कश्मीर की ओर देखकर सोचिए, आप राष्ट्र हैं या राष्ट्र के अगले शिकार?



कश्मीर को बाकी दुनिया से कटे हुए दो महीने से अधिक हो गए हैं और कुछ निश्चित नहीं है कि आगे क्या होने वाला है। कोई साधन न होने के कारण पूर्ववती जम्मू एवं कश्मीर में और उसके बाहर रहने वाले कश्मीरियों का आपस में संपर्क टूटा हुआ है। कुछ ही दिन पहले आंशिक मोबाइल कनेक्टिविटी बहाल की गयी। सोशल मीडिया और कुछ समाचार आउटलेट और अधिकांशत: कश्मीरियों के ज़ेहन में, मौत, शोक और मातम की भयावह कहानियां चल रही हैं। घेराबंदी के दिन महज़ एक और आंकड़ा बनकर रह गए हैं और अधिकांश लोग गिनती भूलने लगे हैं।

लोगों को अपनों की मौत या बीमारी की ख़बरें मिल रही हैं, पर ना कुछ विस्तार से पता चल रहा है और ना वह अंत्येष्टि में या मरीज़ों के सिरहाने तक पहुँच पा रहे हैं। कोई उन बच्चों की बात नहीं कर रहा है जो स्कूल बंद होने के कारण घरों में फंसे हुए हैं और उनकी भी नहीं जिन्हें मारा-पीटा गया, यातनाएं दी गयीं या जेलों में बंद हैं। चिरकालिक और गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोग मर रहे हैं और कहीं ख़बर भी नहीं बन रही। दोष देने के लिए सिर्फ खुदा है। कश्मीरियों को मिल रही सामूहिक सज़ा अपना रंग दिखाने लगी है।

उस एक ‘फ़ोन कॉल’ की सतत चिंता ने कइयों को मानसिक आघात पहुँचाया है। डर है कि जो कश्मीरी लोग घाटी में शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, वह भी दर्दनाक मानसिक तनाव से गुज़र रहे हैं। किसी तरह लोग मिन्नतें कर के फ़ोन कॉल कर भी लें, दूसरी तरफ की दुखदायी ख़ामोशी सब कह देती है। हालांकि लोग यही कहते हैं कि ‘सब ठीक है’ पर जब यह शब्द कहे जाते हैं तो जो चीखती हुई ख़ामोशी सुनाई देती है, उसे अनदेखा-अनसुना नहीं किया जा सकता।

एक राष्ट्र के लोग उनके नाम पर किए जा रहे अन्याय को कैसे स्वीकार कर पा रहे हैं, रातों में सो कैसे पा रहे हैं? यहाँ सौ करोड़ से अधिक लोग, चाहे हर वक्त इसका जश्न न भी मना रहे हों, पर अपने नाम पर अपने देश के एक कथित हिस्से में लाखों लोगों के साथ जो किया जा रहा है उससे संतुष्ट हैं। अगर कुछ गलत हो रहा है तो उसके दोष में किसको शामिल किया जाना चाहिए? भारतीय गृह मंत्री ने कह दिया, “यह सब आपके दिमागों में है और कश्मीर में सब कुछ ‘सामान्य’ है।” आप उनसे असहमति दर्शा सकते हैं, पर अधिकांश भारतीय- पढ़े-लिखे, अशिक्षित, उदारवादी, धार्मिक, नास्तिक, वामपंथी, दक्षिणपंथी, अमीर, गरीब, पुरुष और औरतें-मानते हैं कि कश्मीरियों को अनुशासित करने की आवश्यकता है, और जो हो रहा है उनकी ही भलाई के लिए हो रहा है। ऐसे तर्कों का कोई क्या जवाब दे?

ज़्यादातर भारतीय सामान्य, मेहनती, दोस्ताना लोग हैं, जो पशुओं से भी प्रेम करने का दावा करते हैं और एक मक्खी को भी नुकसान नहीं पहुंचाते। राज्यसत्ता उनके नाम पर उनके जैसे इंसानों के साथ जो कर रही है, वह यह कैसे स्वीकार कर पा रहे हैं? भारतीय दोस्तों ने, उन चंद करीबी दोस्तों ने भी, दूसरों की तरह चुप रहने का निर्णय लिया। वह यह तक नहीं पूछते कि परिवार में सब ठीक तो है या क्या हम उनसे संपर्क कर पाए हैं? आम हालात में यदि आपके साथ कोई दुर्घटना हो जाए तो वह आपके ठीक होने तक आपके सिरहाने रहते हैं, आपका साथ देते हैं। तो फिर अब ऐसा क्यों हो रहा है?

किस तरह की नैतिकता रची जा रही है? क्या कश्मीरियों के साथ सहानुभूति दर्शाना उनके अपने देश के साथ विश्वासघात होगा? एक ही देश के होने के दावे का क्या हुआ? सोचिये। कुछ हुआ है। कहीं न कहीं ‘दूसरे’ का डर इस कुशलता से इस्तेमाल किया गया है कि उसने सभी रिश्तों को तोड़ दिया है, दोस्ती के हों या फिर इंसानियत के। आखिरकार, भारत शाकाहार का प्रसारक होने का दावा करता है, अहिंसा की नीति पर चलते हुए गाय को बचाने की कोशिश करता है भले उसमें कुछ अन्य  नागरिकों की भीड़ के हाथों हत्या की अनदेखी करनी पड़े।

