप्त हुआ था. इस सम्बन्ध में उन्होंने स्वयं स्पष्ट करते हुए कहा था कि वे गीता के दर्शन को नकारते हैं. यह उन्होंने 3 अक्टूबर 1954 को आकाशवाणी से प्रसारित एक वार्ता में कहा था. उन्होंने कहा था–

‘प्रत्येक व्यक्ति का एक जीवन-दर्शन होता है, क्योंकि हरेक व्यक्ति का अपने को जीने का एक तरीका होता है, और इसी का नाम दर्शन है.

‘मैं स्पष्ट रूप से भगवद्गीता में वर्णित हिन्दू समाज-दर्शन को अस्वीकार करता हूँ, क्योंकि यह उस सांख्य-दर्शन के त्रिगुण पर आधारित है, जो मेरे विचार में कपिल-दर्शन का एक क्रूर विकृतीकरण है और जिसने हिन्दू सामाजिक जीवन के कानून के रूप में जातिप्रथा और श्रेणीकृत असमानता के सिद्धांत की रचना की है.’(7)

डा. आंबेडकर के इस कथन से आरएसएस के इस मिथ्या प्रचार का स्वत: ही खंडन हो जाता है कि उन्होंने गीता से प्रेरणा ली थी. उनके पिता को चाहे कितने ही संतों के सबद याद हों, पर सीधी बात यह है कि उनका जीवन-दर्शन स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुता का था, और ये तीनों शब्द हिन्दूधर्म के किसी भी शास्त्र और किसी भी संत-वाणी में नहीं मिलते हैं. अत: जब ये तीनों शब्द हिन्दूधर्म के हैं ही नहीं, फिर वे हिंदुत्व से प्रभावित कैसे हो सकते हैं? ये तीनों शब्द उनके जीवन-दर्शन में कहाँ से आये? इस सम्बन्ध में उन्होंने उसी आकाशवाणी-वार्ता में इस प्रकार स्पष्ट किया है—

‘सकारात्मक रूप से मेरे सामाजिक दर्शन को तीन शब्दों में रखा जा सकता है—स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुता. किन्तु कोई भी यह न समझे कि ये मैंने फ़्रांस की क्रान्ति से लिए हैं. मैंने इन्हें वहां से नहीं लिया है. मैंने इन्हें अपने गुरु बुद्ध की शिक्षाओं से ग्रहण किया है. मेरा दर्शन एक मिशन है. मुझे गीता के त्रिगुण सिद्धांत के विरुद्ध धर्मांतरण के लिए काम करना है. आजकल  भारतीय दो भिन्न विचारधाराओं से शासित हैं. उनकी राजनैतिक विचारधारा संविधान में दी गई प्रस्तावना में निहित स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुता के जीवन की है. पर, उनकी सामाजिक विचारधारा हिन्दूधर्म पर आधारित है, जो स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुता को अस्वीकार करती है.’(8)

इसमें संदेह नहीं कि बाबासाहेब परिवार धार्मिक था, जैसा कि प्राय: सभी गरीब परिवार होते हैं. धार्मिक परिवारों में पूजापाठ और अंधविश्वास सामान्य बात है. बाबासाहेब का लालन-पालन भी ऐसे ही धार्मिक वातावरण में हुआ था. इसके बावजूद पूजापाठ के अंधविश्वास में उनका मन न रमता था. उनके पिता रामजी सूबेदार ने कबीरपंथ की दीक्षा ली थी. कबीरपंथ में यह कड़ा नियम है कि उसमें शराब और मांस वर्जित है. रामजी ने भी कबीरपंथी बनकर शराब और मांस का सेवन त्याग दिया था. चांगदेव लिखते हैं कि ‘कबीरपंथ की दीक्षा लेने के बाद घर का वातावरण पूरी तरह बदल गया था. उनको (रामजी को) छोड़कर घर के अन्य लोग मांसाहार करते थे. अब उनके घर में दो चूल्हे जलते थे. जिस दिन घर में मांस पकता था, उस दिन मांस पकाने वाला चूल्हा अलग होता था और शाकाहार वाला चूल्हा अलग जलता था. भक्ति, भजन और पूजा के कारण उनके घर का माहौल कैसे बना हुआ था, इसके बारे में डा. आंबेडकर स्वयं कहते हैं—

