कर्नाटक: ‘नीयत’ और ‘संवैधानिक नैतिकता’ के आईने में वाजूभाई का विशेषाधिकार प्रयोग



अरविन्द कुमार 

पिछले कुछ महीनों से भारतीय संविधान द्वारा संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को दी गयी ‘विशेषाधिकार की शक्तियाँ’ विवाद का विषय बनी हुई हैं। इस क्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश के ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ वाला विवाद अभी थमा भी नहीं था, कि कर्नाटक के राज्यपाल वाजूभाई वाला द्वारा विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए बहुमत न होने के बावजूद बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के फैसले ने अच्छा खासा ड्रामा खड़ा कर दिया जिसका गवाह पूरा देश बना। कर्नाटक का संकट अब भले ही टल गया हो लेकिन क्या सुप्रीम कोर्ट राज्यपालों के विशेषाधिकार पर सुनवाई करता रहेगा? इस घटनाक्रम से सबसे बड़ा सवाल जो निकल कर आया है वो यह है कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को कैसे कार्य करना चाहिए, खासकर तब जब संविधान उनको अपने विवेकानुसार निर्णय लेने का विशेषाधिकार देता हो!

यह सही है कि संविधान कुछ संवैधानिक पदाधिकारियों को चुनिदा मामलों में स्वविवेक से कार्य निर्णय लेने हेतु विशेषाधिकार देता है, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि शून्यता में या अपने मनमाफिक निर्णय लिया जाए। दरअसल, संविधान निर्माता संविधान में सिर्फ सैद्धांतिक पक्ष को ही शामिल करना चाहते थे, न कि व्यवहारिक पक्ष, इसलिए जगह-जगह उन्होंने विशेषाधिकार की बात कही ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी समस्याओं के अनुसार ऐसी शक्तियों को परिभाषित करके उन समस्याओं को सुलझा सकें। इसलिए उक्त सवाल का सही जवाब तलाशने के लिए हमें सबसे पहले संविधान सभा की बैठक में हुई बातचीत को देखना चाहिए।

इस सवाल का जवाब तलाशने में बाबासाहब डॉ. आंबेडकर का एक कथन- ‘यह संविधान अपने उद्देश्यों को तब तक पूरा नहीं कर पाएगा, जब तक कि इसको लागू करने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों की नीयत सही ना हो’- काफी हद तक हमारी मदद करता है। विदित हो कि लोकतन्त्र में संवैधानिक पदाधिकारियों की नीयत तब साफ मानी जाती है जब वे संवैधानिक नैतिकता के दायरे में रह कर काम करे रहे होते हैं। आंबेडकर, संविधान से ज्यादा संवैधानिक नैतिकता को लोकतन्त्र की सफलता की कुंजी बताते हैं। आज के परिप्रेक्ष्य में यदि हम संवैधानिक नैतिकता को परिभाषित कर ले जाएँ, तो अपने आप साफ हो जाएगा कि ‘विशेषाधिकार’ की सूरत में किसी भी संवैधानिक पदाधिकारी को कैसे कार्य करना चाहिए।

संवैधानिक नैतिकता का सबसे महत्वपूर्ण आयाम है, प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांत। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के अनुसार कोई भी व्यक्ति अपने मामले में खुद ही किसी भी तरह से निर्णायक की भूमिका नहीं निभा सकता; किसी भी व्यक्ति को अपने ही खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, यानि आरोप लगाने वाले व्यक्ति को ही सबूत देना होता है। सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है- कानून का शासन, न कि व्यक्ति का शासन, ताकि शासन में समता बनी रहे। लोकतन्त्र में किसी भी संवैधानिक पदाधिकारी का कोई भी निर्णय, चाहे वो विशेषाधिकार के तहत ही क्यों न लिया गया हो, प्राकृतिक न्याय की परिधि से बाहर नहीं हो सकता है, इसलिए प्राकृतिक न्याय को आधार बनाकर न्यायालय किसी अधिकारी के निर्णय को कभी खारिज नहीं कर सकता है। ऐसे में कोई भी निर्णय लेते समय चाहे वह विशेषाधिकार के तहत ही क्यों न लिया जा रहा हो, संवैधानिक पदाधिकारियों को यह हमेशा ध्यान रखना होता है कि उनका निर्णय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन तो नहीं कर रहा।

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में शीर्ष अदालतों के निर्णय सभी संवैधानिक पदाधिकारियों पर बाध्यकारी होते हैं। यदि कहीं पर कानून कुछ नहीं कहता है, तो संवैधानिक पदाधिकारियों को उक्त विषय में आए न्यायालय के विभिन्न निर्णयों को ध्यान में रखकर निर्णय लेना होता है क्योंकि विधायिका द्वारा बनाए गए कानून की शून्यता की स्थिति में न्यायालय के निर्णय भी कानून समान ही होते हैं। न्यायालय के निर्णय के अनुसार कार्य करना संवैधानिक नैतिकता का अतिमहत्वपूर्ण आयाम है। यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि अपने निर्णय को लागू न करने के लिए न्यायालय अपनी अवमानना का मुकदमा तक चला सकता है और सम्बंधित पदाधिकारी को सजा तक दे सकता है, लेकिन जब बात उच्च संवैधानिक पदाधिकारियों की आती है तो उनको कुछ खास तरह की कानूनी कार्रवाई से संरक्षण प्राप्त होता है, जिससे न्यायालय ऐसे पदाधिकारियों को सजा देने के मामले में शक्तिविहीन से हो जाते हैं।

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में व्यक्ति नहीं, संवैधानिक पद महत्वपूर्ण होता है। संवैधानिक पद पर बैठने वाले व्यक्ति तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन वह पद हमेशा बना रहता है। इसलिए संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का निर्णय उसका अपना निर्णय न होकर उस संवैधानिक पद का निर्णय होता है। ऐसा तभी हो सकता है, जब संवैधानिक पद पर बैठा हुआ व्यक्ति कोई भी निर्णय लेते समय इस तथ्य का ध्यान रखे कि उस विषय पर उसके पूर्ववर्तियों ने क्या और कैसे निर्णय लिया है। संवैधानिक पदाधिकारियों के निर्णय में एकरूपता हो, इसलिए लोकतन्त्र में संवैधानिक परम्पराओं का खासा महत्व है। अतः भले ही संविधान किसी संवैधानिक पदाधिकारी को कुछ खास शक्ति देता हो, विशेषाधिकार देता हो, या फिर अपने विवेक से निर्णय लेने का अधिकार देता हो, लेकिन वह पदाधिकारी शून्यता में निर्णय नहीं ले सकता है, यानि निर्णय लेते समय अपने पूर्ववर्ती पदाधिकारियों के निर्णयों की उपेक्षा नहीं कर सकता।

आखिरी बात, अगर किसी पदाधिकारी के पास विशेषाधिकार जैसी कोई शक्ति है, और किसी विषम परिस्थिति में उसको उस शक्ति का इस्तेमाल करके कोई निर्णय लेना हो, और ऊपर उल्लिखित कोई भी आयाम उपलब्ध ना हों तो, ऐसे में निर्णय लेते समय उस पदाधिकारी को जर्मन दार्शनिक इमैनुअल कान्ट के उस सिद्धांत का पालन करना चाहिए, जिसमें कान्ट यह बताते हैं कि कोई भी निर्णय लेते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि जो भी निर्णय लिया जा रहा है, उसमें सार्वभौमिक कानून बनने की क्षमता हो।


लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज में अतिथि प्रोफेसर हैं और राजनीति अध्ययन केंद्र, जेएनयू में शोधार्थी हैं 

 


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