इधर, ‘राष्ट्र पहले’ का विचार चल रहा है। ‘राष्ट्र’ के खिलाफ कुछ भी बोला या लिखा नहीं जा सकता। पर राष्ट्र क्या है, वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी और प्रधानमंत्री, ज़मीन या किसी के दिमाग में बने नक़्शे का विचार? या यह बहुसंख्यकों का धर्म है, अल्पसंख्यकों को अधीन बनाना, या फिर कुछ और। उन लोगों का क्या जो घेराबंदी की हुई ज़मीन पर रहते हैं? क्या वह भी राष्ट्र का हिस्सा हैं? किसी अज्ञात ताकत से राष्ट्र को बचाने के लिए लोगों को सज़ा दे या मार सकते हैं? क्या राष्ट्र को बचाने की ज़रूरत है, या राष्ट्र को नष्ट करने की अपने आप क्रियान्वित होने वाली भविष्यवाणी काम कर रही है? कश्मीरियों को पड़ोसी देश का ही विस्तार मानना, और पड़ोसी के प्रति पीढ़ियों की नफरत का बदला लेने के लिए उन्हें सामूहिक रूप से सज़ा देना यही साबित करता है कि कश्मीर उस ‘कथित राष्ट्र’ का हिस्सा नहीं है, जिसके नाम पर यह सब किया जा रहा है।

इतिहास गवाह है कि अधिकांश तानाशाहों ने बहुसंख्यकों का विश्वास जीतने और सत्ता हासिल करने के लिए डर, समृद्धि और श्रेष्ठता जैसे उपकरणों के ज़रिये राष्ट्रत्व का इस्तेमाल किया है। और एक बार वह सत्ता में आ गए तो अल्पसंख्यकों और अन्य कमज़ोर तबकों के भय के सहारे राष्ट्र के नाम पर अकल्पनीय चीज़ें की गयीं। कोई भी फासीवादी अपने सपने पूरे नहीं कर सका और वह खुद अपनी क्रूरता का शिकार बने, पर इस प्रक्रिया में जो मौत और तबाही उन्होंने मानव जाति को दी वह अकल्पनीय है। एक समूह से निबटने के बाद वह दूसरे समूह के पीछे पड़ते हैं। आप समझ नहीं पाते कि पडोसी के आँगन में लगाई आग फ़ैलकर पूरे गाँव को ही जला सकती है। यह शुरू हो भी चुका है, लोगों पर खुले ख़त लिखने के लिए मुक़दमे हो रहे हैं, प्रिय प्रधानमंत्री की मामूली आलोचना के लिए छात्रों को कालेजों से निकाला जा रहा है।

पीढ़ीगत मानसिक आघात, विस्थापन और मानवीय पीड़ा इतिहास की धारा बदल देती है,अच्छे के लिए भी और बुरे के लिए भी। तो समाधान क्या है, जीने में सम्मान या सम्मान के साथ जीना? यह महसूस होने में समय नहीं लगता कि दूसरों को दर्द और तकलीफ देने से किसी राष्ट्र को खुश नहीं किया जा सकता। आपको लग सकता है कि जो भी हो रहा है, उससे आपका कोई लेना-देना नहीं है, पर आपके नाम पर जो भी किया जा रहा है, वह आपकी ही ज़िम्मेदारी है। तब और भी ज़्यादा जब सोचने या सवाल करने के बजाय आप आँखें मूंदकर राज्यसत्ता का समर्थन कर रहे हों।

कुछ तर्क देते हैं कि यदि कश्मीरी समस्या पैदा नहीं करते, यानी आज़ादी की आकांक्षा नहीं रखते और जनमत संग्रह की मांग नहीं करते (जैसा कि उनसे तब संलिप्त सभी पक्षों की तरफ से वायदा किया गया था), तो जम्मू एवं कश्मीर कम से कम एक राज्य बना रहता। पीड़ित को ही दोष देना नई रणनीति नहीं है। जैसे कि कश्मीरियों के पास कोई विकल्प हो। अभी तक वह अपनी किस्मत का फैसला करने के लिए बनाए गए कथित मंच तक पहुँच नहीं पाएं हैं। आज़ादी की इच्छा कौन नहीं करता?

और अंत में, राज्यसत्ता से नहीं तो अपने आप से सवाल करने के लिए देर नहीं हुई है अभी। क्या आप सचमुच जानते हैं कि आपके नाम पर क्या किया जा रहा है? आप राष्ट्र हैं या राष्ट्र के अगले शिकार? यदि आप राष्ट्र हैं तो इसे स्वीकार करें और इसके परिणाम भुगतें । लोकतंत्र थोपा नहीं जा सकता, न ही आज़ादी। हर कोई जानता है कि यह विकास, महिलाओं की आज़ादी या युवाओं की शिक्षा के बारे में नहीं है। न ही यह आतंकवाद के बारे में है जो गलत दावा कश्मीर को बदनाम करने के लिए किया जाता है। अब भी समय है कथित सच से सवाल करने का, यदि आपने नकाब में जल्लाद बनने का फैसला कर लिया हो तो दूसरी बात है।


डॉ. मुदस्सिर फिरदोसी कश्मीरी मनोवैज्ञानिक और लेखक हैं, लन्दन में रहते हैं। यह लेख 19 अक्टूबर 2019 को काउंटरकर्रेंट्स वेबसाइट पर प्रकाशित हुआ था। इसका अनुवाद कश्मीर ख़बर ने किया है। कवर चित्रः आईशान खान


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