‘हमारा परिवार गरीब था. फिर भी उसके कारण घर का वातावरण स्पष्ट रूप से पढ़े-लिखे परिवार के योग्य ही था. हम लोगों में पढ़ने की अभिरुचि पैदा हो, हमारा चरित्र अच्छा बने, इसके लिए हमारे पिता बहुत ही सावधानी बरतते थे. वे हम लोगों को भोजन के लिए बैठने से पहले पूजा-स्थान में बिठाकर भजन, अभंग, दोहे आदि कहने लगते थे. हम सभी में से मैं हमेशा ही टालमटोल करता था….हमारे पिता जी को सारा का सारा पाठ पूरी तरह कंठस्थ था. वे बिना रुके अभंग के बाद अभंग कह सकते थे. पिताजी के पाठान्तर का हमारे लिए बड़ा आकर्षण था. उसी प्रकार मेरी बहिनें अपने मधुर गले से जब अभंग गाती थीं, तब मुझे भी ऐसा लगता था कि धर्म और धार्मिक शिक्षा मनुष्य के जीवन के लिए जरूरी है. …पिताजी द्वारा कंठस्थ ज्ञान के कारण मुझे मुक्तेश्वर, तुकाराम आदि संत कवियों के काव्य याद हो गए हैं. केवल इतना ही नहीं, मैं उन काव्यों के बारे में मन में सोचने लगा हूँ. मराठी संत कवियों का गहरा अभ्यास करने वाले मेरे जैसे बहुत ही कम लोग होंगे,’(9)

हिन्दू संतों के इसी विशद अध्ययन के बल पर डा. आंबेडकर ने गांधीजी को उत्तर दिया था कि—

‘किसी भी हिन्दू संत ने जातिव्यवस्था पर कभी भी हमला नहीं किया. इसके विपरीत वे जातिव्यवस्था में पक्के विश्वास करने वाले रहे हैं. वे उसी जाति के होकर जिए और मरे, जिसमें पैदा हुए थे. ज्ञानदेव  ब्राह्मण के रूप में अपनी प्रतिष्ठा से इतने उत्कट रूप से जुड़े हुए थे कि जब ब्राह्मणों ने उन्हें समाज में बने रहने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने ब्राह्मण पद की मान्यता पाने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया था. संत एकनाथ अछूतों को छूने और उनके साथ भोजन करने का साहस इसलिए करते थे, क्योंकि वे मानते थे कि इस पाप को गंगा में स्नान करके धोया जा सकता है. मेरे विचार में किसी भी हिन्दू संत ने छुआछूत के खिलाफ अभियान नहीं चलाया.’(10)

यह उद्धरण इसलिए दिया गया, ताकि आरएसएस के इस दूषित विचार का खंडन किया जा सके कि बाबासाहेब को अगर हिन्दू संतों के पद याद थे, तो इसका यह मतलब कदाचित नहीं है कि उनसे उन्हें जातिवाद के विरुद्ध लड़ने की कोई प्रेरणा मिली हो. इसके विपरीत वे उन पदों के आधार पर ही इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि सारे हिन्दू संत जातिवादी थे.

‘राष्ट्रोदय’ में प्रकाशित ‘बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर’ लेख में आरएसएस ने आगे लिखा है—

‘1913 में बड़ौदा महाराज सयाजीराव गायकवाड़ से प्राप्त छात्रवृत्ति के साथ भीमराव कोलम्बिया विश्वविद्यालय में पढ़ने गए. न्यूयार्क स्थित इस विश्वविद्यालय को उन्होंने इसलिए छोड़ा कि वहाँ के भोजन में गोमांस रहता था. बाबासाहेब के नाम पर संस्था बनाकर ‘बीफ फेस्टिवल’ करने वाले लोग उनके प्रति निकृष्ट द्रोह करते हैं.’(11)

इस घटना का उल्लेख करने के पीछे आरएसएस का निहितार्थ सिर्फ यह दिखाना है कि डा. आंबेडकर आरएसएस की तरह ही गोभक्त थे. इस घटना का सही वर्णन चांगदेव भवानराव खैरमोडे ने इस तरह किया है—

‘उन्होंने यूनिवर्सिटी के छात्रावास ‘हार्टले हाल’ में पहला एक सप्ताह गुजारा. लेकिन वहां का भोजन आमतौर पर गाय के मांस का बना होता था और वह भी अच्छी तरह पकाया हुआ नहीं होता था. वहां का भोजन भीमराव को पसंद नहीं आया. इसलिए उन्होंने ‘हार्टले हाल’ छोड़ दिया.’ (12)

खैरमोडे ने यह उद्धरण डा. आंबेडकर के  4 अगस्त 1913 को शिवनाक गौनाक जमेदार को भी लिखे गए पत्र से दिया है. यह पत्र अंग्रेजी में है, जिसमें ये पंक्तियाँ हैं—‘I don’t like the food and I don’t think I will, as majority of the dishes are ill-cooked and of beef.’  इससे यह पता चलता है कि बाबासाहेब एक सप्ताह तक ‘हार्टले हाल’ छात्रावास में बीफ खाते रहे थे. बीफ का मतलब सिर्फ गोमांस नहीं होता है. उसमें  भैंस और भैंसे का भी मांस भी शामिल होता है. इससे कहीं भी यह साबित नहीं होता है कि उन्होंने बीफ इसलिए छोड़ा था कि वे गोभक्त थे, बल्कि इसलिए छोड़ा था, क्योंकि वह खराब तरीके से पकाया जाता था, इसलिए बाबासाहेब डा. आंबेडकर को गोभक्त बनाने की आरएसएस की साजिश से दलितों को सावधान रहने की जरूरत है.

जारी–(इस लेख का अगला हिस्सा 24वीं कड़ी में प्रकाशित होगा..)

संदर्भ–

1,बहिष्कृत भारत के प्रतिनिधि सम्पादकीय, अन्याय कोई परम्परा नहीं : डा. आंबेडकर, अनुवादक : डा. श्योराजसिंह ‘बेचैन’ एवं रजतरानी ‘मीनू’, संगीता प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली.1995, पृष्ठ 110.

2.Dr. Babasaheb Ambedkar Writings and Speeches, Vol. 8, p. 233.

3.राष्ट्रदेव पाक्षिक, 1 सितम्बर 2017, जागृति विहार, मेरठ, उप्र, पृष्ठ 10.

4.अमर उजाला, बैठक जुगलबंदी, भैरव का सोंटा, अंक : 22 अक्टूबर 2017.

5.कबीर ग्रंथावली, सम्पादक : श्यामसुंदर दास, 2034 वि., चाणक कौ अंग, साखी-10, पृष्ठ 28

6.बाबासाहेब डा. आंबेडकर : जीवन और चिन्तन, खंड-1, चांगदेव भवानराव खैरमोडे, अनुवाद : डा. विमल कीर्ति, 2005, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 46.

7.Dr. Babasaheb Ambedkar : Writings and Speeches, Vol. 17, Part 3, p 503.

8.वही

9.बाबासाहेब डा. आंबेडकर : जीवन और चिन्तन, खंड-1, पृष्ठ 46-47.

10.Dr. Babasaheb Ambedkar : Writings and Speeches, Vol. 1, p 87

11. राष्ट्रदेव,पाक्षिक,1 सितम्बर 2017, पृष्ठ 10.

12. बाबासाहेब डा. आंबेडकर : जीवन और चिन्तन, खंड-1, पृष्ठ 77..

 

पिछली कड़ी–

कंवल की नोक पर -22स्वदेशी का ‘कपट’ गढ़ता पूँजीवाद का लटक है आरएसएस !

 



 

 

 


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